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दो सिर वाला पक्षी

द्वितीय तंत्र — मित्र सम्प्राप्ति

पात्र: भारुण्ड — दो सिर और एक शरीर वाला पक्षी

किसी बड़ी झील के किनारे भारुण्ड नाम का एक अद्भुत पक्षी रहता था। वह संसार के हर प्राणी से निराला था — उसकी दो लंबी गर्दनों पर दो सिर थे, पर शरीर एक ही था और पेट भी दोनों का साझा। जब एक सिर ऊँघता, तो दूसरा पहरा देता; एक बाईं ओर देखता, तो दूसरा दाईं ओर। बरसों से दोनों सिर मिलकर उस एक शरीर की रक्षा करते आए थे, और जब तक उनमें मेल रहा, झील का कोई पक्षी उनसे अधिक बलवान और भाग्यशाली न था।

एक दिन किनारे घूमते हुए पहले सिर को लहरों के साथ बहकर आया एक सुनहरा फल दिखाई दिया — ऐसा दुर्लभ, दिव्य फल जिसकी सुगंध से हवा महक उठी थी। पहले सिर ने उसे चखा और आनंद से पुकार उठा, “मैंने जीवन में जितनी मीठी चीज़ें खाई हैं, उन सबमें यह सबसे मीठा है! सचमुच यह देवताओं का फल है।” यह सुनकर दूसरे सिर ने विनती की, “भाई, मुझे भी चखा दे। कम से कम एक छोटा-सा टुकड़ा तो दे।”

पर पहला सिर हँसकर मुकर गया। “क्यों दूँ? पेट तो अपना एक ही है, पोषण तुझ तक वैसे भी पहुँच जाएगा। और फिर इसे खोजा भी तो मेरी आँख ने है। जो बचेगा, वह मैं अपनी प्यारी पत्नी को दूँगा।” और वह अकेला ही पूरा फल खा गया। दूसरा सिर कुछ नहीं बोला, पर अपमान उसके हृदय में गहरा उतर गया, और उसी दिन से वह चुपचाप बदला चुकाने का अवसर ढूँढ़ने लगा।

अवसर जल्दी ही मिल गया। उसी किनारे पर दूसरे सिर को एक काला, मुरझाया हुआ फल मिला — विष फल। उसने उसे ऊँचा उठाकर ठंडे स्वर में कहा, “अब देख, निर्दयी! तूने अकेले दावत उड़ाई थी, अब मैं भी अकेला ही खाऊँगा।” पहला सिर चीख पड़ा, “मत खा भाई! शरीर हमारा एक है — तू विष खाएगा तो हम दोनों मरेंगे!” पर क्रोध ने दूसरे सिर को बहरा कर दिया था। उसने विष फल निगल लिया — और दोनों सिरों को उठाने वाला वह एक शरीर पानी के किनारे ढह गया। झगड़ते-झगड़ते दोनों भाई साथ ही चले गए। झील के पक्षी बहुत दिनों तक उन्हें याद करके कहते रहे — जिनका भाग्य एक हो, उन्हें क्रोध को अपने बीच कभी नहीं आने देना चाहिए।

शिक्षा (Moral)

जिनका शरीर और भाग्य एक हो, वे आपस में बैर करके स्वयं अपना ही नाश करते हैं।

दो सिर वाला पक्षी कहानी की शिक्षा क्या है?

जिनका शरीर और भाग्य एक हो, वे आपस में बैर करके स्वयं अपना ही नाश करते हैं।

यह कहानी किस ग्रंथ से है?

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