க்ஷேத்ர-க்ஷேத்ரஜ்ஞவிபாகயோக
Bhagavad Gita Chapter 13 in Tamil
Kṣhetra Kṣhetrajña Vibhāg Yog · क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ · 35 श्लोक
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अध्याय सारांश
भगवद गीता का तेरवाह अध्याय क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग है। क्षेत्र शब्द का मतलब भूमि और क्षेत्ररक्षण का मतलब क्षेत्र का जानकार है। हमारा भौतिक शरीर क्षेत्र के सामान है और हमारी अमर आत्मा क्षेत्र के जानकार के सामान है। इस अध्याय में, कृष्ण भौतिक शरीर और अमर आत्मा के बीच भेद करते हैं। वह बताते हैं कि भौतिक शरीर अस्थायी और विनाशकारी है जबकि आत्मा स्थायी और शाश्वत है। भौतिक शरीर नष्ट हो सकता है लेकिन आत्मा कभी भी नष्ट नहीं हो सकती। यह अध्याय फिर भगवान का वर्णन करता है, जो की सर्वोच्च आत्मा हैं। सभी व्यक्तिगत आत्माएं सर्वोच्च आत्मा से उत्पन्न हुई हैं। जो स्पष्ट रूप से शरीर, आत्मा और सर्वोच्च आत्मा के बीच अंतर को समझ लेता है वह परमात्मा को प्राप्त कर लेता है।
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அர்ஜுந உவாச ப்ரக்ரு'திம் புருஷம் சைவ க்ஷேத்ரம் க்ஷேத்ரஜ்ஞமேவ ச। ஏதத்வேதிதுமிச்சாமி ஜ்ஞாநம் ஜ்ஞேயம் ச கேஶவ॥
arjuna uvācha prakṛitiṁ puruṣhaṁ chaiva kṣhetraṁ kṣhetra-jñam eva cha etad veditum ichchhāmi jñānaṁ jñeyaṁ cha keśhava
अर्थअर्जुन ने कहा -- हे केशव ! मैं, प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ तथा ज्ञान और ज्ञेय को जानना चाहता हूँ।।
ஶ்ரீ பகவாநுவாசஇதம் ஶரீரம் கௌந்தேய க்ஷேத்ரமித்யபிதீயதே।ஏதத்யோ வேத்தி தம் ப்ராஹுஃ க்ஷேத்ரஜ்ஞ இதி தத்விதஃ॥
śhrī-bhagavān uvācha idaṁ śharīraṁ kaunteya kṣhetram ity abhidhīyate etad yo vetti taṁ prāhuḥ kṣhetra-jña iti tad-vidaḥ
अर्थश्रीभगवान् ने कहा -- हे कौन्तेय ! यह शरीर क्षेत्र कहा जाता है और इसको जो जानता है, उसे तत्त्वज्ञ जन, क्षेत्रज्ञ कहते हैं।।
க்ஷேத்ரஜ்ஞம் சாபி மாம் வித்தி ஸர்வக்ஷேத்ரேஷு பாரத। க்ஷேத்ரக்ஷேத்ரஜ்ஞயோர்ஜ்ஞாநம் யத்தஜ்ஜ்ஞாநம் மதம் மம॥
kṣhetra-jñaṁ chāpi māṁ viddhi sarva-kṣhetreṣhu bhārata kṣhetra-kṣhetrajñayor jñānaṁ yat taj jñānaṁ mataṁ mama
अर्थहे भारत ! तुम समस्त क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ मुझे ही जानो। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, वही (वास्तव में) ज्ञान है , ऐसा मेरा मत है।।
தத்க்ஷேத்ரம் யச்ச யாத்ரு'க் ச யத்விகாரி யதஶ்ச யத்।ஸ ச யோ யத்ப்ரபாவஶ்ச தத்ஸமாஸேந மே ஶ்ர்ரு'ணு॥
