पवित्र गंगा के तट पर एक महातपस्वी ऋषि रहते थे, जिनकी साधना में ऐसा बल था कि उनके हाथों से आशीर्वाद फलीभूत हो जाते थे। एक सुबह वे नदी में स्नान कर रहे थे कि ऊपर उड़ते एक बाज़ की पकड़ से उसका शिकार छूट गया, और एक नन्ही-सी चुहिया काँपती हुई उनकी हथेलियों में आ गिरी। दयालु ऋषि उस डरे हुए नन्हे जीव को छोड़ न सके। अपने तपोबल से उन्होंने उसे एक नन्ही कन्या बना दिया और घर ले जाकर अपनी पत्नी को सौंपा। संतानहीन ऋषि-पत्नी ने आँसू भरी आँखों से बच्ची को गले लगा लिया।
कन्या आश्रम में पली-बढ़ी, सुशील और सुंदर। जब वह विवाह योग्य हुई, तो ऋषि ने पत्नी से कहा, “हमारी बेटी के लिए तो सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ वर ही चाहिए।” उन्होंने सूर्य का आवाहन किया — “हे तेजस्वी, मेरी पुत्री से विवाह करो!” पर कन्या ने आँखों पर हाथ रख लिया, “पिताजी, ये तो बहुत जलते हैं — क्या इनसे बड़ा कोई नहीं?” सूर्य ने स्वयं विनम्रता से कहा, “मुझसे बड़ा मेघ है, जो मुझे ढक लेता है।” ऋषि ने मेघ को बुलाया, पर कन्या को वह साँवला और ठंडा लगा; उसने उससे भी बड़ा वर माँगा। मेघ बोला, “मुझसे बड़ा पवन है, जो मुझे आकाश भर में उड़ाए फिरता है।” पर पवन कन्या को अस्थिर और चंचल लगा — और उसने भी मान लिया, “मुझसे बड़ा पर्वत है, जो मेरे सारे झंझावातों में भी अडिग खड़ा रहता है।”
तब ऋषि पुत्री को लेकर विशाल, शांत पर्वत के सामने पहुँचे। पर कन्या का माथा ठनका, “पिताजी, ये तो बड़े कठोर और जड़ हैं। क्या इनसे भी बड़ा कोई है?” पर्वत ने गंभीर स्वर में धीरे से कहा, “है न। मुझसे बड़ा तो नन्हा मूषक है — वह मुझे आर-पार छेद डालता है, मेरे हृदय में ही अपना घर बना लेता है, और मैं उसे रोक नहीं पाता।”
ऋषि ने मूषकराज को बुलावा भेजा, और उसे देखते ही कन्या का मुख पहली बार आनंद से खिल उठा। “पिताजी! यही! इन्हीं के पास मुझे अपनापन लगता है। मुझे फिर से चुहिया बना दीजिए और इन्हीं से मेरा विवाह कर दीजिए।” प्रकृति की इस लीला पर मुस्कराते हुए ऋषि ने उसे फिर नन्ही चुहिया बना दिया, और वह प्रसन्न होकर अपने वर के बिल में चली गई। देह चाहे कोई भी रूप धरे, हृदय अपने स्वजनों की ओर ही लौटता है — स्वभाव सब पर भारी है।