एक विशाल बरगद की सबसे ऊँची डालों पर एक कौए और कौवी ने अपना घोंसला बना रखा था। पर उसी पेड़ की जड़ के पास एक गहरे बिल में एक काला साँप रहता था। हर साल जब कौवी अंडे देती, तो साँप घात लगाए रहता। जैसे ही माता-पिता दाने की खोज में उड़ते, वह तने पर रेंगकर चढ़ता और एक-एक करके सारे अंडे निगल जाता। बेचारे कौए हर बार लौटकर सूना घोंसला ही पाते।
जब कौवी फिर से अंडे देने वाली हुई, तो वह पति के सामने रो पड़ी। “अब यह पेड़ छोड़ दें। वह काला चोर मेरे बच्चों को फिर खा जाएगा, और मुझसे यह सहा नहीं जाएगा।” पर कौए को अपना पुराना घर प्यारा था; उसने पहले किसी से सलाह लेना चाहा। दोनों उड़कर अपने प्रिय मित्र, एक बुद्धिमान बूढ़े सियार के पास पहुँचे। सियार बोला, “शोक मत करो। बलवान और दुष्ट बल से नहीं, बुद्धि से हराए जाते हैं। सुनो — मेरे पास एक उपाय है।” और उसने ध्यान से पूरी योजना समझा दी।
अगली सुबह दोनों कौए उड़कर नदी के उस घाट पर पहुँचे, जहाँ राजमहल की स्त्रियाँ स्नान करने आई थीं। उनके वस्त्र, मोती और सोने के गहने किनारे पर रखे थे और पास ही सिपाही पहरा दे रहे थे। कौवी ने बेधड़क झपट्टा मारकर एक चमचमाती सोने की माला चोंच में उठाई और जान-बूझकर धीरे-धीरे उड़ चली — बस इतनी धीमी कि सबकी नज़र उस पर बनी रहे। सिपाही चिल्लाते हुए लाठियाँ लेकर पीछे दौड़े, और कौवी सीधी उस पुराने बरगद तक उड़कर सोने की माला साँप के बिल में डाल आई।
सिपाही पेड़ के पास पहुँचे और राजा का सोना निकालने के लिए बिल खोदने लगे। भीतर से क्रोधित काला साँप फन उठाए फुफकारता हुआ बाहर लपका — और चौंके हुए सिपाहियों ने उसी क्षण लाठियों से उसका काम तमाम कर दिया। माला लेकर वे अपनी राह चले गए। उस दिन के बाद कौए और कौवी ने उस विशाल बरगद की चोटी पर चैन से अपने बच्चे पाले, और उस मित्र को आशीष देते रहे जिसकी बुद्धि ने वह कर दिखाया जो उनके पंख और चोंच मिलकर भी नहीं कर सके थे।