tat kṣhetraṁ yach cha yādṛik cha yad-vikāri yataśh cha yat sa cha yo yat-prabhāvaśh cha tat samāsena me śhṛiṇu
अर्थइसलिये, वह क्षेत्र जो है और जैसा है तथा जिन विकारों वाला है, और जिस (कारण) से जो (कार्य) हुआ है तथा वह (क्षेत्रज्ञ) भी जो है और जिस प्रभाव वाला है, वह संक्षेप में मुझसे सुनो।।
ரு'ஷிபிர்பஹுதா கீதம் சந்தோபிர்விவிதைஃ ப்ரு'தக்।ப்ரஹ்மஸூத்ரபதைஶ்சைவ ஹேதுமத்பிர்விநிஶ்ிசதைஃ॥
ṛiṣhibhir bahudhā gītaṁ chhandobhir vividhaiḥ pṛithak brahma-sūtra-padaiśh chaiva hetumadbhir viniśhchitaiḥ
अर्थ(क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के विषय में) ऋषियों द्वारा विभिन्न और विविध छन्दों में बहुत प्रकार से गाया गया है, तथा सम्यक् प्रकार से निश्चित किये हुये युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा (अर्थात् ब्रह्म के सूचक शब्दों द्वारा) भी (वैसे ही कहा गया है)।।
மஹாபூதாந்யஹங்காரோ புத்திரவ்யக்தமேவ ச।இந்த்ரியாணி தஶைகம் ச பஞ்ச சேந்த்ரியகோசராஃ॥
mahā-bhūtāny ahankāro buddhir avyaktam eva cha indriyāṇi daśhaikaṁ cha pañcha chendriya-gocharāḥ
अर्थपंच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त (प्रकृति), दस इन्द्रियाँ, एक मन, इन्द्रियों के पाँच विषय।।
இச்சா த்வேஷஃ ஸுகம் துஃகம் ஸங்காதஶ்சேதநாத்ரு'திஃ।ஏதத்க்ஷேத்ரம் ஸமாஸேந ஸவிகாரமுதாஹ்ரு'தம்॥
ichchhā dveṣhaḥ sukhaṁ duḥkhaṁ saṅghātaśh chetanā dhṛitiḥ etat kṣhetraṁ samāsena sa-vikāram udāhṛitam
अर्थइच्छा, द्वेष, सुख, दुख, संघात (स्थूलदेह), चेतना (अन्त:करण की चेतन वृत्ति) तथा धृति - इस प्रकार यह क्षेत्र विकारों के सहित संक्षेप में कहा गया है।।
அமாநித்வமதம்பித்வமஹிம்ஸா க்ஷாந்திரார்ஜவம்।ஆசார்யோபாஸநம் ஶௌசம் ஸ்தைர்யமாத்மவிநிக்ரஹஃ॥
amānitvam adambhitvam ahinsā kṣhāntir ārjavam āchāryopāsanaṁ śhauchaṁ sthairyam ātma-vinigrahaḥ
अर्थअमानित्व, अदम्भित्व, अहिंसा, क्षमा, आर्जव, आचार्य की सेवा, शुद्धि, स्थिरता और आत्मसंयम।।
இந்த்ரியார்தேஷு வைராக்யமநஹங்கார ஏவ ச।ஜந்மம்ரு'த்யுஜராவ்யாதிதுஃகதோஷாநுதர்ஶநம்॥
indriyārtheṣhu vairāgyam anahankāra eva cha janma-mṛityu-jarā-vyādhi-duḥkha-doṣhānudarśhanam
अर्थइन्द्रियों के विषय के प्रति वैराग्य, अहंकार का अभाव, जन्म, मृत्यु, वृद्धवस्था, व्याधि और दुख में दोष दर्शन...৷৷.।।
அஸக்ிதரநபிஷ்வங்கஃ புத்ரதாரக்ரு'ஹாதிஷு।நித்யம் ச ஸமசித்தத்வமிஷ்டாநிஷ்டோபபத்திஷு॥
asaktir anabhiṣhvaṅgaḥ putra-dāra-gṛihādiṣhu nityaṁ cha sama-chittatvam iṣhṭāniṣhṭopapattiṣhu
