किसी गाँव में देवशर्मा नाम का ब्राह्मण अपनी पत्नी और नवजात बेटे के साथ रहता था। जिस दिन बेटा जन्मा, उसी दिन एक नन्हे नेवले की माँ मर गई। दयालु ब्राह्मणी उस नन्हे जीव को घर ले आई, उसे दूध पिलाया और अपने बच्चे के साथ ही पालने लगी। दोनों नन्हे साथ-साथ बड़े होने लगे, और नेवला उस शिशु को अपने भाई की तरह चाहने लगा। फिर भी माँ के मन के किसी कोने में एक काँटा-सा चुभता रहता — आखिर नेवला है तो जंगली जीव ही, कहीं किसी दिन मेरे बेटे को हानि न पहुँचा दे।
एक सुबह ब्राह्मणी बच्चे को पालने में सुलाकर पानी भरने चली। जाते-जाते पति से बोली, “बच्चे का ध्यान रखना। नेवला पशु है, दोनों को अकेला मत छोड़ना।” पर थोड़ी ही देर में ब्राह्मण को दान लेने का बुलावा आ गया, और वह भी बाहर चला गया। सोते हुए शिशु के पास अब बस नेवला ही रह गया।
तभी बिल से निकलकर एक काला नाग सीधा पालने की ओर बढ़ा। नेवला बिना एक पल डरे उस पर झपट पड़ा। घमासान लड़ाई हुई, और साँप बलवान था, फिर भी वीर नेवले ने उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले और सोते बच्चे के प्राण बचा लिए। लड़ाई से सना मुँह लिए, गर्व और खुशी से भरा नेवला दौड़कर दरवाज़े पर पहुँचा — पानी का घड़ा लिए लौटती अपनी मालकिन की अगवानी करने।
ब्राह्मणी ने उसके मुँह पर लहू देखा, और उसका पुराना डर भड़क उठा — इस जानवर ने मेरे बेटे को मार डाला! उसी अंधे क्षण में उसने भारी घड़ा नन्हे जीव पर दे मारा, और वफ़ादार नेवला वहीं देहरी पर मर गया। फिर वह भीतर दौड़ी — बच्चा मीठी नींद सो रहा था, और पालने के पास मरा हुआ नाग पड़ा था। पल भर में सारी बात समझ में आ गई, और साथ ही ऐसा दुख उमड़ा जिसका कोई पार नहीं। वह उस नन्हे मित्र के लिए फूट-फूटकर रोई, जिसने उसके बेटे के लिए प्राण दिए और बदले में उसकी जल्दबाज़ी की सज़ा पाई। सारा गाँव उसके साथ रोया, और यह कथा आज तक दोहराई जाती है — पहले सोचो, फिर करो।