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बिल्ली और दूध

तेनाली रामा लोककथा

पात्र: तेनाली रामा · राजा कृष्णदेवराय · महल की बिल्लियाँ · दरबारी

एक साल विजयनगर के अन्न-भंडार चूहों से भर गए, और राजा कृष्णदेवराय को एक राजसी उपाय सूझा: बिल्लियाँ! बढ़िया बिलौटे मँगवाए गए और हर दरबारी को एक-एक बिलौटा और राजकीय गोशाला की एक दुधारू गाय सौंपी गई, ताकि हर बिल्ली ताज़ा दूध पीकर बलवान बने। राजा ने घोषणा की, "छह महीने बाद बिल्लियों का निरीक्षण होगा।"

दरबारियों ने अपने बिलौटों को राजकुमारों की तरह पाला। पर तेनाली रामा के घर का हाल कुछ और था। पहली ही सुबह उसने अपने बिलौटे के आगे चूल्हे से उतरा, भाप छोड़ता गर्म दूध का कटोरा रख दिया। लालची बिलौटे ने झट मुँह डाला, जीभ जल गई, और वह चीख़ता हुआ उछल भागा। उस दिन से दूध की गंध भर से वह छत पर जा चढ़ता। सो सुबह-शाम राजकीय गाय का दूध तेनाली के अपने बच्चे पीते रहे, और बिल्ली मज़े में जीती रही — जैसे बिल्लियाँ सदा जीती आई हैं — भंडार के चूहों और रसोई के जूठन पर।

भव्य निरीक्षण के दिन मोटी-चिकनी बिल्लियाँ एक-एक कर पेश हुईं। सबसे अंत में आई तेनाली की बिल्ली — चमकती आँखों वाली, फुर्तीली, चूहे पकड़ने में उस्ताद, पर छड़ी-सी दुबली। राजा गरजे, "विदूषक! क्या मेरी गाय ने दूध नहीं दिया?" तेनाली ने उदास होकर कहा, "समुद्र भर दिया, महाराज, पर यह विचित्र प्राणी दूध छूने से ही इनकार करता है। स्वयं देख लीजिए।" कटोरा लाया गया। रखते ही बिल्ली की पीठ तन गई, वह फुफकारी और सभा-भवन से बाहर भाग गई।

दरबार सन्न रह गया — दूध से भागती बिल्ली! फिर राजा की आँखें तेनाली पर सिकुड़ीं, जो पूरी मासूमियत से देख रहा था, और सारा भेद खुल गया। राजा हँस पड़े। "जली बिल्ली ठंडे दूध से भी डरती है — और चतुर धूर्त राजाज्ञा को भी अपने घर का भोजन बना लेता है! बता रामा, मेरी योजना में खोट क्या थी?" तेनाली ने विनम्रता से कहा, "बस इतनी, महाराज — बिल्लियों को दूध नहीं, चूहे तगड़ा करते हैं; और भूखे बच्चों को दूध की ज़रूरत दोनों से ज़्यादा है। दूध बच्चों को पिलाइए, और बिल्लियों को उनका असली काम करने दीजिए: चूहे पकड़ना।" दंड माफ़ हुआ; गायें ग़रीबों के पास ही रहीं।

शिक्षा (Moral)

दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँक कर पीता है — और बिना समझ की योजनाएँ न बिल्ली का पेट भरती हैं, न राज्य का।

बिल्ली और दूध कहानी की शिक्षा क्या है?

दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँक कर पीता है — और बिना समझ की योजनाएँ न बिल्ली का पेट भरती हैं, न राज्य का।

यह कहानी किस ग्रंथ से है?

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