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ਭਗਵਦ੍ਗੀਤਾ · ਅਧ੍ਯਾਯ 13 / 18

ਕ੍षੇਤ੍ਰ-ਕ੍षੇਤ੍ਰਜ੍ਞਵਿਭਾਗਯੋਗ

Bhagavad Gita Chapter 13 in Punjabi (Gurmukhi)

Kṣhetra Kṣhetrajña Vibhāg Yog · क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ · 35 श्लोक

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अध्याय सारांश

भगवद गीता का तेरवाह अध्याय क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग है। क्षेत्र शब्द का मतलब भूमि और क्षेत्ररक्षण का मतलब क्षेत्र का जानकार है। हमारा भौतिक शरीर क्षेत्र के सामान है और हमारी अमर आत्मा क्षेत्र के जानकार के सामान है। इस अध्याय में, कृष्ण भौतिक शरीर और अमर आत्मा के बीच भेद करते हैं। वह बताते हैं कि भौतिक शरीर अस्थायी और विनाशकारी है जबकि आत्मा स्थायी और शाश्वत है। भौतिक शरीर नष्ट हो सकता है लेकिन आत्मा कभी भी नष्ट नहीं हो सकती। यह अध्याय फिर भगवान का वर्णन करता है, जो की सर्वोच्च आत्मा हैं। सभी व्यक्तिगत आत्माएं सर्वोच्च आत्मा से उत्पन्न हुई हैं। जो स्पष्ट रूप से शरीर, आत्मा और सर्वोच्च आत्मा के बीच अंतर को समझ लेता है वह परमात्मा को प्राप्त कर लेता है।

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ਅਰ੍ਜੁਨ ਉਵਾਚ ਪ੍ਰਕृਤਿਂ ਪੁਰੁषਂ ਚੈਵ ਕ੍षੇਤ੍ਰਂ ਕ੍षੇਤ੍ਰਜ੍ਞਮੇਵ ਚ। ਏਤਦ੍ਵੇਦਿਤੁਮਿਚ੍ਛਾਮਿ ਜ੍ਞਾਨਂ ਜ੍ਞੇਯਂ ਕੇਸ਼ਵ॥

arjuna uvācha prakṛitiṁ puruṣhaṁ chaiva kṣhetraṁ kṣhetra-jñam eva cha etad veditum ichchhāmi jñānaṁ jñeyaṁ cha keśhava

अर्थअर्जुन ने कहा -- हे केशव ! मैं, प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ तथा ज्ञान और ज्ञेय को जानना चाहता हूँ।।

ਸ਼੍ਰੀ ਭਗਵਾਨੁਵਾਚਇਦਂ ਸ਼ਰੀਰਂ ਕੌਨ੍ਤੇਯ ਕ੍षੇਤ੍ਰਮਿਤ੍ਯਭਿਧੀਯਤੇ।ਏਤਦ੍ਯੋ ਵੇਤ੍ਤਿ ਤਂ ਪ੍ਰਾਹੁਃ ਕ੍षੇਤ੍ਰਜ੍ਞ ਇਤਿ ਤਦ੍ਵਿਦਃ॥

śhrī-bhagavān uvācha idaṁ śharīraṁ kaunteya kṣhetram ity abhidhīyate etad yo vetti taṁ prāhuḥ kṣhetra-jña iti tad-vidaḥ

अर्थश्रीभगवान् ने कहा -- हे कौन्तेय ! यह शरीर क्षेत्र कहा जाता है और इसको जो जानता है, उसे तत्त्वज्ञ जन, क्षेत्रज्ञ कहते हैं।।

ਕ੍षੇਤ੍ਰਜ੍ਞਂ ਚਾਪਿ ਮਾਂ ਵਿਦ੍ਧਿ ਸਰ੍ਵਕ੍षੇਤ੍ਰੇषੁ ਭਾਰਤ। ਕ੍षੇਤ੍ਰਕ੍षੇਤ੍ਰਜ੍ਞਯੋਰ੍ਜ੍ਞਾਨਂ ਯਤ੍ਤਜ੍ਜ੍ਞਾਨਂ ਮਤਂ ਮਮ॥

kṣhetra-jñaṁ chāpi māṁ viddhi sarva-kṣhetreṣhu bhārata kṣhetra-kṣhetrajñayor jñānaṁ yat taj jñānaṁ mataṁ mama

