एक झुलसती गर्मी में विजयनगर के कुएँ सूखने लगे और तेनाली रामा का बगीचा मुरझाने लगा। बाल्टी-बाल्टी पानी देना धीमा, थका देनेवाला काम था — और उसी हफ़्ते दो चोरों ने तय किया कि प्रसिद्ध विदूषक का समृद्ध दिखता घर लूटने लायक़ है।
अँधेरा होते ही वे आँगन में घुसकर कुएँ के पास की घनी झाड़ियों में छिप गए और घरवालों के सोने की राह देखने लगे। पर हाथ धोने निकले तेनाली ने पत्तों की सरसराहट सुनी और ताकती आँखों की चमक पकड़ ली। वह न चिल्लाया, न पहरेदार बुलाए। भीतर लौटकर ज़रूरत से कुछ ऊँची आवाज़ में बोला, "सुनती हो! आजकल नगर चोरों से भरा है। घर में कुछ भी सुरक्षित नहीं। हमारे सारे गहने और सिक्के ले आओ — लोहे के संदूक़ में बंद करके कुएँ में डुबो देंगे। वहाँ ढूँढ़ने की तो किसी चोर को सूझेगी भी नहीं!"
खूब कराहते-खनकाते हुए पति-पत्नी एक भारी संदूक़ घसीट लाए — जो ठसाठस पत्थरों से भरा था — और ज़ोरदार छपाके के साथ कुएँ में उतार दिया। फिर दीये बुझ गए, घर सो गया।
झाड़ियों में चोर ख़ुशी से एक-दूसरे से लिपट गए। रातभर वे बाल्टी पर बाल्टी खींचते रहे और पानी बाहर उलटते रहे, ताकि कुआँ ख़ाली हो और ख़ज़ाना हाथ लगे। और वह पानी उन्हीं नालियों में बहता गया जो तेनाली शाम को खोद गया था — प्यासे बगीचे की हर क्यारी तर हो गई। पौ फटते-फटते कुआँ लगभग ख़ाली था, बगीचा जी भरकर सिंच चुका था, और रस्सी उस संदूक़ से टकराई जिसे ऊपर खींचने में उनकी बची-खुची ताक़त निकल गई। भीतर पत्थर थे — और ताड़पत्र की एक चिट: 'मेरा बगीचा सींचने की मज़दूरी: बढ़िया पत्थरों का एक संदूक़।'
तभी अंगड़ाई लेता तेनाली प्रकट हुआ। "मित्रो, जो काम मुझे महीना लेता, तुमने एक रात में कर दिखाया! क्यारियाँ सूखें तो फिर आना।" चोर उसके पैरों में गिर पड़े, क्षमा माँगी और नगर छोड़कर भागे — और यह क़िस्सा विजयनगर में उस पानी से भी तेज़ दौड़ा जो बगीचे में दौड़ा था।