अर्थआसक्ति तथा पुत्र, पत्नी, गृह आदि में अनभिष्वङ्ग (तादात्म्य का अभाव); और इष्ट और अनिष्ट की प्राप्ति में समचित्तता।।
மயி சாநந்யயோகேந பக்ிதரவ்யபிசாரிணீ।விவிக்ததேஶஸேவித்வமரதிர்ஜநஸம்ஸதி॥
mayi chānanya-yogena bhaktir avyabhichāriṇī vivikta-deśha-sevitvam aratir jana-sansadi
अर्थअनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि।।
அத்யாத்மஜ்ஞாநநித்யத்வம் தத்த்வஜ்ஞாநார்ததர்ஶநம்।ஏதஜ்ஜ்ஞாநமிதி ப்ரோக்தமஜ்ஞாநம் யததோந்யதா॥
adhyātma-jñāna-nityatvaṁ tattva-jñānārtha-darśhanam etaj jñānam iti proktam ajñānaṁ yad ato ’nyathā
अर्थअध्यात्मज्ञान में नित्यत्व अर्थात् स्थिरता तथा तत्त्वज्ञान के अर्थ रूप परमात्मा का दर्शन, यह सब तो ज्ञान कहा गया है, और जो इससे विपरीत है, वह अज्ञान है।।
ஜ்ஞேயம் யத்தத்ப்ரவக்ஷ்யாமி யஜ்ஜ்ஞாத்வாऽம்ரு'தமஶ்நுதே।அநாதிமத்பரம் ப்ரஹ்ம ந ஸத்தந்நாஸதுச்யதே॥
jñeyaṁ yat tat pravakṣhyāmi yaj jñātvāmṛitam aśhnute anādi mat-paraṁ brahma na sat tan nāsad uchyate
अर्थमैं उस ज्ञेय वस्तु को स्पष्ट कहूंगा जिसे जानकर मनुष्य अमृतत्व को प्राप्त करता है। वह ज्ञेय है - अनादि, परम ब्रह्म, जो न सत् और न असत् ही कहा जा सकता है।।
ஸர்வதஃ பாணிபாதம் தத்ஸர்வதோऽக்ஷிஶிரோமுகம்।ஸர்வதஃ ஶ்ருதிமல்லோகே ஸர்வமாவ்ரு'த்ய திஷ்டதி॥
sarvataḥ pāṇi-pādaṁ tat sarvato ’kṣhi-śhiro-mukham sarvataḥ śhrutimal loke sarvam āvṛitya tiṣhṭhati
अर्थवह सब ओर हाथ-पैर वाला है और सब ओर से नेत्र, शिर और मुखवाला तथा सब ओर से श्रोत्रवाला है; वह जगत् में सबको व्याप्त करके स्थित है।।
ஸர்வேந்த்ரியகுணாபாஸம் ஸர்வேந்த்ரியவிவர்ஜிதம்।அஸக்தம் ஸர்வப்ரு'ச்சைவ நிர்குணம் குணபோக்த்ரு' ச॥
sarvendriya-guṇābhāsaṁ sarvendriya-vivarjitam asaktaṁ sarva-bhṛich chaiva nirguṇaṁ guṇa-bhoktṛi cha
अर्थवह समस्त इन्द्रियों के गुणो (कार्यों) के द्वारा प्रकाशित होने वाला, परन्तु (वस्तुत:) समस्त इन्द्रियों से रहित है; आसक्ति रहित तथा गुण रहित होते हुए भी सबको धारणपोषण करने वाला और गुणों का भोक्ता है।।
பஹிரந்தஶ்ச பூதாநாமசரம் சரமேவ ச।ஸூக்ஷ்மத்வாத்ததவிஜ்ஞேயம் தூரஸ்தம் சாந்திகே ச தத்॥
bahir antaśh cha bhūtānām acharaṁ charam eva cha sūkṣhmatvāt tad avijñeyaṁ dūra-sthaṁ chāntike cha tat
अर्थ(वह ब्रह्म) भूत मात्र के अन्तर्बाह्य स्थित है; वह चर है और अचर भी। सूक्ष्म होने से वह अविज्ञेय है; वह सुदूर और अत्यन्त समीपस्थ भी है।।
அவிபக்தம் ச பூதேஷு விபக்தமிவ ச ஸ்திதம்।பூதபர்த்ரு' ச தஜ்ஜ்ஞேயம் க்ரஸிஷ்ணு ப்ரபவிஷ்ணு ச॥
