குணத்ரயவிபாகயோக
Bhagavad Gita Chapter 14 in Tamil
Guṇa Traya Vibhāg Yog · तीन गुण · 27 श्लोक
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अध्याय सारांश
भगवद गीता का चौदहवा अध्याय गुणत्रयविभागयोग है। इस अध्याय में, कृष्ण भौतिक प्रकृति के तीन गुणों का वर्णन करते हैं जिनसे भौतिक संसार में सब कुछ प्रभावित होता है - अच्छाई, लालसा और अज्ञान। आगे वह इन तीनों गुणों के प्रधान अभिलक्षणों अथवा कारणों का वर्णन करते हैं और बताते हैं कि कैसे ये तीनों गुण मनुष्य को प्रभावित करते हैं। फिर वह ऐसे व्यक्तियों की विभिन्न विशेषताओं का वर्णन करते हैं जो कि इन गुणों पर जीत पा चुके हैं। इस अध्याय के अंत में कृष्ण हमें सच्ची भक्ति कि शक्ति का स्मरण कराते हैं और बताते हैं की हम कैसे भगवन के साथ जुड़ कर इन गुणों को पार कर सकते हैं।
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ஶ்ரீ பகவாநுவாசபரம் பூயஃ ப்ரவக்ஷ்யாமி ஜ்ஞாநாநாம் ஜ்ஞாநமுத்தமம்।யஜ்ஜ்ஞாத்வா முநயஃ ஸர்வே பராம் ஸித்திமிதோ கதாஃ॥
śhrī-bhagavān uvācha paraṁ bhūyaḥ pravakṣhyāmi jñānānāṁ jñānam uttamam yaj jñātvā munayaḥ sarve parāṁ siddhim ito gatāḥ
अर्थश्री भगवान् ने कहा -- समस्त ज्ञानों में उत्तम परम ज्ञान को मैं पुन: कहूंगा, जिसको जानकर सभी मुनिजन इस (लोक) से जाकर (इस जीवनोपरान्त) परम सिद्धि को प्राप्त हुए हैं।।
இதம் ஜ்ஞாநமுபாஶ்ரித்ய மம ஸாதர்ம்யமாகதாஃ।ஸர்கேऽபி நோபஜாயந்தே ப்ரலயே ந வ்யதந்தி ச॥
idaṁ jñānam upāśhritya mama sādharmyam āgatāḥ sarge ’pi nopajāyante pralaye na vyathanti cha
अर्थइस ज्ञान का आश्रय लेकर मेरे स्वरूप (सार्धम्यम्) को प्राप्त पुरुष सृष्टि के आदि में जन्म नहीं लेते और प्रलयकाल में व्याकुल भी नहीं होते हैं।।
மம யோநிர்மஹத்ப்ரஹ்ம தஸ்மிந் கர்பம் ததாம்யஹம்।ஸம்பவஃ ஸர்வபூதாநாம் ததோ பவதி பாரத॥
mama yonir mahad brahma tasmin garbhaṁ dadhāmy aham sambhavaḥ sarva-bhūtānāṁ tato bhavati bhārata
अर्थहे भारत ! मेरी महद् ब्रह्मरूप प्रकृति, (भूतों की) योनि है, जिसमें मैं गर्भाधान करता हूँ; इससे समस्त भूतों की उत्पत्ति होती है।।
ஸர்வயோநிஷு கௌந்தேய மூர்தயஃ ஸம்பவந்தி யாஃ।தாஸாம் ப்ரஹ்ம மஹத்யோநிரஹம் பீஜப்ரதஃ பிதா॥
sarva-yoniṣhu kaunteya mūrtayaḥ sambhavanti yāḥ tāsāṁ brahma mahad yonir ahaṁ bīja-pradaḥ pitā