अर्थहे भारत ! तुम समस्त क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ मुझे ही जानो। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, वही (वास्तव में) ज्ञान है , ऐसा मेरा मत है।।

ਤਤ੍ਕ੍षੇਤ੍ਰਂ ਯਚ੍ਚ ਯਾਦृਕ੍ ਯਦ੍ਵਿਕਾਰਿ ਯਤਸ਼੍ਚ ਯਤ੍।ਸ ਯੋ ਯਤ੍ਪ੍ਰਭਾਵਸ਼੍ਚ ਤਤ੍ਸਮਾਸੇਨ ਮੇ ਸ਼੍ਰृਣੁ॥

tat kṣhetraṁ yach cha yādṛik cha yad-vikāri yataśh cha yat sa cha yo yat-prabhāvaśh cha tat samāsena me śhṛiṇu

अर्थइसलिये, वह क्षेत्र जो है और जैसा है तथा जिन विकारों वाला है, और जिस (कारण) से जो (कार्य) हुआ है तथा वह (क्षेत्रज्ञ) भी जो है और जिस प्रभाव वाला है, वह संक्षेप में मुझसे सुनो।।

ऋषਿਭਿਰ੍ਬਹੁਧਾ ਗੀਤਂ ਛਨ੍ਦੋਭਿਰ੍ਵਿਵਿਧੈਃ ਪृਥਕ੍।ਬ੍ਰਹ੍ਮਸੂਤ੍ਰਪਦੈਸ਼੍ਚੈਵ ਹੇਤੁਮਦ੍ਭਿਰ੍ਵਿਨਿਸ਼੍ਿਚਤੈਃ॥

ṛiṣhibhir bahudhā gītaṁ chhandobhir vividhaiḥ pṛithak brahma-sūtra-padaiśh chaiva hetumadbhir viniśhchitaiḥ

अर्थ(क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के विषय में) ऋषियों द्वारा विभिन्न और विविध छन्दों में बहुत प्रकार से गाया गया है, तथा सम्यक् प्रकार से निश्चित किये हुये युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा (अर्थात् ब्रह्म के सूचक शब्दों द्वारा) भी (वैसे ही कहा गया है)।।

ਮਹਾਭੂਤਾਨ੍ਯਹਙ੍ਕਾਰੋ ਬੁਦ੍ਧਿਰਵ੍ਯਕ੍ਤਮੇਵ ਚ।ਇਨ੍ਦ੍ਰਿਯਾਣਿ ਦਸ਼ੈਕਂ ਪਞ੍ਚ ਚੇਨ੍ਦ੍ਰਿਯਗੋਚਰਾਃ॥

mahā-bhūtāny ahankāro buddhir avyaktam eva cha indriyāṇi daśhaikaṁ cha pañcha chendriya-gocharāḥ

अर्थपंच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त (प्रकृति), दस इन्द्रियाँ, एक मन, इन्द्रियों के पाँच विषय।।

ਇਚ੍ਛਾ ਦ੍ਵੇषਃ ਸੁਖਂ ਦੁਃਖਂ ਸਙ੍ਘਾਤਸ਼੍ਚੇਤਨਾਧृਤਿਃ।ਏਤਤ੍ਕ੍षੇਤ੍ਰਂ ਸਮਾਸੇਨ ਸਵਿਕਾਰਮੁਦਾਹृਤਮ੍॥

ichchhā dveṣhaḥ sukhaṁ duḥkhaṁ saṅghātaśh chetanā dhṛitiḥ etat kṣhetraṁ samāsena sa-vikāram udāhṛitam

अर्थइच्छा, द्वेष, सुख, दुख, संघात (स्थूलदेह), चेतना (अन्त:करण की चेतन वृत्ति) तथा धृति - इस प्रकार यह क्षेत्र विकारों के सहित संक्षेप में कहा गया है।।

