एक शांत झील के किनारे कंबुग्रीव नाम का कछुआ रहता था। संकट और विकट नाम के दो हंस उसके परम मित्र थे। तीनों रोज़ शाम को पानी के किनारे मिलते, और बातूनी कछुआ बिना रुके बोलता रहता, जबकि धैर्यवान हंस चुपचाप सुनते रहते। इसी तरह सुख से बरसों बीत गए। पर एक साल वर्षा नहीं हुई। झील दिन-ब-दिन सूखने लगी और अंत में फटी हुई मिट्टी भर रह गई।
दुखी हंस अपने मित्र के पास आए और बोले, “भैया, अब हमें यहाँ से दूर एक बड़ी झील पर जाना ही होगा। पर तुम न उड़ सकते हो, न इतनी दूर चल सकते हो। तुम्हें छोड़कर कैसे जाएँ?” बातों का धनी कछुआ झट बोला, “एक मज़बूत लकड़ी ले आओ। तुम दोनों उसके दोनों सिरे अपनी चोंच में पकड़ना, और मैं बीच में मुँह से लकड़ी थाम लूँगा। धीरे-धीरे उड़ना, और मुझे भी साथ ले चलना।” हंस प्रसन्न हुए, पर उन्होंने गंभीर होकर चेताया, “याद रखना मित्र — लकड़ी पकड़ने से लेकर उतरने तक मुँह मत खोलना। एक शब्द भी नहीं!” कछुआ हँसा, “मुझे मूर्ख समझते हो क्या? मैं पत्थर की तरह चुप रहूँगा।”
हंसों ने लकड़ी थामी और बीच में लटके कछुए समेत आकाश में उड़ चले। नीचे खेत, पहाड़ियाँ और गाँव सरकते गए। जब वे एक नगर के ऊपर से गुज़रे, तो लोग अचरज से ऊपर देखकर घरों से निकल पड़े और चिल्ला-चिल्लाकर कहने लगे, “देखो, देखो! पक्षी यह कैसी गोल चीज़ उड़ाए लिए जा रहे हैं? अरे, आसमान में गाड़ी का पहिया!”
नीचे का यह शोर कछुए के कानों में गूँजता रहा, और आखिर उससे रहा न गया। ये मूर्ख उसे पहिया कह रहे हैं? जवाब देने के लिए उसने मुँह खोला — “अरे मूर्खो! मैं तो कछु—” — और वह हवा में लुढ़कता हुआ नीचे कठोर धरती पर जा गिरा। वहीं उसकी कहानी समाप्त हो गई। शोकाकुल हंसों ने एक चक्कर लगाया और आगे उड़ गए — अपने उस मित्र को याद करते हुए, जो सब कुछ कर सकता था, बस अपनी जीभ पर लगाम नहीं लगा सकता था।