अर्थहे कौन्तेय ! समस्त योनियों में जितनी मूर्तियाँ (शरीर) उत्पन्न होती हैं, उन सबकी योनि अर्थात् गर्भ है महद्ब्रह्म और मैं बीज की स्थापना करने वाला पिता हूँ।।
ஸத்த்வம் ரஜஸ்தம இதி குணாஃ ப்ரக்ரு'திஸம்பவாஃ।நிபத்நந்தி மஹாபாஹோ தேஹே தேஹிநமவ்யயம்॥
sattvaṁ rajas tama iti guṇāḥ prakṛiti-sambhavāḥ nibadhnanti mahā-bāho dehe dehinam avyayam
अर्थहे महाबाहो ! सत्त्व, रज और तम ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण देही आत्मा को देह के साथ बांध देते हैं।।
தத்ர ஸத்த்வம் நிர்மலத்வாத்ப்ரகாஶகமநாமயம்।ஸுகஸங்கேந பத்நாதி ஜ்ஞாநஸங்கேந சாநக॥
tatra sattvaṁ nirmalatvāt prakāśhakam anāmayam sukha-saṅgena badhnāti jñāna-saṅgena chānagha
अर्थहे निष्पाप अर्जुन ! इन (तीनों) में, सत्त्वगुण निर्मल होने से प्रकाशक और अनामय (निरुपद्रव, निर्विकार या निरोग) है; (वह जीव को) सुख की आसक्ति से और ज्ञान की आसक्ति से बांध देता है।।
ரஜோ ராகாத்மகம் வித்தி த்ரு'ஷ்ணாஸங்கஸமுத்பவம்।தந்நிபத்நாதி கௌந்தேய கர்மஸங்கேந தேஹிநம்॥
rajo rāgātmakaṁ viddhi tṛiṣhṇā-saṅga-samudbhavam tan nibadhnāti kaunteya karma-saṅgena dehinam
अर्थहे कौन्तेय ! रजोगुण को रागस्वरूप जानो, जिससे तृष्णा और आसक्ति उत्पन्न होती है। वह देही आत्मा को कर्मों की आसक्ति से बांधता है।।
தமஸ்த்வஜ்ஞாநஜம் வித்தி மோஹநம் ஸர்வதேஹிநாம்।ப்ரமாதாலஸ்யநித்ராபிஸ்தந்நிபத்நாதி பாரத॥
tamas tv ajñāna-jaṁ viddhi mohanaṁ sarva-dehinām pramādālasya-nidrābhis tan nibadhnāti bhārata
अर्थऔर हे भारत ! तमोगुण को अज्ञान से उत्पन्न जानो; जो समस्त देहधारियों (जीवों) को मोहित करने वाला है। वह प्रमाद, आलस्य और निद्रा के द्वारा जीव को बांधता है।।
ஸத்த்வம் ஸுகே ஸஞ்ஜயதி ரஜஃ கர்மணி பாரத।ஜ்ஞாநமாவ்ரு'த்ய து தமஃ ப்ரமாதே ஸஞ்ஜயத்யுத॥
sattvaṁ sukhe sañjayati rajaḥ karmaṇi bhārata jñānam āvṛitya tu tamaḥ pramāde sañjayaty uta
अर्थहे भारत ! सत्त्वगुण सुख में आसक्त कर देता है और रजोगुण कर्म में, किन्तु तमोगुण ज्ञान को आवृत्त करके जीव को प्रमाद से युक्त कर देता है।।
ரஜஸ்தமஶ்சாபிபூய ஸத்த்வம் பவதி பாரத।ரஜஃ ஸத்த்வம் தமஶ்சைவ தமஃ ஸத்த்வம் ரஜஸ்ததா॥
rajas tamaśh chābhibhūya sattvaṁ bhavati bhārata rajaḥ sattvaṁ tamaśh chaiva tamaḥ sattvaṁ rajas tathā