ਅਮਾਨਿਤ੍ਵਮਦਮ੍ਭਿਤ੍ਵਮਹਿਂਸਾ ਕ੍षਾਨ੍ਤਿਰਾਰ੍ਜਵਮ੍।ਆਚਾਰ੍ਯੋਪਾਸਨਂ ਸ਼ੌਚਂ ਸ੍ਥੈਰ੍ਯਮਾਤ੍ਮਵਿਨਿਗ੍ਰਹਃ॥

amānitvam adambhitvam ahinsā kṣhāntir ārjavam āchāryopāsanaṁ śhauchaṁ sthairyam ātma-vinigrahaḥ

अर्थअमानित्व, अदम्भित्व, अहिंसा, क्षमा, आर्जव, आचार्य की सेवा, शुद्धि, स्थिरता और आत्मसंयम।।

ਇਨ੍ਦ੍ਰਿਯਾਰ੍ਥੇषੁ ਵੈਰਾਗ੍ਯਮਨਹਙ੍ਕਾਰ ਏਵ ਚ।ਜਨ੍ਮਮृਤ੍ਯੁਜਰਾਵ੍ਯਾਧਿਦੁਃਖਦੋषਾਨੁਦਰ੍ਸ਼ਨਮ੍॥

indriyārtheṣhu vairāgyam anahankāra eva cha janma-mṛityu-jarā-vyādhi-duḥkha-doṣhānudarśhanam

अर्थइन्द्रियों के विषय के प्रति वैराग्य, अहंकार का अभाव, जन्म, मृत्यु, वृद्धवस्था, व्याधि और दुख में दोष दर्शन...৷৷.।।

ਅਸਕ੍ਿਤਰਨਭਿष੍ਵਙ੍ਗਃ ਪੁਤ੍ਰਦਾਰਗृਹਾਦਿषੁ।ਨਿਤ੍ਯਂ ਸਮਚਿਤ੍ਤਤ੍ਵਮਿष੍ਟਾਨਿष੍ਟੋਪਪਤ੍ਤਿषੁ॥

asaktir anabhiṣhvaṅgaḥ putra-dāra-gṛihādiṣhu nityaṁ cha sama-chittatvam iṣhṭāniṣhṭopapattiṣhu

अर्थआसक्ति तथा पुत्र, पत्नी, गृह आदि में अनभिष्वङ्ग (तादात्म्य का अभाव); और इष्ट और अनिष्ट की प्राप्ति में समचित्तता।।

ਮਯਿ ਚਾਨਨ੍ਯਯੋਗੇਨ ਭਕ੍ਿਤਰਵ੍ਯਭਿਚਾਰਿਣੀ।ਵਿਵਿਕ੍ਤਦੇਸ਼ਸੇਵਿਤ੍ਵਮਰਤਿਰ੍ਜਨਸਂਸਦਿ॥

mayi chānanya-yogena bhaktir avyabhichāriṇī vivikta-deśha-sevitvam aratir jana-sansadi

अर्थअनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि।।

ਅਧ੍ਯਾਤ੍ਮਜ੍ਞਾਨਨਿਤ੍ਯਤ੍ਵਂ ਤਤ੍ਤ੍ਵਜ੍ਞਾਨਾਰ੍ਥਦਰ੍ਸ਼ਨਮ੍।ਏਤਜ੍ਜ੍ਞਾਨਮਿਤਿ ਪ੍ਰੋਕ੍ਤਮਜ੍ਞਾਨਂ ਯਦਤੋਨ੍ਯਥਾ॥

adhyātma-jñāna-nityatvaṁ tattva-jñānārtha-darśhanam etaj jñānam iti proktam ajñānaṁ yad ato ’nyathā

अर्थअध्यात्मज्ञान में नित्यत्व अर्थात् स्थिरता तथा तत्त्वज्ञान के अर्थ रूप परमात्मा का दर्शन, यह सब तो ज्ञान कहा गया है, और जो इससे विपरीत है, वह अज्ञान है।।

