बहुत समय पहले एक उजड़े हुए नगर के खंडहरों में चूहों की एक भरी-पूरी बस्ती फल-फूल रही थी। गिरी हुई दीवारों पर घास उग आई थी, पुराने कुओं में अब भी पानी था, और वहाँ हज़ारों चूहे अपने एक बुद्धिमान राजा के साथ चैन से रहते थे। वहाँ से थोड़ी दूर एक बड़ी झील थी, जहाँ गर्मियों में जंगल के झरने सूख जाने पर हाथियों का एक विशाल झुंड पानी पीने आता था।
एक साल भयंकर सूखा पड़ा, और हाथियों का राजा अपने प्यासे झुंड को झील की ओर ले चला — ठीक उसी उजड़े नगर के बीच से। हाथियों का कोई बुरा इरादा न था, पर उनके भारी-भरकम पैरों तले चूहों के घर ढह गए और अनगिनत नन्हे प्राणी कुचल गए। झुंड के गुज़र जाने पर रोते-बिलखते बचे हुए चूहे अपने राजा के पास इकट्ठे हुए। चूहों के राजा ने गंभीर होकर कहा, “यदि वे इसी रास्ते से लौटे, तो हमारा नामोनिशान नहीं बचेगा। मैं स्वयं जाकर उनसे बात करूँगा।”
नन्हा राजा हाथियों के राजा के पास एक चट्टान पर चढ़कर बोला, “हे महाराज, आपका एक कदम हमारे लिए भूकंप है। हमारी विनती है — अपने झुंड को झील तक किसी और रास्ते से ले जाइए। हम छोटे अवश्य हैं, पर छोटे भी काम आ सकते हैं। शायद किसी दिन हम आपके उपकार का बदला चुका सकें।” गजराज ने उस नन्हे जीव को स्नेह से देखा। यह बात असंभव-सी लगती थी कि चूहे कभी हाथियों के काम आएँगे, पर दया को कारण की ज़रूरत नहीं होती। उसने बात मान ली, और उस दिन से झुंड खंडहरों का चक्कर काटकर लंबे रास्ते से जाने लगा।
कुछ मौसम बीते, और एक राजा के हाथी पकड़ने वाले शिकारियों ने जंगल में मज़बूत जाल बिछा दिए। पूरा झुंड फँस गया — गजराज भी। छटपटाने से बंधन और कसते गए। तब गजराज को अपने नन्हे मित्र याद आए। जाल से बच निकली एक हथिनी दौड़कर खंडहरों तक समाचार ले गई, और चूहों की पूरी बस्ती उमड़ पड़ी। रात भर हज़ारों नन्हे दाँत रस्सियों को कुतरते रहे, और सूरज उगने तक हर गाँठ टुकड़े-टुकड़े हो चुकी थी, हर हाथी आज़ाद था। गजराज ने अपना विशाल मस्तक चूहों के राजा के आगे झुका दिया — उसने जान लिया था कि कोई मित्र छोटा नहीं होता।