ಕ್ಷೇತ್ರ-ಕ್ಷೇತ್ರಜ್ಞವಿಭಾಗಯೋಗ
Bhagavad Gita Chapter 13 in Kannada
Kṣhetra Kṣhetrajña Vibhāg Yog · क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ · 35 श्लोक
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अध्याय सारांश
भगवद गीता का तेरवाह अध्याय क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग है। क्षेत्र शब्द का मतलब भूमि और क्षेत्ररक्षण का मतलब क्षेत्र का जानकार है। हमारा भौतिक शरीर क्षेत्र के सामान है और हमारी अमर आत्मा क्षेत्र के जानकार के सामान है। इस अध्याय में, कृष्ण भौतिक शरीर और अमर आत्मा के बीच भेद करते हैं। वह बताते हैं कि भौतिक शरीर अस्थायी और विनाशकारी है जबकि आत्मा स्थायी और शाश्वत है। भौतिक शरीर नष्ट हो सकता है लेकिन आत्मा कभी भी नष्ट नहीं हो सकती। यह अध्याय फिर भगवान का वर्णन करता है, जो की सर्वोच्च आत्मा हैं। सभी व्यक्तिगत आत्माएं सर्वोच्च आत्मा से उत्पन्न हुई हैं। जो स्पष्ट रूप से शरीर, आत्मा और सर्वोच्च आत्मा के बीच अंतर को समझ लेता है वह परमात्मा को प्राप्त कर लेता है।
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ಅರ್ಜುನ ಉವಾಚ ಪ್ರಕೃತಿಂ ಪುರುಷಂ ಚೈವ ಕ್ಷೇತ್ರಂ ಕ್ಷೇತ್ರಜ್ಞಮೇವ ಚ। ಏತದ್ವೇದಿತುಮಿಚ್ಛಾಮಿ ಜ್ಞಾನಂ ಜ್ಞೇಯಂ ಚ ಕೇಶವ॥
arjuna uvācha prakṛitiṁ puruṣhaṁ chaiva kṣhetraṁ kṣhetra-jñam eva cha etad veditum ichchhāmi jñānaṁ jñeyaṁ cha keśhava
अर्थअर्जुन ने कहा -- हे केशव ! मैं, प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ तथा ज्ञान और ज्ञेय को जानना चाहता हूँ।।
ಶ್ರೀ ಭಗವಾನುವಾಚಇದಂ ಶರೀರಂ ಕೌನ್ತೇಯ ಕ್ಷೇತ್ರಮಿತ್ಯಭಿಧೀಯತೇ।ಏತದ್ಯೋ ವೇತ್ತಿ ತಂ ಪ್ರಾಹುಃ ಕ್ಷೇತ್ರಜ್ಞ ಇತಿ ತದ್ವಿದಃ॥
śhrī-bhagavān uvācha idaṁ śharīraṁ kaunteya kṣhetram ity abhidhīyate etad yo vetti taṁ prāhuḥ kṣhetra-jña iti tad-vidaḥ
अर्थश्रीभगवान् ने कहा -- हे कौन्तेय ! यह शरीर क्षेत्र कहा जाता है और इसको जो जानता है, उसे तत्त्वज्ञ जन, क्षेत्रज्ञ कहते हैं।।
ಕ್ಷೇತ್ರಜ್ಞಂ ಚಾಪಿ ಮಾಂ ವಿದ್ಧಿ ಸರ್ವಕ್ಷೇತ್ರೇಷು ಭಾರತ। ಕ್ಷೇತ್ರಕ್ಷೇತ್ರಜ್ಞಯೋರ್ಜ್ಞಾನಂ ಯತ್ತಜ್ಜ್ಞಾನಂ ಮತಂ ಮಮ॥
kṣhetra-jñaṁ chāpi māṁ viddhi sarva-kṣhetreṣhu bhārata kṣhetra-kṣhetrajñayor jñānaṁ yat taj jñānaṁ mataṁ mama
अर्थहे भारत ! तुम समस्त क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ मुझे ही जानो। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, वही (वास्तव में) ज्ञान है , ऐसा मेरा मत है।।
ತತ್ಕ್ಷೇತ್ರಂ ಯಚ್ಚ ಯಾದೃಕ್ ಚ ಯದ್ವಿಕಾರಿ ಯತಶ್ಚ ಯತ್।ಸ ಚ ಯೋ ಯತ್ಪ್ರಭಾವಶ್ಚ ತತ್ಸಮಾಸೇನ ಮೇ ಶ್ರೃಣು॥
