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वैष्णव जन तो

🕉️ hindu·📿 1× जप·🕐 प्रातः या सायं प्रार्थना, गांधी जयंती पर, अथवा सम्यक् जीवन पर चिंतन रूप में किसी भी समय·📜 Composed by Narsinh Mehta (Gujarati bhakti tradition); popularised nationally by Mahatma Gandhi

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अर्थ

वैष्णव जन तो पंद्रहवीं सदी के गुजराती संत-कवि नरसिंह मेहता का भजन है, जो सच्चे वैष्णव को कर्मकांड से नहीं, बल्कि करुणा, नम्रता और सत्य से परिभाषित करता है। यह महात्मा गांधी का सर्वाधिक प्रिय भजन था, जो उनकी प्रार्थना-सभाओं में गाया जाता था। यह एक भक्तिमय जीवन की नैतिकता सिखाता है।

उत्पत्ति और कथा

Composed by Narsinh Mehta (Gujarati bhakti tradition); popularised nationally by Mahatma Gandhi · Narsinh Mehta · 15th century

गुजरात के अग्रणी कवि-संत नरसिंह मेहता ने सम्पूर्ण भक्ति-नीति को इस एक गीत में समाहित किया: सच्चा वैष्णव करुणा, नम्रता और सत्य से परिभाषित होता है, कर्मकांड से नहीं। शताब्दियों बाद महात्मा गांधी ने इसे अपने आश्रम और स्वतंत्रता आंदोलन का गान बना दिया, जो हर प्रार्थना-सभा में गाया जाता था — इस प्रकार एक मध्यकालीन गुजराती भजन समूचे भारत के लिए अंतःकरण का गीत बन गया।

शास्त्रों में वर्णित

इस गीत की मूक शक्ति नैतिक है, चमत्कारी नहीं: पीढ़ियों ने अपने आचरण को इसकी पंक्तियों की कसौटी पर मापा है। गांधी मानते थे कि यदि कोई व्यक्ति केवल नरसिंह द्वारा गिनाए गुणों को जी ले, तो उसे किसी अन्य शास्त्र की आवश्यकता नहीं — और इसे गाने वाले लाखों लोग आज भी अनुभव करते हैं कि यह उनके दूसरों के प्रति व्यवहार को धीरे-धीरे सँवार रहा है।

सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित

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श्लोक 1

वैष्णव जन तो तेने कहिए, जे पीड़ पराई जाणे रे। पर दुःखे उपकार करे तोये, मन अभिमान आणे रे॥

Vaishnav jan to tene kahiye, je peed parai jane re Par dukhe upkar kare toye, man abhiman na ane re

अर्थ:वैष्णव जन उसी को कहिए जो दूसरों की पीड़ा को अपनी पीड़ा जाने; जो दुखियों पर उपकार करे फिर भी मन में अभिमान न लाए।

श्लोक 2

सकळ लोकमां सहुने वंदे, निंदा करे केनी रे। वाच काछ मन निश्चळ राखे, धन धन जननी तेनी रे॥

Sakal lokma sahune vande, ninda na kare keni re Vach kachh man nishchal rakhe, dhan dhan janani teni re

अर्थ:जो सब लोगों को वंदन करे, किसी की निंदा न करे, वाणी, कर्म और मन को निश्चल रखे — धन्य है उसकी जननी।

श्लोक 3

समदृष्टि ने तृष्णा त्यागी, परस्त्री जेने मात रे। जिह्वा थकी असत्य बोले, परधन नव झाले हाथ रे॥

Samdrishti ne trishna tyagi, parastri jene maat re Jihva thaki asatya na bole, pardhan nav jhale haath re

अर्थ:जो समदृष्टि रखे, तृष्णा का त्याग करे, पराई स्त्री को माता समान माने; जिह्वा से असत्य न बोले, पराये धन को हाथ न लगाए।

श्लोक 4

मोह माया व्यापे नहि जेने, दृढ़ वैराग्य जेना मनमां रे। रामनाम शुं ताळी रे लागी, सकळ तीरथ तेना तनमां रे॥

Moh maya vyape nahi jene, dridh vairagya jena manma re Ramnaam shu tali re lagi, sakal tirath tena tanma re

