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नीला सियार

प्रथम तंत्र — मित्रभेद

पात्र: चंडरव सियार · नगर के कुत्ते · वन के पशु

चंडरव नाम का एक सियार एक बार भूख से इतना व्याकुल हुआ कि साँझ के धुँधलके में वन से निकलकर भोजन की तलाश में नगर में घुस आया। नगर के कुत्तों को उसकी गंध मिलते ही वे भौंकते हुए उस पर टूट पड़े। जान बचाकर गलियों में भागता हुआ सियार एक रंगरेज़ के आँगन में जा घुसा और नील से भरे एक बड़े कुंड में धड़ाम से जा गिरा। जब वह हाँफता हुआ बाहर निकला, तो नाक से पूँछ तक नीला हो चुका था — ऐसा रंग, जो वन के किसी प्राणी ने कभी नहीं देखा था।

जब वह जंगल लौटा, तो उसे देखते ही सारे पशु ठिठक गए। शेर, बाघ, भेड़िये, यहाँ तक कि हाथी भी उस अनोखे चमकते नीले जीव से डरकर पीछे हट गए। उनका भय भाँपकर धूर्त सियार अकड़कर बोला, “डरो मत! स्वयं विधाता ने मुझे, ककुद्रुम को, वनों का राजा बनाकर भेजा है। मेरी सेवा करो, मैं तुम सबकी रक्षा करूँगा।” भयभीत पशुओं ने सिर झुका दिए। बाघ उसका मंत्री बना, शेर द्वारपाल, और हर पशु उसके लिए उत्तम भोजन लाने लगा। पर घमंडी ककुद्रुम ने अपने ही भाई-बंधु सियारों को वन से भगा दिया, कहीं वे उसे पहचान न लें।

वह सम्राट की तरह जीने लगा। पर एक पूर्णिमा की रात दूर कहीं सियारों का झुंड सिर उठाकर हुआ-हुआ करने लगा। वह पुरानी बोली सुनते ही नीले राजा का खून जोश में आ गया। राजपाट सब भूलकर उसने भी गर्दन उठाई और ज़ोर-ज़ोर से हुआ-हुआ करने लगा।

शेर और बाघ ने पहले उसे देखा, फिर हैरानी से एक-दूसरे को। अरे! यह देवताओं का भेजा राजा नहीं, भेष बदला हुआ मामूली सियार है! अपने साथ हुए छल पर क्रोध से गरजते हुए बड़े पशु उस झूठे राजा पर झपट पड़े, और यही अंत था ककुद्रुम और उसकी उधार ली हुई नीली शान का। उस दिन के बाद वन के पशुओं ने केवल रंग-रूप देखकर किसी अनजान के आगे सिर नहीं झुकाया, और सबने याद रखा कि सच का एक पल दिखावे के पहाड़ को ढहा देता है।

शिक्षा (Moral)

भेष चाहे कितना भी शानदार हो, स्वभाव अंत में अपना असली रूप दिखा ही देता है।

नीला सियार कहानी की शिक्षा क्या है?

भेष चाहे कितना भी शानदार हो, स्वभाव अंत में अपना असली रूप दिखा ही देता है।

यह कहानी किस ग्रंथ से है?

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