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स्वामिभक्त वीरवर

बेताल पच्चीसी — पहेली 4

पात्र: राजा विक्रमादित्य · बेताल · राजा शूद्रक · योद्धा वीरवर · वीरवर का परिवार

राजा विक्रमादित्य फिर आधी रात के श्मशान से शव उठाए, पत्थर-से मौन, योगी को दिया वचन निभाते चले जा रहे थे। और भीतर बसे बेताल ने हँसी-भरे स्वर में कहा: “एक कथा सुनो, राजन — पर यदि मेरी पहेली का उत्तर जानते हुए चुप रहे, तो तुम्हारे सिर के सौ टुकड़े हो जाएँगे।”

और बेताल ने कथा शुरू की। “राजा शूद्रक के द्वार पर वीरवर नाम का एक योद्धा नौकरी माँगने आया। ‘मेरा वेतन है पाँच सौ स्वर्ण मुद्राएँ प्रतिदिन,’ उसने कहा, और सारा दरबार दंग रह गया — पर उस पुरुष की शांत आँखों में कुछ ऐसा था कि राजा मान गया। और वीरवर उस बड़ी रक़म का अधिकांश हर दिन देवताओं और दीन-दुखियों को दे देता, थोड़ा-सा अपनी पत्नी, बेटे और बेटी के लिए रखता, और रात-रात भर तलवार थामे महल के द्वार पर पहरा देता।

“आँधी-भरी एक आधी रात राजा को दूर कहीं किसी स्त्री के फूट-फूटकर रोने की आवाज़ सुनाई दी। ‘मेरी नगरी में कौन रोता है?’ द्वार से वीरवर बोला, ‘मैं पता लगाता हूँ, महाराज,’ और अँधेरे में चल पड़ा — और जिज्ञासु राजा चुपके से पीछे हो लिया। एक सुनसान जगह वीरवर को आँसुओं में डूबी एक तेजोमयी देवी मिली: वह स्वयं राज्य की राजलक्ष्मी थी। ‘विपत्ति आ रही है,’ उसने कहा। ‘तीन दिन में राजा के प्राण जाएँगे — जब तक कोई वीर-पुत्र अपनी इच्छा से देवी को अर्पित न हो।’ वीरवर सीधा घर गया और परिवार को सब बताया। उसके छोटे बेटे ने हाथ जोड़े: ‘सहर्ष, पिताजी — मेरे छोटे-से जीवन का इससे अच्छा उपयोग क्या कि हमारे राजा बच जाएँ?’ देवी के मंदिर में बालक ने प्रणाम कर प्राण त्याग दिए; उसकी माँ और बहन वियोग न सह सकीं और वहीं उसके पास प्राण त्याग बैठीं; और सबसे अंत में वीरवर ने भी उनका अनुसरण करने को तलवार उठाई, क्योंकि वह अपने परिवार के बाद जीना नहीं चाहता था। उसी क्षण राजा छाया से निकलकर कूद पड़ा: ‘रुको! हे देवी, मेरे प्राण ले लो — पर इस निष्ठावान परिवार को जीवन दो!’ और देवी स्वयं प्रकट हुईं, असीम प्रसन्न। ‘ऐसा सेवक और ऐसा राजा इस धरती ने कभी नहीं देखा,’ उन्होंने कहा। ‘मैं प्राण लेती नहीं — देती हूँ।’ और उनके वचन से पूरा परिवार जी उठा, और राज्य पर आशीषों की वर्षा हुई।”

“अब उत्तर दो, राजा विक्रम — इन सबमें सबसे बड़ा कौन?” और विक्रम बोले: “राजा। वीरवर और उसका परिवार महान थे, पर वे सेवक-धर्म की राह पर चले, क्योंकि स्वामी की रक्षा सेवक का धर्म है। पर राजा पर कोई कर्तव्य नहीं था — फिर भी उसने एक द्वारपाल के परिवार के लिए अपने प्राण, अपने राज्य का सूर्य ही, अर्पित कर दिए। कर्तव्य से परे का बलिदान ही दुर्लभतम महानता है।” “उत्तम उत्तर!” बेताल चिल्लाया — “पर तुम बोल पड़े!” और वह उड़कर पुराने पेड़ पर जा पहुँचा।

शिक्षा (Moral)

अपना कर्तव्य निभाना श्रेष्ठ है, पर दुर्लभतम महानता उस बलिदान में है जिसकी कर्तव्य ने कभी माँग ही नहीं की।

स्वामिभक्त वीरवर कहानी की शिक्षा क्या है?

अपना कर्तव्य निभाना श्रेष्ठ है, पर दुर्लभतम महानता उस बलिदान में है जिसकी कर्तव्य ने कभी माँग ही नहीं की।

यह कहानी किस ग्रंथ से है?

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