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सियार और नगाड़ा

प्रथम तंत्र — मित्रभेद

पात्र: गोमाय सियार

गोमाय नाम का एक सियार कई दिनों से भटक रहा था, पर खाने को एक टुकड़ा भी नहीं मिला था। पेट में चूहे कूद रहे थे और टाँगें काँप रही थीं। सूँघता-सूँघता वह आखिर एक सुनसान मैदान में जा पहुँचा, जहाँ कभी दो सेनाओं में घमासान युद्ध हुआ था। सैनिक कब के जा चुके थे। पीछे रह गए थे टूटे रथ, फटी पताकाएँ — और एक पेड़ के नीचे घास में पड़ा हुआ एक विशाल नगाड़ा।

गोमाय दबे पाँव मैदान में बढ़ा ही था कि हवा तेज़ हो गई, और पेड़ की डालियाँ झूम-झूमकर नगाड़े के कसे हुए चमड़े से टकराने लगीं। ढम्म! ढम्म! वह भीषण आवाज़ बादलों की गरज की तरह सूने मैदान में गूँज उठी। भूखा सियार डर के मारे उछल पड़ा। “यह कौन-सा दैत्य है?” वह घास में दुबककर काँपने लगा। “जिसकी आवाज़ ऐसी हो, वह प्राणी कितना विशाल होगा! मुझे यहाँ से तुरंत भाग जाना चाहिए।”

पर काँपते-काँपते उसे विवेक की बात सूझी। उसने खुद से कहा, “ठहर! डर सच से तेज़ दौड़ता है। बड़े-बूढ़े कहते हैं कि केवल आवाज़ सुनकर घबराकर मैदान नहीं छोड़ना चाहिए — पहले पता तो करो कि माजरा क्या है। हो सकता है यह संकट हो — और हो सकता है यह मेरा भाग्य ही डरावना मुखौटा पहनकर आया हो।” अपनी सारी हिम्मत बटोरकर वह दबे कदमों से उस गरजती आवाज़ की ओर बढ़ चला।

और वहाँ मिला क्या? बस एक बड़ा-सा नगाड़ा, जो हवा से हिलती डालियों के छूते ही ढम-ढम बज उठता था! गोमाय ने उसके चारों ओर चक्कर लगाया, उसे सूँघा, पंजे से थपथपाया — ढम्म! — और अपने ही डर पर ठहाका मारकर हँस पड़ा। यह सोचकर कि भीतर शायद कोई दावत छिपी हो, उसने ऊपर का चमड़ा फाड़ डाला, पर वह गरजने वाला महाजीव भीतर से बिल्कुल खोखला निकला — लकड़ी पर मढ़ा हुआ कोरा चमड़ा। हँसता हुआ सियार आसपास के उजड़े पड़ाव में घूमा, तो वहाँ सैनिकों का छोड़ा हुआ इतना भोजन-पानी मिल गया कि कई दिन की दावत हो जाए। खाते-खाते वह संतोष से सोचने लगा — अच्छा हुआ जो मैंने घबराहट नहीं, हिम्मत चुनी। सबसे ऊँची आवाज़ें अकसर सबसे खोखली निकलती हैं।

शिक्षा (Moral)

केवल आवाज़ से मत डरो — हिम्मत से आगे बढ़कर पहले सच्चाई का पता लगाओ।

सियार और नगाड़ा कहानी की शिक्षा क्या है?

केवल आवाज़ से मत डरो — हिम्मत से आगे बढ़कर पहले सच्चाई का पता लगाओ।

यह कहानी किस ग्रंथ से है?

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