अर्थहे भारत ! कभी रज और तम को अभिभूत (दबा) करके सत्त्वगुण की वृद्धि होती है, कभी रज और सत्त्व को दबाकर तमोगुण की वृद्धि होती है, तो कभी तम और सत्त्व को अभिभूत कर रजोगुण की वृद्धि होती है।।
ஸர்வத்வாரேஷு தேஹேऽஸ்மிந்ப்ரகாஶ உபஜாயதே।ஜ்ஞாநம் யதா ததா வித்யாத்விவ்ரு'த்தம் ஸத்த்வமித்யுத॥
sarva-dvāreṣhu dehe ’smin prakāśha upajāyate jñānaṁ yadā tadā vidyād vivṛiddhaṁ sattvam ity uta
अर्थजब इस देह के द्वारों अर्थात् समस्त इन्द्रियों में ज्ञानरूप प्रकाश उत्पन्न होता है, तब सत्त्वगुण को प्रवृद्ध हुआ जानो।।
லோபஃ ப்ரவ்ரு'த்திராரம்பஃ கர்மணாமஶமஃ ஸ்ப்ரு'ஹா।ரஜஸ்யேதாநி ஜாயந்தே விவ்ரு'த்தே பரதர்ஷப॥
lobhaḥ pravṛittir ārambhaḥ karmaṇām aśhamaḥ spṛihā rajasy etāni jāyante vivṛiddhe bharatarṣhabha
अर्थहे भरत-श्रेष्ठ ! रजोगुण के प्रवृद्ध होने पर लोभ, प्रवृत्ति (सामान्य चेष्टा) कर्मों का आरम्भ, शम का अभाव तथा स्पृहा, ये सब उत्पन्न होते हैं।।
அப்ரகாஶோऽப்ரவ்ரு'த்திஶ்ச ப்ரமாதோ மோஹ ஏவ ச।தமஸ்யேதாநி ஜாயந்தே விவ்ரு'த்தே குருநந்தந॥
aprakāśho ’pravṛittiśh cha pramādo moha eva cha tamasy etāni jāyante vivṛiddhe kuru-nandana
अर्थहे कुरुनन्दन ! तमोगुण के प्रवृद्ध होने पर अप्रकाश, अप्रवृत्ति, प्रमाद और मोह ये सब उत्पन्न होते हैं।।
யதா ஸத்த்வே ப்ரவ்ரு'த்தே து ப்ரலயம் யாதி தேஹப்ரு'த்।ததோத்தமவிதாம் லோகாநமலாந்ப்ரதிபத்யதே॥
yadā sattve pravṛiddhe tu pralayaṁ yāti deha-bhṛit tadottama-vidāṁ lokān amalān pratipadyate
अर्थजब यह जीव (देहभृत्) सत्त्वगुण की प्रवृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब उत्तम कर्म करने वालों के निर्मल अर्थात् स्वर्गादि लोकों को प्राप्त होता है।।
ரஜஸி ப்ரலயம் கத்வா கர்மஸங்கிஷு ஜாயதே।ததா ப்ரலீநஸ்தமஸி மூடயோநிஷு ஜாயதே॥
rajasi pralayaṁ gatvā karma-saṅgiṣhu jāyate tathā pralīnas tamasi mūḍha-yoniṣhu jāyate
अर्थरजोगुण के प्रवृद्ध काल में मृत्यु को प्राप्त होकर कर्मासक्ति वाले (मनुष्य) लोक में वह जन्म लेता है तथा तमोगुण के प्रवृद्धकाल में (मरण होने पर) मूढ़योनि में जन्म लेता है।।
கர்மணஃ ஸுக்ரு'தஸ்யாஹுஃ ஸாத்த்விகம் நிர்மலம் பலம்।ரஜஸஸ்து பலம் துஃகமஜ்ஞாநம் தமஸஃ பலம்॥
karmaṇaḥ sukṛitasyāhuḥ sāttvikaṁ nirmalaṁ phalam rajasas tu phalaṁ duḥkham ajñānaṁ tamasaḥ phalam