अर्थ:जिसे मोह-माया व्यापे नहीं, जिसके मन में दृढ़ वैराग्य हो, जो राम-नाम में लीन रहे — समस्त तीर्थ उसके शरीर में बसते हैं।

श्लोक 5

वणलोभी ने कपटरहित छे, काम क्रोध निवार्या रे। भणे नरसैयॊ तेनुं दरसन करतां, कुळ एकोतेर तार्या रे॥

Vanlobhi ne kapatrahit chhe, kaam krodh nivarya re Bhane Narsaiyo tenu darshan karta, kul ekoter tarya re

अर्थ:जो लोभरहित और कपटरहित हो, काम-क्रोध को त्याग चुका हो — नरसिंह कहते हैं, उसके दर्शन से इकहत्तर पीढ़ियाँ तर जाती हैं।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

वैष्णव जन तो तेने कहिए🔊Vaishnav jan to tene kahiyeउसी व्यक्ति को सच्चा वैष्णव (भगवान का भक्त) कहो
जे पीड़ पराई जाणे रे🔊je peed parai jane reजो दूसरों की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझे
पर दुःखे उपकार करे🔊par dukhe upkar kareजो दुखियों की सहायता करे
मन अभिमान न आणे रे🔊man abhiman na ane reफिर भी मन में अभिमान न आने दे
समदृष्टि ने तृष्णा त्यागी🔊samdrishti ne trishna tyagiसबको समान दृष्टि से देखे, तृष्णा से मुक्त
परस्त्री जेने मात रे🔊parastri jene maat reजो पराई स्त्री को अपनी माता समझे
रामनाम शुं ताळी रे लागी🔊Ramnaam shu tali re lagiराम के नाम में लीन
कुळ एकोतेर तार्या रे🔊kul ekoter tarya reजिनके दर्शन मात्र से इकहत्तर पीढ़ियों का उद्धार हो जाता है

वैष्णव जन तो पाठ के लाभ

महात्मा गांधी का सर्वाधिक प्रिय भजन — उनकी प्रार्थना-सभाओं और साबरमती आश्रम में गाया जाता था।

सच्चे भक्त को कर्मकांड से नहीं, अपितु करुणा, नम्रता और ईमानदारी से परिभाषित करता है।

स्वर में बँधा एक नैतिक दिशासूचक — गुजरात से कहीं आगे, समूचे भारत में प्रिय।

गांधी जयंती, गणतंत्र दिवस के कार्यक्रमों और विद्यालयों में गाया जाता है।

हृदय को शांत व उन्नत करता है, साथ ही भक्तिमय जीवन की नैतिकता सिखाता है।

वैष्णव जन तो जप विधि

जप संख्या1बार
उत्तम समयप्रातः या सायं प्रार्थना, गांधी जयंती पर, अथवा सम्यक् जीवन पर चिंतन रूप में किसी भी समय

इसे धीरे-धीरे और चिंतनशील भाव से गाएँ, यथासंभव समूह में, प्रत्येक पंक्ति की शिक्षा को हृदय में बैठने दें। इसमें कोई कर्मकांड नहीं — यह चरित्र का भजन है: अर्थ पढ़ें, फिर गाएँ, और प्रतिदिन इसकी एक पंक्ति को जीने का संकल्प करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पंद्रहवीं सदी के गुजराती संत-कवि नरसिंह मेहता ने। यह महात्मा गांधी के प्रिय भजन के रूप में विश्वविख्यात हुआ, जो उनकी प्रार्थना-सभाओं में नित्य गाया जाता था।
कि भगवान का सच्चा भक्त बाह्य कर्मकांड से नहीं, अपितु चरित्र से पहचाना जाता है — दूसरों की पीड़ा अनुभव करना, बिना अभिमान के सेवा करना, सत्य बोलना, लोभ, काम और क्रोध पर विजय, तथा भगवान के नाम में लीन रहना।
क्योंकि इसमें उनका नैतिक, करुणामय जीवन का आदर्श समाया था। यह दांडी यात्रा पर और साबरमती आश्रम में गाया जाता था, और आज भी भारत में अंतःकरण का राष्ट्रीय गीत बना हुआ है।

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