एक झील के किनारे बरगद का पुराना पेड़ था, जिस पर पीढ़ियों से सारसों का दल घोंसले बनाता आया था। पर उसी पेड़ की जड़ की खोह में एक काला साँप रहता था। हर मौसम में, जब सारसों के बच्चे अंडों से निकलते, साँप रात के अँधेरे में चुपचाप चढ़ता और उड़ना सीखने से पहले ही नन्हे बच्चों को निगल जाता। सारस शोक में डूबे रहते, पर उस बलवान साँप से छुटकारे का कोई उपाय उन्हें नहीं सूझता था।
एक दिन एक बूढ़ा सारस पानी के किनारे खड़ा रो रहा था; दुख के मारे उससे मछली भी नहीं पकड़ी जा रही थी। एक केकड़ा टेढ़ी चाल से पास आया और बोला, “चाचा, ये आँसू कैसे?” सारस ने साँप और खोए हुए बच्चों की सारी व्यथा कह सुनाई। केकड़े ने मन ही मन सोचा — ये सारस तो हमारे बैरी हैं, मौका मिलते ही केकड़ों को खा जाते हैं; क्यों न ऐसी सलाह दूँ जो इनका भी काम तमाम कर दे। यह बात छिपाकर वह मीठे स्वर में बोला, “चाचा, उपाय है। किनारे पर आगे एक नेवला रहता है — साँपों का जन्मजात शत्रु। नेवले के बिल से लेकर साँप की खोह तक मछलियों के टुकड़े बिखेर दो। नेवला दावत खाता-खाता आएगा, साँप को पा लेगा — और तुम्हारा बैरी समाप्त।”
सारस खुशी से फूले न समाए। उसी दिन उन्होंने नेवले के घर से लेकर अपने ही पेड़ की खोह तक एक-एक करके मछलियों की कतार बिछा दी। हुआ भी ठीक वैसा ही जैसा केकड़े ने कहा था — पर उसका आधा हिस्सा ही सुखद था। नेवला मछलियों की राह पकड़कर आया, साँप को खोज निकाला और घमासान लड़ाई के बाद उसे मार डाला। सारस डालियों पर नाच उठे।
पर नेवले की नाक साँप पर ही नहीं रुकती। जिस पेड़ से पक्षियों की गंध आती हो, वह उसे कहाँ भूलता! वह अगले दिन फिर आया, उसके अगले दिन फिर — और हर बार थोड़ा और ऊपर चढ़ा। एक-एक करके उन्हीं सारसों ने, जिन्होंने अपने ही द्वार तक दावत की राह बिछाई थी, अपने बच्चों को उस बुलाए हुए मेहमान के हाथों खो दिया। तब जाकर उन्हें केकड़े की धूर्तता और अपनी नासमझी समझ में आई — बड़े-बूढ़े ठीक ही कहते हैं, कोई भी योजना तब तक बुद्धिमानी नहीं, जब तक उसके अंत तक सोच न लिया जाए।