किसी व्यापारिक नगर में जीर्णधन नाम का एक व्यापारी-पुत्र रहता था, जिसके दिन इन दिनों बहुत तंगी में कट रहे थे। उसने परदेस जाकर कमाने का निश्चय किया। घर में बेचने-रखने लायक़ देखा तो बस एक ही धरोहर बची थी — ठोस लोहे का एक भारी-भरकम तराजू, जो उसके दादा के ज़माने का था और पुरखों की शान समेटे था। यात्रा पर निकलने से पहले वह उसे अपने एक धनी मित्र के पास ले गया — “भाई, मेरे लौटने तक इसे सँभालकर रखना।” मित्र ने बड़े प्रेम से हामी भरी, और जीर्णधन परदेस चला गया।
कुछ वर्ष भटकने और थोड़ा-बहुत कमाने के बाद जीर्णधन घर लौटा और अपना तराजू माँगने पहुँचा। मित्र, जो वह बढ़िया लोहा कब का बेच चुका था, बड़ा दुखी चेहरा बनाकर बोला, “क्या बताऊँ भाई! तुम्हारा तराजू मैंने कोठरी में रखा था, और चूहे उसे खा गए। तुम तो जानते ही हो — चूहे कुछ भी कुतर डालते हैं।” जीर्णधन सब समझ गया, पर उसने क्रोध नहीं दिखाया। सहज भाव से बोला, “अरे, इतने पैने दाँतों वाले चूहों के आगे किसका वश चलता है? कोई बात नहीं। मैं नदी पर नहाने जा रहा हूँ, अपने छोटे बेटे को मेरे साथ भेज दो, मेरा सामान पकड़ लेगा।” मामला इतनी आसानी से निपटता देख निश्चिंत मित्र ने बेटे को साथ भेज दिया।
स्नान के बाद जीर्णधन चुपचाप बालक को पास की एक गुफा में ले गया, उसे भीतर सुरक्षित बिठाया और गुफा के मुँह पर एक बड़ा पत्थर लुढ़का दिया। फिर अकेला लौट आया। मित्र चिल्लाया, “मेरा बेटा कहाँ है?” जीर्णधन ने गहरी साँस भरकर कहा, “क्षमा करना भाई। हम नदी किनारे खड़े ही थे कि एक बाज़ झपट्टा मारकर बच्चे को उठा ले गया।” “बाज़ बच्चे को उठा ले गया? असंभव! धूर्त, मेरा बेटा लौटा!” दोनों चीखते-चिल्लाते गाँव के पंचों के पास पहुँचे, और मित्र ने न्याय की गुहार लगाई।
पंचों ने भी जीर्णधन को डाँटा — “भला बाज़ बच्चा कैसे उठा सकता है?” उसने विनम्रता से हाथ जोड़े, “माननीय पंचो, जिस नगर में चूहे ठोस लोहे का तराजू खा जाते हैं, वहाँ बाज़ बच्चा क्यों नहीं उठा सकता?” पंचों ने पूछा कि इसका अर्थ क्या है, पूरी कथा सुनी, और ठहाका मारकर हँस पड़े। न्याय सीधा-सा था — तराजू घर लौटे, तो बेटा भी लौट आएगा। छली मित्र ने लोहे का तराजू लौटाया, अपना बेटा पाया, और यह भी जान लिया कि चालाकी का दाम उसी के सिक्के में चुकाया जाता है।