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तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः — Word-by-Word Meaning

तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

तपः
tapah
अनुशासन, तपस्या — प्रयास और आत्म-संयम द्वारा स्वीकृत शुद्धिकरण
स्वाध्याय
svadhyaya
स्वाध्याय — शास्त्रों का अध्ययन और मंत्र-जप; आत्म-निरीक्षण
ईश्वर
ishvara
ईश्वर, परमात्मा, भगवान
प्रणिधानानि
pranidhanani
समर्पण, भक्ति, अर्पण (यहाँ: समस्त कर्मों और स्वयं का)
ईश्वरप्रणिधान
ishvara-pranidhana
ईश्वर के प्रति समर्पण और भक्ति; समस्त कर्मों को प्रभु को अर्पित करना
क्रिया
kriya
कर्म, अभ्यास, क्रियात्मक या व्यावहारिक
योगः
yogah
योग
क्रियायोगः
kriya-yogah
कर्म का योग / व्यावहारिक प्रारम्भिक योग — ये तीनों मिलकर

Complete Translation

तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान — ये तीनों क्रियायोग हैं (कर्म-योग, साधना का व्यावहारिक मार्ग)।

Origin & History

Source: Patanjali Yoga Sutras 2.1

Author: Patanjali

Period: Classical (c. 2nd century BCE – 4th century CE)

यह महर्षि पतंजलि के योगसूत्रों में साधना पाद — अभ्यास के अध्याय — का पहला सूत्र है। प्रथम अध्याय में चित्त के स्वरूप और उसके निरोध का वर्णन करने के पश्चात् पतंजलि अब व्यावहारिक साधनों की ओर मुड़ते हैं, और क्रियायोग — कर्म के योग — की परिभाषा से आरम्भ करते हैं: तप, स्वाध्याय और ईश्वर के प्रति समर्पण। यह त्रयी योग-साधना की आधारशिला बन गई।

Frequently Asked Questions

योगसूत्र 2.1 का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है 'तप (अनुशासन), स्वाध्याय (आत्म-अध्ययन) और ईश्वर-प्रणिधान (ईश्वर के प्रति समर्पण) — ये क्रियायोग हैं।' यह पतंजलि योगसूत्र के दूसरे अध्याय का आरम्भ करते हुए कर्म के योग — साधक को शुद्ध करने वाले व्यावहारिक साधनों — की परिभाषा देता है।
योगसूत्रों में क्रियायोग क्या है?
क्रियायोग 'कर्म का योग' है — तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान ये तीन प्रारम्भिक साधन। अगला सूत्र (2.2) इसका प्रयोजन बताता है: समाधि की भावना को पुष्ट करना और चित्त के क्लेशों को क्षीण करना।
तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान का क्या अर्थ है?
तप है अनुशासित, शुद्धिकारक प्रयास और आत्म-संयम; स्वाध्याय है आत्म-अध्ययन तथा शास्त्रों का अध्ययन या पाठ; ईश्वर-प्रणिधान है स्वयं और अपने कर्मों को ईश्वर को समर्पित करना। यही तीनों अष्टांग योग के नियमों में भी पुनः आते हैं।
क्रियायोग का अष्टांग योग से क्या सम्बन्ध है?
क्रियायोग के तीनों अंग अष्टांग मार्ग के अन्तिम तीन नियम भी हैं। पतंजलि क्रियायोग को व्यावहारिक प्रस्थान-बिन्दु के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जो चित्त को शुद्ध कर ध्यान और समाधि के गहरे अंगों के लिए तैयार करता है।

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