ਜ੍ਞੇਯਂ ਯਤ੍ਤਤ੍ਪ੍ਰਵਕ੍ष੍ਯਾਮਿ ਯਜ੍ਜ੍ਞਾਤ੍ਵਾऽਮृਤਮਸ਼੍ਨੁਤੇ।ਅਨਾਦਿਮਤ੍ਪਰਂ ਬ੍ਰਹ੍ਮ ਸਤ੍ਤਨ੍ਨਾਸਦੁਚ੍ਯਤੇ॥

jñeyaṁ yat tat pravakṣhyāmi yaj jñātvāmṛitam aśhnute anādi mat-paraṁ brahma na sat tan nāsad uchyate

अर्थमैं उस ज्ञेय वस्तु को स्पष्ट कहूंगा जिसे जानकर मनुष्य अमृतत्व को प्राप्त करता है। वह ज्ञेय है - अनादि, परम ब्रह्म, जो न सत् और न असत् ही कहा जा सकता है।।

ਸਰ੍ਵਤਃ ਪਾਣਿਪਾਦਂ ਤਤ੍ਸਰ੍ਵਤੋऽਕ੍षਿਸ਼ਿਰੋਮੁਖਮ੍।ਸਰ੍ਵਤਃ ਸ਼੍ਰੁਤਿਮਲ੍ਲੋਕੇ ਸਰ੍ਵਮਾਵृਤ੍ਯ ਤਿष੍ਠਤਿ॥

sarvataḥ pāṇi-pādaṁ tat sarvato ’kṣhi-śhiro-mukham sarvataḥ śhrutimal loke sarvam āvṛitya tiṣhṭhati

अर्थवह सब ओर हाथ-पैर वाला है और सब ओर से नेत्र, शिर और मुखवाला तथा सब ओर से श्रोत्रवाला है; वह जगत् में सबको व्याप्त करके स्थित है।।

ਸਰ੍ਵੇਨ੍ਦ੍ਰਿਯਗੁਣਾਭਾਸਂ ਸਰ੍ਵੇਨ੍ਦ੍ਰਿਯਵਿਵਰ੍ਜਿਤਮ੍।ਅਸਕ੍ਤਂ ਸਰ੍ਵਭृਚ੍ਚੈਵ ਨਿਰ੍ਗੁਣਂ ਗੁਣਭੋਕ੍ਤृ ਚ॥

sarvendriya-guṇābhāsaṁ sarvendriya-vivarjitam asaktaṁ sarva-bhṛich chaiva nirguṇaṁ guṇa-bhoktṛi cha

अर्थवह समस्त इन्द्रियों के गुणो (कार्यों) के द्वारा प्रकाशित होने वाला, परन्तु (वस्तुत:) समस्त इन्द्रियों से रहित है; आसक्ति रहित तथा गुण रहित होते हुए भी सबको धारणपोषण करने वाला और गुणों का भोक्ता है।।

ਬਹਿਰਨ੍ਤਸ਼੍ਚ ਭੂਤਾਨਾਮਚਰਂ ਚਰਮੇਵ ਚ।ਸੂਕ੍ष੍ਮਤ੍ਵਾਤ੍ਤਦਵਿਜ੍ਞੇਯਂ ਦੂਰਸ੍ਥਂ ਚਾਨ੍ਤਿਕੇ ਤਤ੍॥

bahir antaśh cha bhūtānām acharaṁ charam eva cha sūkṣhmatvāt tad avijñeyaṁ dūra-sthaṁ chāntike cha tat

अर्थ(वह ब्रह्म) भूत मात्र के अन्तर्बाह्य स्थित है; वह चर है और अचर भी। सूक्ष्म होने से वह अविज्ञेय है; वह सुदूर और अत्यन्त समीपस्थ भी है।।