avibhaktaṁ cha bhūteṣhu vibhaktam iva cha sthitam bhūta-bhartṛi cha taj jñeyaṁ grasiṣhṇu prabhaviṣhṇu cha
अर्थऔर वह अविभक्त है, तथापि वह भूतों में विभक्त के समान स्थित है। वह ज्ञेय ब्रह्म भूतमात्र का भर्ता, संहारकर्ता और उत्पत्ति कर्ता है।।
ஜ்யோதிஷாமபி தஜ்ஜ்யோதிஸ்தமஸஃ பரமுச்யதே।ஜ்ஞாநம் ஜ்ஞேயம் ஜ்ஞாநகம்யம் ஹ்ரு'தி ஸர்வஸ்ய விஷ்டிதம்॥
jyotiṣhām api taj jyotis tamasaḥ param uchyate jñānaṁ jñeyaṁ jñāna-gamyaṁ hṛidi sarvasya viṣhṭhitam
अर्थ(वह ब्रह्म) ज्योतियों की भी ज्योति और (अज्ञान) अन्धकार से परे कहा जाता है। वह ज्ञान (चैतन्यस्वरूप) ज्ञेय और ज्ञान के द्वारा जानने योग्य (ज्ञानगम्य) है। वह सभी के हृदय में स्थित है।।
இதி க்ஷேத்ரம் ததா ஜ்ஞாநம் ஜ்ஞேயம் சோக்தம் ஸமாஸதஃ।மத்பக்த ஏதத்விஜ்ஞாய மத்பாவாயோபபத்யதே॥
iti kṣhetraṁ tathā jñānaṁ jñeyaṁ choktaṁ samāsataḥ mad-bhakta etad vijñāya mad-bhāvāyopapadyate
अर्थइस प्रकार, (मेरे द्वारा) क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय को संक्षेपत: कहा गया। इसे तत्त्व से जानकर (विज्ञाय) मेरा भक्त मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।।
ப்ரக்ரு'திம் புருஷம் சைவ வித்த்யநாதீ உபாவபி।விகாராம்ஶ்ச குணாம்ஶ்சைவ வித்தி ப்ரக்ரு'திஸம்பவாந்॥
prakṛitiṁ puruṣhaṁ chaiva viddhy anādī ubhāv api vikārānśh cha guṇānśh chaiva viddhi prakṛiti-sambhavān
अर्थप्रकृति और पुरुष इन दोनों को ही तुम अनादि जानो। और तुम यह भी जानो कि सभी विकार और गुण प्रकृति से ही उत्पन्न हुए हैं।।
கார்யகாரணகர்த்ரு'த்வே ஹேதுஃ ப்ரக்ரு'திருச்யதே।புருஷஃ ஸுகதுஃகாநாம் போக்த்ரு'த்வே ஹேதுருச்யதே॥
kārya-kāraṇa-kartṛitve hetuḥ prakṛitir uchyate puruṣhaḥ sukha-duḥkhānāṁ bhoktṛitve hetur uchyate
अर्थकार्य और कारण के उत्पन्न करने में हेतु प्रकृति कही जाती है और पुरुष सुख-दु:ख के भोक्तृत्व में हेतु कहा जाता है।।
புருஷஃ ப்ரக்ரு'திஸ்தோ ஹி புங்க்தே ப்ரக்ரு'திஜாந்குணாந்।காரணம் குணஸங்கோऽஸ்ய ஸதஸத்யோநிஜந்மஸு॥
puruṣhaḥ prakṛiti-stho hi bhuṅkte prakṛiti-jān guṇān kāraṇaṁ guṇa-saṅgo ’sya sad-asad-yoni-janmasu
अर्थप्रकृति में स्थित पुरुष प्रकृति से उत्पन्न गुणों को भोगता है। इन गुणों का संग ही इस पुरुष (जीव) के शुभ और अशुभ योनियों में जन्म लेने का कारण है।।
உபத்ரஷ்டாऽநுமந்தா ச பர்தா போக்தா மஹேஶ்வரஃ।பரமாத்மேதி சாப்யுக்தோ தேஹேऽஸ்மிந்புருஷஃ பரஃ॥
upadraṣhṭānumantā cha bhartā bhoktā maheśhvaraḥ paramātmeti chāpy ukto dehe ’smin puruṣhaḥ paraḥ
