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तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः

🕉️ yoga·📿 3× जप·🕐 प्रातःकाल, दैनिक साधना के आरम्भ में·📜 Patanjali Yoga Sutras 2.1

अन्य नाम / खोज: tapah svadhyaya ishvara pranidhanani kriya yogah · kriya yoga sutra · yoga sutra 2.1 · patanjali yoga sutra 2.1

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अर्थ

यह पतंजलि योगसूत्र के दूसरे अध्याय, साधना पाद, का प्रारम्भिक सूत्र है, जो क्रियायोग — कर्म या साधना के योग — की परिभाषा देता है। यह तीन आवश्यक साधनों का नाम लेता है — तप (आत्म-अनुशासन और शुद्धिकारक प्रयास), स्वाध्याय (आत्म-अध्ययन एवं शास्त्र-अध्ययन), और ईश्वर-प्रणिधान (स्वयं और अपने कर्मों का ईश्वर को समर्पण)। ये तीनों मिलकर साधक को तैयार करते हैं, चित्त को शुद्ध करते हैं और योग की गहरी अवस्थाओं की ओर ले जाते हैं।

उत्पत्ति और कथा

Patanjali Yoga Sutras 2.1 · Patanjali · Classical (c. 2nd century BCE – 4th century CE)

यह महर्षि पतंजलि के योगसूत्रों में साधना पाद — अभ्यास के अध्याय — का पहला सूत्र है। प्रथम अध्याय में चित्त के स्वरूप और उसके निरोध का वर्णन करने के पश्चात् पतंजलि अब व्यावहारिक साधनों की ओर मुड़ते हैं, और क्रियायोग — कर्म के योग — की परिभाषा से आरम्भ करते हैं: तप, स्वाध्याय और ईश्वर के प्रति समर्पण। यह त्रयी योग-साधना की आधारशिला बन गई।

शास्त्रों में वर्णित

जो साधक इन तीन साधनों को अपनाते हैं, वे एक स्थिर आन्तरिक रूपान्तरण का अनुभव बताते हैं: कठिनाइयाँ अग्नि की भाँति अशुद्धियों को जला देती हैं (तप), अध्ययन और आत्म-निरीक्षण प्रकाश लाते हैं (स्वाध्याय), और ईश्वर के प्रति समर्पण अहंकार का बोझ विलीन कर देता है — जिससे मन दिन-प्रतिदिन अधिक स्वच्छ और शान्त होता जाता है।

मंत्र

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तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः

Tapah-svadhyaya-ishvara-pranidhanani kriya-yogah

अर्थ:तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान — ये तीनों क्रियायोग हैं (कर्म-योग, साधना का व्यावहारिक मार्ग)।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

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तपः🔊tapahअनुशासन, तपस्या — प्रयास और आत्म-संयम द्वारा स्वीकृत शुद्धिकरण
स्वाध्याय🔊svadhyayaस्वाध्याय — शास्त्रों का अध्ययन और मंत्र-जप; आत्म-निरीक्षण
ईश्वर🔊ishvaraईश्वर, परमात्मा, भगवान
प्रणिधानानि🔊pranidhananiसमर्पण, भक्ति, अर्पण (यहाँ: समस्त कर्मों और स्वयं का)
ईश्वरप्रणिधान🔊ishvara-pranidhanaईश्वर के प्रति समर्पण और भक्ति; समस्त कर्मों को प्रभु को अर्पित करना
क्रिया🔊kriyaकर्म, अभ्यास, क्रियात्मक या व्यावहारिक
योगः🔊yogahयोग
क्रियायोगः🔊kriya-yogahकर्म का योग / व्यावहारिक प्रारम्भिक योग — ये तीनों मिलकर

तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः पाठ के लाभ

क्रियायोग की परिभाषा देता है — शुद्धिकरण का व्यावहारिक, कर्म-प्रधान मार्ग जो ध्यान के लिए तैयार करता है।

तीन शक्तिशाली, सुलभ साधन देता है: तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान, जिनका अभ्यास कोई भी साधक कर सकता है।

चित्त को शुद्ध करता है और क्लेशों को क्षीण करता है, जैसा अगला सूत्र वचन देता है।

प्रयास (तप), ज्ञान (स्वाध्याय) और भक्ति (ईश्वर-प्रणिधान) को एक पूर्ण साधना में जोड़ता है।

दैनिक जीवन में आत्म-अनुशासन, आत्म-ज्ञान और ईश्वर के प्रति समर्पण का विकास करता है।

स्थिर प्रगति चाहने वाले योग-साधकों द्वारा पठित और अनुसरित एक आधारभूत उपदेश।

तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः जप विधि

जप संख्या3बार
उत्तम समयप्रातःकाल, दैनिक साधना के आरम्भ में
दिशाEast or facing one's place of practice

सूत्र का पाठ करें और दिन भर इसके तीनों साधनों को जीने का संकल्प लें: कठिनाई का सामना स्थिर प्रयास से करें (तप), पवित्र शिक्षाओं का अध्ययन करें और स्वयं का निरीक्षण करें (स्वाध्याय), तथा अपने समस्त कर्म ईश्वर को अर्पित करें (ईश्वर-प्रणिधान)। इसे जीवन-पद्धति के रूप में साधना है — सूत्र कर्म-पथ का दैनिक स्मरण कराता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इसका अर्थ है 'तप (अनुशासन), स्वाध्याय (आत्म-अध्ययन) और ईश्वर-प्रणिधान (ईश्वर के प्रति समर्पण) — ये क्रियायोग हैं।' यह पतंजलि योगसूत्र के दूसरे अध्याय का आरम्भ करते हुए कर्म के योग — साधक को शुद्ध करने वाले व्यावहारिक साधनों — की परिभाषा देता है।
क्रियायोग 'कर्म का योग' है — तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान ये तीन प्रारम्भिक साधन। अगला सूत्र (2.2) इसका प्रयोजन बताता है: समाधि की भावना को पुष्ट करना और चित्त के क्लेशों को क्षीण करना।
तप है अनुशासित, शुद्धिकारक प्रयास और आत्म-संयम; स्वाध्याय है आत्म-अध्ययन तथा शास्त्रों का अध्ययन या पाठ; ईश्वर-प्रणिधान है स्वयं और अपने कर्मों को ईश्वर को समर्पित करना। यही तीनों अष्टांग योग के नियमों में भी पुनः आते हैं।
क्रियायोग के तीनों अंग अष्टांग मार्ग के अन्तिम तीन नियम भी हैं। पतंजलि क्रियायोग को व्यावहारिक प्रस्थान-बिन्दु के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जो चित्त को शुद्ध कर ध्यान और समाधि के गहरे अंगों के लिए तैयार करता है।

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