विजयनगर की एक गली में गोपन्ना नाम का एक सीधा-सादा लकड़हारा रहता था, और पड़ोसी उसके बारे में एक क्रूर अफ़वाह फुसफुसाते थे: "सुबह-सुबह सबसे पहले इसका चेहरा देख लो, तो पूरा दिन चौपट।" अफ़वाह गली-गली कूदती हुई महल तक जा पहुँची।
"बकवास," राजा कृष्णदेवराय ने कहा — पर जिज्ञासा का बीज पड़ चुका था। उन्होंने आदेश दिया कि भोर में गोपन्ना को उनके कक्ष के बाहर खड़ा किया जाए, ताकि दिन का पहला चेहरा उसी का हो। संयोग ऐसा कि उस दिन सब कुछ उल्टा पड़ा। चौखट से राजा का अँगूठा टकराया। रसोई ने राजसी नाश्ता जला दिया और वे लंबे दरबार में भूखे बैठे रहे। एक हरकारा ख़बर लाया कि आँधी में अनाज की दो नावें डूब गईं। शाम तक राजा का सिर फटने लगा, और दरबारी ज्ञान बघारते हुए बुदबुदाए: "अपशकुन, महाराज। लकड़हारे का चेहरा।" काले क्रोध में राजा गरजे, "ऐसा है? तो वह अभागा अब किसी की सुबह नहीं बिगाड़ेगा। उसे फाँसी दो!"
बेचारा गोपन्ना कोठरी में रोता रहा, और यह बात तेनाली रामा तक पहुँची, जो तुरंत आया और देर तक बंदी के कान में कुछ समझाता रहा।
वध-स्थल पर, रिवाज के अनुसार, उसे अंतिम शब्द कहने की अनुमति मिली। गोपन्ना सीधा खड़ा हुआ और जैसा सिखाया गया था, वैसा बोला: "विजयनगर के लोगो! कहते हैं मेरा चेहरा राज्य का सबसे अभागा चेहरा है — क्योंकि भोर में राजा ने इसे देखा और उनका नाश्ता छूट गया। पर उसी भोर मैंने राजा का चेहरा देखा था — और मेरी तो जान जा रही है। अब आप ही न्याय कीजिए, भले लोगो: किसका चेहरा ज़्यादा अभागा है?"
भीड़ में सिहरन दौड़ गई; हँसने की हिम्मत किसी की नहीं हुई, और तर्क का जवाब किसी के पास नहीं था। जब ये शब्द कृष्णदेवराय तक पहुँचे, वे देर तक चुप बैठे रहे — फिर स्वयं वध-स्थल पहुँचे, अपनी तलवार से रस्सी काटी और लकड़हारे की झोली सोने से भर दी। "मित्र, तुम्हारा चेहरा इस साल का मेरा सबसे अच्छा सबक़ लाया," वे बोले। "आज मेरे राज्य में अपशकुन बस एक था — फुसफुसाहटों पर कान धरता राजा।" और उन्होंने आदेश लिखवाया कि विजयनगर में फिर कभी किसी को शकुन-अपशकुन के नाम पर दंड न दिया जाए।