ਅਵਿਭਕ੍ਤਂ ਭੂਤੇषੁ ਵਿਭਕ੍ਤਮਿਵ ਸ੍ਥਿਤਮ੍।ਭੂਤਭਰ੍ਤृ ਤਜ੍ਜ੍ਞੇਯਂ ਗ੍ਰਸਿष੍ਣੁ ਪ੍ਰਭਵਿष੍ਣੁ ਚ॥

avibhaktaṁ cha bhūteṣhu vibhaktam iva cha sthitam bhūta-bhartṛi cha taj jñeyaṁ grasiṣhṇu prabhaviṣhṇu cha

अर्थऔर वह अविभक्त है, तथापि वह भूतों में विभक्त के समान स्थित है। वह ज्ञेय ब्रह्म भूतमात्र का भर्ता, संहारकर्ता और उत्पत्ति कर्ता है।।

ਜ੍ਯੋਤਿषਾਮਪਿ ਤਜ੍ਜ੍ਯੋਤਿਸ੍ਤਮਸਃ ਪਰਮੁਚ੍ਯਤੇ।ਜ੍ਞਾਨਂ ਜ੍ਞੇਯਂ ਜ੍ਞਾਨਗਮ੍ਯਂ ਹृਦਿ ਸਰ੍ਵਸ੍ਯ ਵਿष੍ਠਿਤਮ੍॥

jyotiṣhām api taj jyotis tamasaḥ param uchyate jñānaṁ jñeyaṁ jñāna-gamyaṁ hṛidi sarvasya viṣhṭhitam

अर्थ(वह ब्रह्म) ज्योतियों की भी ज्योति और (अज्ञान) अन्धकार से परे कहा जाता है। वह ज्ञान (चैतन्यस्वरूप) ज्ञेय और ज्ञान के द्वारा जानने योग्य (ज्ञानगम्य) है। वह सभी के हृदय में स्थित है।।

ਇਤਿ ਕ੍षੇਤ੍ਰਂ ਤਥਾ ਜ੍ਞਾਨਂ ਜ੍ਞੇਯਂ ਚੋਕ੍ਤਂ ਸਮਾਸਤਃ।ਮਦ੍ਭਕ੍ਤ ਏਤਦ੍ਵਿਜ੍ਞਾਯ ਮਦ੍ਭਾਵਾਯੋਪਪਦ੍ਯਤੇ॥

iti kṣhetraṁ tathā jñānaṁ jñeyaṁ choktaṁ samāsataḥ mad-bhakta etad vijñāya mad-bhāvāyopapadyate

अर्थइस प्रकार, (मेरे द्वारा) क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय को संक्षेपत: कहा गया। इसे तत्त्व से जानकर (विज्ञाय) मेरा भक्त मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।।

ਪ੍ਰਕृਤਿਂ ਪੁਰੁषਂ ਚੈਵ ਵਿਦ੍ਧ੍ਯਨਾਦੀ ਉਭਾਵਪਿ।ਵਿਕਾਰਾਂਸ਼੍ਚ ਗੁਣਾਂਸ਼੍ਚੈਵ ਵਿਦ੍ਧਿ ਪ੍ਰਕृਤਿਸਂਭਵਾਨ੍॥

prakṛitiṁ puruṣhaṁ chaiva viddhy anādī ubhāv api vikārānśh cha guṇānśh chaiva viddhi prakṛiti-sambhavān

अर्थप्रकृति और पुरुष इन दोनों को ही तुम अनादि जानो। और तुम यह भी जानो कि सभी विकार और गुण प्रकृति से ही उत्पन्न हुए हैं।।

ਕਾਰ੍ਯਕਾਰਣਕਰ੍ਤृਤ੍ਵੇ ਹੇਤੁਃ ਪ੍ਰਕृਤਿਰੁਚ੍ਯਤੇ।ਪੁਰੁषਃ ਸੁਖਦੁਃਖਾਨਾਂ ਭੋਕ੍ਤृਤ੍ਵੇ ਹੇਤੁਰੁਚ੍ਯਤੇ॥

kārya-kāraṇa-kartṛitve hetuḥ prakṛitir uchyate puruṣhaḥ sukha-duḥkhānāṁ bhoktṛitve hetur uchyate