अर्थशुभ कर्म का फल सात्विक और निर्मल कहा गया है; रजोगुण का फल दु;ख और तमोगुण का फल अज्ञान है।।
ஸத்த்வாத்ஸஞ்ஜாயதே ஜ்ஞாநம் ரஜஸோ லோப ஏவ ச।ப்ரமாதமோஹௌ தமஸோ பவதோऽஜ்ஞாநமேவ ச॥
sattvāt sañjāyate jñānaṁ rajaso lobha eva cha pramāda-mohau tamaso bhavato ’jñānam eva cha
अर्थसत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है। रजोगुण से लोभ तथा तमोगुण से प्रमाद, मोह और अज्ञान उत्पन्न होता है।।
ஊர்த்வம் கச்சந்தி ஸத்த்வஸ்தா மத்யே திஷ்டந்தி ராஜஸாஃ।ஜகந்யகுணவ்ரு'த்திஸ்தா அதோ கச்சந்தி தாமஸாஃ॥
ūrdhvaṁ gachchhanti sattva-sthā madhye tiṣhṭhanti rājasāḥ jaghanya-guṇa-vṛitti-sthā adho gachchhanti tāmasāḥ
अर्थसत्त्वगुण में स्थित पुरुष उच्च (लोकों को) जाते हैं; राजस पुरुष मध्य (मनुष्य लोक) में रहते हैं और तमोगुण की अत्यन्त हीन प्रवृत्तियों में स्थित तामस लोग अधोगति को प्राप्त होते हैं।।
நாந்யம் குணேப்யஃ கர்தாரம் யதா த்ரஷ்டாநுபஶ்யதி।குணேப்யஶ்ச பரம் வேத்தி மத்பாவம் ஸோऽதிகச்சதி॥
nānyaṁ guṇebhyaḥ kartāraṁ yadā draṣhṭānupaśhyati guṇebhyaśh cha paraṁ vetti mad-bhāvaṁ so ’dhigachchhati
अर्थजब द्रष्टा (साधक) पुरुष तीनों गुणों के अतिरिक्त किसी अन्य को कर्ता नहीं देखता, अर्थात् नहीं समझता है और तीनों गुणों से परे मेरे तत्व को जानता है, तब वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।।
குணாநேதாநதீத்ய த்ரீந்தேஹீ தேஹஸமுத்பவாந்।ஜந்மம்ரு'த்யுஜராதுஃகைர்விமுக்தோऽம்ரு'தமஶ்நுதே॥
guṇān etān atītya trīn dehī deha-samudbhavān janma-mṛityu-jarā-duḥkhair vimukto ’mṛitam aśhnute
अर्थयह देही पुरुष शरीर की उत्पत्ति के कारणरूप तीनों गुणों से अतीत होकर जन्म, मृत्यु, जरा और दु:खों से विमुक्त हुआ अमृतत्व को प्राप्त होता है।।
அர்ஜுந உவாசகைர்லிம்கைஸ்த்ரீந்குணாநேதாநதீதோ பவதி ப்ரபோ।கிமாசாரஃ கதம் சைதாம்ஸ்த்ரீந்குணாநதிவர்ததே॥
arjuna uvācha kair liṅgais trīn guṇān etān atīto bhavati prabho kim āchāraḥ kathaṁ chaitāns trīn guṇān ativartate
अर्थअर्जुन ने कहा -- हे प्रभो ! इन तीनो गुणों से अतीत हुआ पुरुष किन लक्षणों से युक्त होता है ? वह किस प्रकार के आचरण वाला होता है ? और, वह किस उपाय से इन तीनों गुणों से अतीत होता है।।
ஶ்ரீ பகவாநுவாசப்ரகாஶம் ச ப்ரவ்ரு'த்திம் ச மோஹமேவ ச பாண்டவ।ந த்வேஷ்டி ஸம்ப்ரவ்ரு'த்தாநி ந நிவ்ரு'த்தாநி காங்க்ஷதி॥
