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हाथी और गौरैया

प्रथम तंत्र — मित्रभेद

पात्र: गौरैया और उसका जीवनसाथी · घमंडी हाथी · कठफोड़वा · वीणारव मक्खी · मेघनाद मेंढक

तमाल के एक घने पेड़ की फुनगी पर गौरैया और उसके साथी ने अपना घोंसला बनाया था। नन्ही चिड़िया अंडे से रही थी और उस दिन के सपने देखती थी जब उसके बच्चे चहचहाएँगे। पर उस गर्मी में एक घमंडी हाथी धूप से बौखलाया हुआ जंगल रौंदता चला आया। छाँव की चाह में वह तमाल के नीचे खड़ा हुआ और निरे उन्माद में उसने वही डाल पकड़कर तोड़ डाली जिस पर घोंसला था। अंडे चूर-चूर हो गए; चिड़िया और उसका साथी बाल-बाल बचे।

गौरैया का रो-रोकर बुरा हाल था। उसका मित्र कठफोड़वा उसे धीरज बँधाने आया। उसने कोमल स्वर में कहा, “जो हो गया सो हो गया, बहन। बीती पर सदा शोक करना बुद्धिमानों का काम नहीं। चलो, देखें — छोटे-छोटे जीव मिलकर इस बड़े अन्याय का उत्तर दे सकते हैं या नहीं।” कठफोड़वा अपनी मित्र वीणारव मक्खी के पास गया, मक्खी अपने मित्र मेघनाद मेंढक को ले आई, और पहाड़ जैसे हाथी के विरुद्ध चार नन्हे जीवों की पंचायत बैठी।

मेंढक ने योजना समझाई। “दोपहर में जब हाथी ऊँघता है, तब मक्खी उसके कान में अपनी सबसे मीठी तान छेड़े। वह आनंद से आँखें मूँद लेगा। तभी कठफोड़वा उसकी आँखों पर चोंच चलाए, जब तक उसे दिखना बंद न हो जाए। अंधा और प्यास से तड़पता हाथी जब मेरी टर्र-टर्र सुनेगा, तो सोचेगा — जहाँ मेंढक बोलते हैं, वहाँ पानी ज़रूर है। मैं उस गहरे गड्ढे के किनारे बैठूँगा, और वह मेरी आवाज़ के पीछे चला आएगा।”

और हुआ भी यही। मक्खी वीणा-सी गूँजी, हाथी ने आनंद में आँखें मूँदीं, और कठफोड़वे की चोंच बिजली-सी चली — यहाँ तक कि उस महाकाय को कुछ भी सूझना बंद हो गया। दोपहर की धूप से झुलसा, प्यास से पागल हाथी आगे से आती मेंढक की तान सुनकर कृतज्ञ भाव से उसी ओर लड़खड़ाता बढ़ा — और सीधा गहरे गड्ढे के किनारे से नीचे जा गिरा, जहाँ उसके घमंड का सदा के लिए अंत हो गया। गौरैया ने अपने मित्रों के साथ यह देखा, और जंगल युगों तक यह सीख दोहराता रहा — बड़े से बड़ा भी छोटों का तिरस्कार न करे, क्योंकि बुद्धि, एकता और संकल्प नन्हों को भी महान बना देते हैं।

शिक्षा (Moral)

छोटों को कभी तुच्छ मत समझो — एकता और बुद्धि से दुर्बल भी बलशाली का घमंड तोड़ सकते हैं।

हाथी और गौरैया कहानी की शिक्षा क्या है?

छोटों को कभी तुच्छ मत समझो — एकता और बुद्धि से दुर्बल भी बलशाली का घमंड तोड़ सकते हैं।

यह कहानी किस ग्रंथ से है?

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