किसी घने जंगल में भासुरक नाम का एक बलशाली शेर राज करता था। उसे अपनी ताकत का ऐसा घमंड था कि वह सुबह से शाम तक शिकार करता रहता — जितना खा सकता था उससे कहीं अधिक पशुओं को मार डालता। पूरे वन में हाहाकार मच गया। अंत में सारे पशु इकट्ठे होकर हाथ जोड़कर शेर के पास गए और बोले, “महाराज, यदि यही चलता रहा तो वन में कोई प्राणी नहीं बचेगा। हम रोज़ अपने में से एक पशु आपके भोजन के लिए भेज दिया करेंगे। आप राजा की तरह आराम कीजिए।” आलसी शेर को यह बात जँच गई, पर उसने चेतावनी दी कि जिस दिन भोजन नहीं पहुँचा, उस दिन वह सबका नाश कर देगा।
अब हर दिन बारी-बारी से एक पशु उदास कदमों से शेर की गुफा की ओर जाता। एक सुबह बारी आई एक नन्हे खरगोश की। वह धीरे-धीरे चलता जाता और सोचता जाता, क्योंकि उसे किसी का भोजन बनना ज़रा भी मंज़ूर न था। रास्ते में एक पुराना कुआँ दिखा, और उसके नन्हे से सिर में एक चमकदार तरकीब कौंध गई। वह जान-बूझकर टहलता-टहलता दोपहर ढले गुफा पर पहुँचा।
भूख से बेहाल भासुरक क्रोध में दहाड़ रहा था। “इतनी देर क्यों लगाई रे छोटे से जीव?” वह गरजा। खरगोश ने काँपते हुए प्रणाम किया और बोला, “क्षमा करें महाराज! हम छह खरगोश भेजे गए थे, पर रास्ते में एक और विशाल शेर अपनी माँद से निकल आया। वह स्वयं को इस वन का असली राजा कहता है। मेरे साथियों को वह खा गया, मैं किसी तरह बचकर आपको सावधान करने आया हूँ। उसने तो आपको कायर तक कहा!”
शेर क्रोध से पागल हो उठा — “मुझे अभी दिखा वह ढोंगी कहाँ है!” खरगोश उसे पुराने कुएँ पर ले गया और भीतर इशारा किया, “वह इसी में रहता है, महाराज।” भासुरक ने झाँका तो गहरे जल में अपनी ही परछाईं उसे घूरती दिखी। वह दहाड़ा, तो कुएँ की गूँज और भी ज़ोर से दहाड़ी। आपे से बाहर होकर शेर अपने प्रतिद्वंद्वी पर झपटा और सीधा गहरे पानी में जा गिरा — फिर कभी वन को सताने न लौटा। नन्हा खरगोश उछलता हुआ घर लौटा, और सब पशुओं ने अपने सबसे छोटे साथी को सबसे बड़ा बुद्धिमान मानकर उसका जयजयकार किया।