अर्थकार्य और कारण के उत्पन्न करने में हेतु प्रकृति कही जाती है और पुरुष सुख-दु:ख के भोक्तृत्व में हेतु कहा जाता है।।

ਪੁਰੁषਃ ਪ੍ਰਕृਤਿਸ੍ਥੋ ਹਿ ਭੁਙ੍ਕ੍ਤੇ ਪ੍ਰਕृਤਿਜਾਨ੍ਗੁਣਾਨ੍।ਕਾਰਣਂ ਗੁਣਸਙ੍ਗੋऽਸ੍ਯ ਸਦਸਦ੍ਯੋਨਿਜਨ੍ਮਸੁ॥

puruṣhaḥ prakṛiti-stho hi bhuṅkte prakṛiti-jān guṇān kāraṇaṁ guṇa-saṅgo ’sya sad-asad-yoni-janmasu

अर्थप्रकृति में स्थित पुरुष प्रकृति से उत्पन्न गुणों को भोगता है। इन गुणों का संग ही इस पुरुष (जीव) के शुभ और अशुभ योनियों में जन्म लेने का कारण है।।

ਉਪਦ੍ਰष੍ਟਾऽਨੁਮਨ੍ਤਾ ਭਰ੍ਤਾ ਭੋਕ੍ਤਾ ਮਹੇਸ਼੍ਵਰਃ।ਪਰਮਾਤ੍ਮੇਤਿ ਚਾਪ੍ਯੁਕ੍ਤੋ ਦੇਹੇऽਸ੍ਮਿਨ੍ਪੁਰੁषਃ ਪਰਃ॥

upadraṣhṭānumantā cha bhartā bhoktā maheśhvaraḥ paramātmeti chāpy ukto dehe ’smin puruṣhaḥ paraḥ

अर्थपरम पुरुष ही इस देह में उपद्रष्टा, अनुमन्ता ,भर्ता, भोक्ता, महेश्वर और परमात्मा कहा जाता है।।

ਏਵਂ ਵੇਤ੍ਤਿ ਪੁਰੁषਂ ਪ੍ਰਕृਤਿਂ ਗੁਣੈਃਸਹ।ਸਰ੍ਵਥਾ ਵਰ੍ਤਮਾਨੋऽਪਿ ਭੂਯੋऽਭਿਜਾਯਤੇ॥

ya evaṁ vetti puruṣhaṁ prakṛitiṁ cha guṇaiḥ saha sarvathā vartamāno ’pi na sa bhūyo ’bhijāyate

अर्थइस प्रकार पुरुष और गुणों के सहित प्रकृति को जो मनुष्य जानता है, वह सब प्रकार से रहता हुआ (व्यवहार करता हुआ) भी पुन: नहीं जन्मता है।।

ਧ੍ਯਾਨੇਨਾਤ੍ਮਨਿ ਪਸ਼੍ਯਨ੍ਤਿ ਕੇਚਿਦਾਤ੍ਮਾਨਮਾਤ੍ਮਨਾ।ਅਨ੍ਯੇ ਸਾਂਖ੍ਯੇਨ ਯੋਗੇਨ ਕਰ੍ਮਯੋਗੇਨ ਚਾਪਰੇ॥

dhyānenātmani paśhyanti kechid ātmānam ātmanā anye sānkhyena yogena karma-yogena chāpare

अर्थकोई पुरुष ध्यान के अभ्यास से आत्मा को आत्मा (हृदय) में आत्मा (शुद्ध बुद्धि) के द्वारा देखते हैं; अन्य लोग सांख्य योग के द्वारा तथा कोई साधक कर्मयोग से (आत्मा को देखते हैं )।।

ਅਨ੍ਯੇ ਤ੍ਵੇਵਮਜਾਨਨ੍ਤਃ ਸ਼੍ਰੁਤ੍ਵਾऽਨ੍ਯੇਭ੍ਯ ਉਪਾਸਤੇ।ਤੇऽਪਿ ਚਾਤਿਤਰਨ੍ਤ੍ਯੇਵ ਮृਤ੍ਯੁਂ ਸ਼੍ਰੁਤਿਪਰਾਯਣਾਃ॥

anye tv evam ajānantaḥ śhrutvānyebhya upāsate te ’pi chātitaranty eva mṛityuṁ śhruti-parāyaṇāḥ

