गहरे, सेवार भरे एक तालाब में दो बड़ी मछलियाँ रहती थीं। एक का नाम था शतबुद्धि — सौ बुद्धियों वाली, और दूसरी का सहस्रबुद्धि — हज़ार बुद्धियों वाली। दोनों को अपनी चतुराई का बड़ा गर्व था। उनका मित्र एकबुद्धि मेंढक, जैसा नाम से ही ज़ाहिर है, एक ही बुद्धि का धनी था — पर तीनों की शामें किनारे पर साथ-साथ अच्छी कटती थीं, और मछलियाँ भोले मेंढक को अकसर समझातीं कि चतुर प्राणी सौ और हज़ार तरीकों से हर संकट से निकल सकता है।
एक शाम सूरज ढलते समय कुछ मछुआरे जाल और दिन की पकड़ से भरी टोकरियाँ उठाए तालाब के पास से गुज़रे। वे रुककर चमकती आँखों से पानी को देखने लगे। “देखो भाइयो, यह तालाब मछलियों से कैसा भरा है — और कितना उथला! कल भोर होते ही आकर इसे छान डालेंगे।” और वे आगे बढ़ गए।
मेंढक का कलेजा धड़क उठा। “मित्रो, तुमने सुना! मेरे पास बुद्धि बस एक है, और वह कहती है — आज ही रात भागो। मैं और मेरी पत्नी सुबह से पहले दूसरे तालाब को चले जाएँगे।” दोनों मछलियाँ अपने डरपोक मित्र पर हँस पड़ीं। “भागें? चार आदमियों की बातों से? यह तालाब हमारे पुरखों का घर है, और आदमी तो जब से दुनिया बनी है मछलियों के पीछे पड़े हैं। मैं पानी के सौ दाँव जानती हूँ,” शतबुद्धि ने शान से कहा। “और मैं हज़ार,” सहस्रबुद्धि बोली। “हम गोते लगाएँगी, पलटकर निकल जाएँगी, कीचड़ में जा छिपेंगी। रुककर देखो, चतुराई कैसे काम करती है।” पर मेंढक हाथ जोड़कर बोला, “मेरी एक बुद्धि कहती है जाओ, तो मुझे जाना ही होगा।” उसी रात वह पत्नी समेत दूर के एक गहरे तालाब में जा बसा।
सूरज उगते ही मछुआरे आए और चौड़े जाल फैला दिए। शतबुद्धि ने गोते लगाए, पैंतरे बदले, तीर-सी भागी; सहस्रबुद्धि ने अपने हज़ारों दाँव आज़माए। पर जाल बहुत थे और तालाब छोटा था। थोड़ी ही देर में दोनों चतुर मछलियाँ मछुआरों की टोकरियों में पड़ी थीं — दिन की सबसे भारी पकड़। लौटते हुए मछुआरे उस दूर वाले तालाब के पास से निकले, तो एकबुद्धि ने उनके कंधों पर ऊँची टँगी दोनों बड़ी मछलियों को देखा और धीरे से अपनी पत्नी से कहा, “समय पर काम आने वाली एक बुद्धि, भागवान, बहस में उलझी हज़ार बुद्धियों से भली।”