किसी गाँव में एक धोबी के आँगन में दो पशु रहते थे — एक गधा, जो कपड़ों के गट्ठर ढोता था, और एक कुत्ता, जो घर की रखवाली करता था। धोबी गधे से खूब काम लेता और उसे भरपेट खिलाता भी था, पर पिछले कुछ दिनों से वह कुत्ते की ओर से लापरवाह हो गया था — अकसर उसके कटोरे में कुछ डालना भूल ही जाता। कुत्ता अपनी शिकायत मन में दबाए बैठा था, जबकि खाया-पिया निश्चिंत गधा सोचता था कि मालिक से भला कोई भूल हो ही नहीं सकती।
एक रात, जब थका-हारा धोबी गहरी नींद में था, एक चोर आँगन की दीवार फाँदकर भीतर उतरा। वह दबे पाँव कमरे-कमरे घूमकर कपड़े, पीतल के बर्तन और बचत की छोटी संदूकची समेटने लगा। कुत्ता यह सब देखता रहा — और नहीं भौंका। गधे ने घबराकर उसे कुहनी मारी, “भाई, घर में चोर घुसा है! तू चुप क्यों है? भौंक! मालिक को जगाना तेरा धर्म है!”
कुत्ते ने रूखेपन से मुँह फेर लिया। “मुझे धर्म मत सिखा, मित्र। दिन-रात मैंने इस घर की रखवाली की है, और बदले में मालिक ने मुझे क्या दिया? खाली कटोरा। आज रात जब उसका माल जाएगा, तब शायद उसे याद आएगा कि रखवाले कुत्ते को रोटी क्यों दी जाती है। सीख जाने दे उसे।” गधा सन्न रह गया। “धिक्कार है तुझ पर, जो संकट की घड़ी में मोल-भाव करता है! तू अपना कर्तव्य नहीं निभाएगा, तो मैं ही निभा दूँगा।” और सिर उठाकर गधा पूरी ताकत से रेंकने लगा — ऐसी कानफोड़ू तान कि पूरे गाँव में गूँज गई।
चोर गठरी पटककर दीवार फाँद भागा। धोबी हड़बड़ाकर जागा — पर उसे कोई चोर नहीं दिखा; दिखा तो बस अपना गधा, जो न जाने क्यों आधी रात चाँद की ओर मुँह उठाए पागलों की तरह रेंक रहा था। नींद खराब होने पर आगबबूला धोबी ने डंडा उठाया और बेचारे गधे की खूब मरम्मत करके फिर सोने चला गया। चोट खाया, हक्का-बक्का गधा अपने कोने में बैठ गया। उसे एक कड़वा सबक मिल चुका था — हर सेवक का अपना नियत काम होता है, और अपना कर्तव्य छोड़कर दूसरे का काम करने वाले को नेक इरादा भी दुख ही दिलाता है।