अर्थपरन्तु, अन्य लोग जो स्वयं इस प्रकार न जानते हुए, दूसरों से (आचार्यों से) सुनकर ही उपासना करते हैं, वे श्रुतिपरायण (अर्थात् श्रवण ही जिनके लिए परम साधन है) लोग भी मृत्यु को नि:सन्देह तर जाते हैं।।

ਯਾਵਤ੍ਸਞ੍ਜਾਯਤੇ ਕਿਞ੍ਚਿਤ੍ਸਤ੍ਤ੍ਵਂ ਸ੍ਥਾਵਰਜਙ੍ਗਮਮ੍।ਕ੍षੇਤ੍ਰਕ੍षੇਤ੍ਰਜ੍ਞਸਂਯੋਗਾਤ੍ਤਦ੍ਵਿਦ੍ਧਿ ਭਰਤਰ੍षਭ॥

yāvat sañjāyate kiñchit sattvaṁ sthāvara-jaṅgamam kṣhetra-kṣhetrajña-sanyogāt tad viddhi bharatarṣhabha

अर्थहे भरत श्रेष्ठ ! यावन्मात्र जो कुछ भी स्थावर जंगम (चराचर) वस्तु उत्पन्न होती है, उस सबको तुम क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से उत्पन्न हुई जानो।।

ਸਮਂ ਸਰ੍ਵੇषੁ ਭੂਤੇषੁ ਤਿष੍ਠਨ੍ਤਂ ਪਰਮੇਸ਼੍ਵਰਮ੍।ਵਿਨਸ਼੍ਯਤ੍ਸ੍ਵਵਿਨਸ਼੍ਯਨ੍ਤਂ ਯਃ ਪਸ਼੍ਯਤਿ ਪਸ਼੍ਯਤਿ॥

samaṁ sarveṣhu bhūteṣhu tiṣhṭhantaṁ parameśhvaram vinaśhyatsv avinaśhyantaṁ yaḥ paśhyati sa paśhyati

अर्थजो पुरुष समस्त नश्वर भूतों में अनश्वर परमेश्वर को समभाव से स्थित देखता है, वही (वास्तव में) देखता है।।

ਸਮਂ ਪਸ਼੍ਯਨ੍ਹਿ ਸਰ੍ਵਤ੍ਰ ਸਮਵਸ੍ਥਿਤਮੀਸ਼੍ਵਰਮ੍।ਨ ਹਿਨਸ੍ਤ੍ਯਾਤ੍ਮਨਾऽऽਤ੍ਮਾਨਂ ਤਤੋ ਯਾਤਿ ਪਰਾਂ ਗਤਿਮ੍॥

samaṁ paśhyan hi sarvatra samavasthitam īśhvaram na hinasty ātmanātmānaṁ tato yāti parāṁ gatim

अर्थनिश्चय ही, वह पुरुष सर्वत्र सम भाव से स्थित परमेश्वर को समान हुआ आत्मा (स्वयं) के द्वारा आत्मा (स्वयं) का नाश नहीं करता है, इससे वह परम गति को प्राप्त होता है।।

ਪ੍ਰਕृਤ੍ਯੈਵ ਕਰ੍ਮਾਣਿ ਕ੍ਰਿਯਮਾਣਾਨਿ ਸਰ੍ਵਸ਼ਃ।ਯਃ ਪਸ਼੍ਯਤਿ ਤਥਾऽऽਤ੍ਮਾਨਮਕਰ੍ਤਾਰਂ ਪਸ਼੍ਯਤਿ॥

prakṛityaiva cha karmāṇi kriyamāṇāni sarvaśhaḥ yaḥ paśhyati tathātmānam akartāraṁ sa paśhyati

अर्थजो पुरुष समस्त कर्मों को सर्वश: प्रकृति द्वारा ही किये गये देखता है तथा आत्मा को अकर्ता देखता है, वही (वास्तव में) देखता है।।