अर्थपरम पुरुष ही इस देह में उपद्रष्टा, अनुमन्ता ,भर्ता, भोक्ता, महेश्वर और परमात्मा कहा जाता है।।
ய ஏவம் வேத்தி புருஷம் ப்ரக்ரு'திம் ச குணைஃஸஹ।ஸர்வதா வர்தமாநோऽபி ந ஸ பூயோऽபிஜாயதே॥
ya evaṁ vetti puruṣhaṁ prakṛitiṁ cha guṇaiḥ saha sarvathā vartamāno ’pi na sa bhūyo ’bhijāyate
अर्थइस प्रकार पुरुष और गुणों के सहित प्रकृति को जो मनुष्य जानता है, वह सब प्रकार से रहता हुआ (व्यवहार करता हुआ) भी पुन: नहीं जन्मता है।।
த்யாநேநாத்மநி பஶ்யந்தி கேசிதாத்மாநமாத்மநா।அந்யே ஸாம்க்யேந யோகேந கர்மயோகேந சாபரே॥
dhyānenātmani paśhyanti kechid ātmānam ātmanā anye sānkhyena yogena karma-yogena chāpare
अर्थकोई पुरुष ध्यान के अभ्यास से आत्मा को आत्मा (हृदय) में आत्मा (शुद्ध बुद्धि) के द्वारा देखते हैं; अन्य लोग सांख्य योग के द्वारा तथा कोई साधक कर्मयोग से (आत्मा को देखते हैं )।।
அந்யே த்வேவமஜாநந்தஃ ஶ்ருத்வாऽந்யேப்ய உபாஸதே।தேऽபி சாதிதரந்த்யேவ ம்ரு'த்யும் ஶ்ருதிபராயணாஃ॥
anye tv evam ajānantaḥ śhrutvānyebhya upāsate te ’pi chātitaranty eva mṛityuṁ śhruti-parāyaṇāḥ
अर्थपरन्तु, अन्य लोग जो स्वयं इस प्रकार न जानते हुए, दूसरों से (आचार्यों से) सुनकर ही उपासना करते हैं, वे श्रुतिपरायण (अर्थात् श्रवण ही जिनके लिए परम साधन है) लोग भी मृत्यु को नि:सन्देह तर जाते हैं।।
யாவத்ஸஞ்ஜாயதே கிஞ்சித்ஸத்த்வம் ஸ்தாவரஜங்கமம்।க்ஷேத்ரக்ஷேத்ரஜ்ஞஸம்யோகாத்தத்வித்தி பரதர்ஷப॥
yāvat sañjāyate kiñchit sattvaṁ sthāvara-jaṅgamam kṣhetra-kṣhetrajña-sanyogāt tad viddhi bharatarṣhabha
अर्थहे भरत श्रेष्ठ ! यावन्मात्र जो कुछ भी स्थावर जंगम (चराचर) वस्तु उत्पन्न होती है, उस सबको तुम क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से उत्पन्न हुई जानो।।
ஸமம் ஸர்வேஷு பூதேஷு திஷ்டந்தம் பரமேஶ்வரம்।விநஶ்யத்ஸ்வவிநஶ்யந்தம் யஃ பஶ்யதி ஸ பஶ்யதி॥
samaṁ sarveṣhu bhūteṣhu tiṣhṭhantaṁ parameśhvaram vinaśhyatsv avinaśhyantaṁ yaḥ paśhyati sa paśhyati
अर्थजो पुरुष समस्त नश्वर भूतों में अनश्वर परमेश्वर को समभाव से स्थित देखता है, वही (वास्तव में) देखता है।।
ஸமம் பஶ்யந்ஹி ஸர்வத்ர ஸமவஸ்திதமீஶ்வரம்।ந ஹிநஸ்த்யாத்மநாऽऽத்மாநம் ததோ யாதி பராம் கதிம்॥
samaṁ paśhyan hi sarvatra samavasthitam īśhvaram na hinasty ātmanātmānaṁ tato yāti parāṁ gatim
अर्थनिश्चय ही, वह पुरुष सर्वत्र सम भाव से स्थित परमेश्वर को समान हुआ आत्मा (स्वयं) के द्वारा आत्मा (स्वयं) का नाश नहीं करता है, इससे वह परम गति को प्राप्त होता है।।