śhrī-bhagavān uvācha prakāśhaṁ cha pravṛittiṁ cha moham eva cha pāṇḍava na dveṣhṭi sampravṛittāni na nivṛittāni kāṅkṣhati
अर्थश्रीभगवान् ने कहा -- हे पाण्डव ! (ज्ञानी पुरुष) प्रकाश, प्रवृत्ति और मोह के प्रवृत्त होने पर भी उनका द्वेष नहीं करता तथा निवृत्त होने पर उनकी आकांक्षा नहीं करता है।।
உதாஸீநவதாஸீநோ குணைர்யோ ந விசால்யதே।குணா வர்தந்த இத்யேவ யோऽவதிஷ்டதி நேங்கதே॥
udāsīna-vad āsīno guṇair yo na vichālyate guṇā vartanta ity evaṁ yo ’vatiṣhṭhati neṅgate
अर्थजो उदासीन के समान आसीन होकर गुणों के द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता और "गुण ही व्यवहार करते हैं" ऐसा जानकर स्थित रहता है और उस स्थिति से विचलित नहीं होता।।
ஸமதுஃகஸுகஃ ஸ்வஸ்தஃ ஸமலோஷ்டாஶ்மகாஞ்சநஃ।துல்யப்ரியாப்ரியோ தீரஸ்துல்யநிந்தாத்மஸம்ஸ்துதிஃ॥
sama-duḥkha-sukhaḥ sva-sthaḥ sama-loṣhṭāśhma-kāñchanaḥ tulya-priyāpriyo dhīras tulya-nindātma-sanstutiḥ
अर्थजो स्वस्थ (स्वरूप में स्थित), सुख-दु:ख में समान रहता है तथा मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण में समदृष्टि रखता है; ऐसा वीर पुरुष प्रिय और अप्रिय को तथा निन्दा और आत्मस्तुति को तुल्य समझता है।।
மாநாபமாநயோஸ்துல்யஸ்துல்யோ மித்ராரிபக்ஷயோஃ।ஸர்வாரம்பபரித்யாகீ குணாதீதஃ ஸ உச்யதே॥
mānāpamānayos tulyas tulyo mitrāri-pakṣhayoḥ sarvārambha-parityāgī guṇātītaḥ sa uchyate
अर्थजो मान और अपमान में सम है; शत्रु और मित्र के पक्ष में भी सम है, ऐसा सर्वारम्भ परित्यागी पुरुष गुणातीत कहा जाता है।।
மாம் ச யோऽவ்யபிசாரேண பக்ிதயோகேந ஸேவதே।ஸ குணாந்ஸமதீத்யைதாந் ப்ரஹ்மபூயாய கல்பதே॥
māṁ cha yo ’vyabhichāreṇa bhakti-yogena sevate sa guṇān samatītyaitān brahma-bhūyāya kalpate
अर्थजो पुरुष अव्यभिचारी भक्तियोग के द्वारा मेरी सेवा अर्थात् उपासना करता है, वह इन तीनों गुणों के अतीत होकर ब्रह्म बनने के लिये योग्य हो जाता है।।
ப்ரஹ்மணோ ஹி ப்ரதிஷ்டாऽஹமம்ரு'தஸ்யாவ்யயஸ்ய ச।ஶாஶ்வதஸ்ய ச தர்மஸ்ய ஸுகஸ்யைகாந்திகஸ்ய ச॥
brahmaṇo hi pratiṣhṭhāham amṛitasyāvyayasya cha śhāśhvatasya cha dharmasya sukhasyaikāntikasya cha
अर्थक्योंकि मैं अमृत, अव्यय, ब्रह्म, शाश्वत धर्म और ऐकान्तिक अर्थात् पारमार्थिक सुख की प्रतिष्ठा हूँ।।