ਯਦਾ ਭੂਤਪृਥਗ੍ਭਾਵਮੇਕਸ੍ਥਮਨੁਪਸ਼੍ਯਤਿ।ਤਤ ਏਵ ਵਿਸ੍ਤਾਰਂ ਬ੍ਰਹ੍ਮ ਸਮ੍ਪਦ੍ਯਤੇ ਤਦਾ॥

yadā bhūta-pṛithag-bhāvam eka-stham anupaśhyati tata eva cha vistāraṁ brahma sampadyate tadā

अर्थयह पुरुष जब भूतों के पृथक् भावों को एक (परमात्मा) में स्थित देखता है तथा उस (परमात्मा) से ही यह विस्तार हुआ जानता है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त होता है।।

ਅਨਾਦਿਤ੍ਵਾਨ੍ਨਿਰ੍ਗੁਣਤ੍ਵਾਤ੍ਪਰਮਾਤ੍ਮਾਯਮਵ੍ਯਯਃ।ਸ਼ਰੀਰਸ੍ਥੋऽਪਿ ਕੌਨ੍ਤੇਯ ਕਰੋਤਿ ਲਿਪ੍ਯਤੇ॥

anāditvān nirguṇatvāt paramātmāyam avyayaḥ śharīra-stho ’pi kaunteya na karoti na lipyate

अर्थहे कौन्तेय ! अनादि और निर्गुण होने से यह परमात्मा अव्यय है। शरीर में स्थित हुआ भी, वस्तुत:, वह न (कर्म) करता है और न (फलों से) लिप्त होता है।।

ਯਥਾ ਸਰ੍ਵਗਤਂ ਸੌਕ੍ष੍ਮ੍ਯਾਦਾਕਾਸ਼ਂ ਨੋਪਲਿਪ੍ਯਤੇ।ਸਰ੍ਵਤ੍ਰਾਵਸ੍ਥਿਤੋ ਦੇਹੇ ਤਥਾऽऽਤ੍ਮਾ ਨੋਪਲਿਪ੍ਯਤੇ॥

yathā sarva-gataṁ saukṣhmyād ākāśhaṁ nopalipyate sarvatrāvasthito dehe tathātmā nopalipyate

अर्थजिस प्रकार सर्वगत आकाश सूक्ष्म होने के कारण लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार सर्वत्र देह में स्थित आत्मा लिप्त नहीं होता।।

ਯਥਾ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਯਤ੍ਯੇਕਃ ਕृਤ੍ਸ੍ਨਂ ਲੋਕਮਿਮਂ ਰਵਿਃ।ਕ੍षੇਤ੍ਰਂ ਕ੍षੇਤ੍ਰੀ ਤਥਾ ਕृਤ੍ਸ੍ਨਂ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਯਤਿ ਭਾਰਤ॥

yathā prakāśhayaty ekaḥ kṛitsnaṁ lokam imaṁ raviḥ kṣhetraṁ kṣhetrī tathā kṛitsnaṁ prakāśhayati bhārata

अर्थहे भारत ! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण लोक को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही क्षेत्री (क्षेत्रज्ञ) सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है।।

ਕ੍षੇਤ੍ਰਕ੍षੇਤ੍ਰਜ੍ਞਯੋਰੇਵਮਨ੍ਤਰਂ ਜ੍ਞਾਨਚਕ੍षੁषਾ।ਭੂਤਪ੍ਰਕृਤਿਮੋਕ੍षਂ ਯੇ ਵਿਦੁਰ੍ਯਾਨ੍ਤਿ ਤੇ ਪਰਮ੍॥

kṣhetra-kṣhetrajñayor evam antaraṁ jñāna-chakṣhuṣhā bhūta-prakṛiti-mokṣhaṁ cha ye vidur yānti te param

अर्थइस प्रकार, जो पुरुष ज्ञानचक्षु के द्वारा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को तथा प्रकृति के विकारों से मोक्ष को जानते हैं, वे परम ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।।