ப்ரக்ரு'த்யைவ ச கர்மாணி க்ரியமாணாநி ஸர்வஶஃ।யஃ பஶ்யதி ததாऽऽத்மாநமகர்தாரம் ஸ பஶ்யதி॥
prakṛityaiva cha karmāṇi kriyamāṇāni sarvaśhaḥ yaḥ paśhyati tathātmānam akartāraṁ sa paśhyati
अर्थजो पुरुष समस्त कर्मों को सर्वश: प्रकृति द्वारा ही किये गये देखता है तथा आत्मा को अकर्ता देखता है, वही (वास्तव में) देखता है।।
யதா பூதப்ரு'தக்பாவமேகஸ்தமநுபஶ்யதி।தத ஏவ ச விஸ்தாரம் ப்ரஹ்ம ஸம்பத்யதே ததா॥
yadā bhūta-pṛithag-bhāvam eka-stham anupaśhyati tata eva cha vistāraṁ brahma sampadyate tadā
अर्थयह पुरुष जब भूतों के पृथक् भावों को एक (परमात्मा) में स्थित देखता है तथा उस (परमात्मा) से ही यह विस्तार हुआ जानता है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त होता है।।
அநாதித்வாந்நிர்குணத்வாத்பரமாத்மாயமவ்யயஃ।ஶரீரஸ்தோऽபி கௌந்தேய ந கரோதி ந லிப்யதே॥
anāditvān nirguṇatvāt paramātmāyam avyayaḥ śharīra-stho ’pi kaunteya na karoti na lipyate
अर्थहे कौन्तेय ! अनादि और निर्गुण होने से यह परमात्मा अव्यय है। शरीर में स्थित हुआ भी, वस्तुत:, वह न (कर्म) करता है और न (फलों से) लिप्त होता है।।
யதா ஸர்வகதம் ஸௌக்ஷ்ம்யாதாகாஶம் நோபலிப்யதே।ஸர்வத்ராவஸ்திதோ தேஹே ததாऽऽத்மா நோபலிப்யதே॥
yathā sarva-gataṁ saukṣhmyād ākāśhaṁ nopalipyate sarvatrāvasthito dehe tathātmā nopalipyate
अर्थजिस प्रकार सर्वगत आकाश सूक्ष्म होने के कारण लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार सर्वत्र देह में स्थित आत्मा लिप्त नहीं होता।।
யதா ப்ரகாஶயத்யேகஃ க்ரு'த்ஸ்நம் லோகமிமம் ரவிஃ।க்ஷேத்ரம் க்ஷேத்ரீ ததா க்ரு'த்ஸ்நம் ப்ரகாஶயதி பாரத॥
yathā prakāśhayaty ekaḥ kṛitsnaṁ lokam imaṁ raviḥ kṣhetraṁ kṣhetrī tathā kṛitsnaṁ prakāśhayati bhārata
अर्थहे भारत ! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण लोक को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही क्षेत्री (क्षेत्रज्ञ) सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है।।
க்ஷேத்ரக்ஷேத்ரஜ்ஞயோரேவமந்தரம் ஜ்ஞாநசக்ஷுஷா।பூதப்ரக்ரு'திமோக்ஷம் ச யே விதுர்யாந்தி தே பரம்॥
kṣhetra-kṣhetrajñayor evam antaraṁ jñāna-chakṣhuṣhā bhūta-prakṛiti-mokṣhaṁ cha ye vidur yānti te param
अर्थइस प्रकार, जो पुरुष ज्ञानचक्षु के द्वारा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को तथा प्रकृति के विकारों से मोक्ष को जानते हैं, वे परम ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।।