tat kṣhetraṁ yach cha yādṛik cha yad-vikāri yataśh cha yat sa cha yo yat-prabhāvaśh cha tat samāsena me śhṛiṇu
अर्थइसलिये, वह क्षेत्र जो है और जैसा है तथा जिन विकारों वाला है, और जिस (कारण) से जो (कार्य) हुआ है तथा वह (क्षेत्रज्ञ) भी जो है और जिस प्रभाव वाला है, वह संक्षेप में मुझसे सुनो।।
ಋಷಿಭಿರ್ಬಹುಧಾ ಗೀತಂ ಛನ್ದೋಭಿರ್ವಿವಿಧೈಃ ಪೃಥಕ್।ಬ್ರಹ್ಮಸೂತ್ರಪದೈಶ್ಚೈವ ಹೇತುಮದ್ಭಿರ್ವಿನಿಶ್ಿಚತೈಃ॥
ṛiṣhibhir bahudhā gītaṁ chhandobhir vividhaiḥ pṛithak brahma-sūtra-padaiśh chaiva hetumadbhir viniśhchitaiḥ
अर्थ(क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के विषय में) ऋषियों द्वारा विभिन्न और विविध छन्दों में बहुत प्रकार से गाया गया है, तथा सम्यक् प्रकार से निश्चित किये हुये युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा (अर्थात् ब्रह्म के सूचक शब्दों द्वारा) भी (वैसे ही कहा गया है)।।
ಮಹಾಭೂತಾನ್ಯಹಙ್ಕಾರೋ ಬುದ್ಧಿರವ್ಯಕ್ತಮೇವ ಚ।ಇನ್ದ್ರಿಯಾಣಿ ದಶೈಕಂ ಚ ಪಞ್ಚ ಚೇನ್ದ್ರಿಯಗೋಚರಾಃ॥
mahā-bhūtāny ahankāro buddhir avyaktam eva cha indriyāṇi daśhaikaṁ cha pañcha chendriya-gocharāḥ
अर्थपंच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त (प्रकृति), दस इन्द्रियाँ, एक मन, इन्द्रियों के पाँच विषय।।
ಇಚ್ಛಾ ದ್ವೇಷಃ ಸುಖಂ ದುಃಖಂ ಸಙ್ಘಾತಶ್ಚೇತನಾಧೃತಿಃ।ಏತತ್ಕ್ಷೇತ್ರಂ ಸಮಾಸೇನ ಸವಿಕಾರಮುದಾಹೃತಮ್॥
ichchhā dveṣhaḥ sukhaṁ duḥkhaṁ saṅghātaśh chetanā dhṛitiḥ etat kṣhetraṁ samāsena sa-vikāram udāhṛitam
अर्थइच्छा, द्वेष, सुख, दुख, संघात (स्थूलदेह), चेतना (अन्त:करण की चेतन वृत्ति) तथा धृति - इस प्रकार यह क्षेत्र विकारों के सहित संक्षेप में कहा गया है।।
ಅಮಾನಿತ್ವಮದಮ್ಭಿತ್ವಮಹಿಂಸಾ ಕ್ಷಾನ್ತಿರಾರ್ಜವಮ್।ಆಚಾರ್ಯೋಪಾಸನಂ ಶೌಚಂ ಸ್ಥೈರ್ಯಮಾತ್ಮವಿನಿಗ್ರಹಃ॥
amānitvam adambhitvam ahinsā kṣhāntir ārjavam āchāryopāsanaṁ śhauchaṁ sthairyam ātma-vinigrahaḥ
अर्थअमानित्व, अदम्भित्व, अहिंसा, क्षमा, आर्जव, आचार्य की सेवा, शुद्धि, स्थिरता और आत्मसंयम।।
ಇನ್ದ್ರಿಯಾರ್ಥೇಷು ವೈರಾಗ್ಯಮನಹಙ್ಕಾರ ಏವ ಚ।ಜನ್ಮಮೃತ್ಯುಜರಾವ್ಯಾಧಿದುಃಖದೋಷಾನುದರ್ಶನಮ್॥
indriyārtheṣhu vairāgyam anahankāra eva cha janma-mṛityu-jarā-vyādhi-duḥkha-doṣhānudarśhanam
अर्थइन्द्रियों के विषय के प्रति वैराग्य, अहंकार का अभाव, जन्म, मृत्यु, वृद्धवस्था, व्याधि और दुख में दोष दर्शन...৷৷.।।
ಅಸಕ್ಿತರನಭಿಷ್ವಙ್ಗಃ ಪುತ್ರದಾರಗೃಹಾದಿಷು।ನಿತ್ಯಂ ಚ ಸಮಚಿತ್ತತ್ವಮಿಷ್ಟಾನಿಷ್ಟೋಪಪತ್ತಿಷು॥
asaktir anabhiṣhvaṅgaḥ putra-dāra-gṛihādiṣhu nityaṁ cha sama-chittatvam iṣhṭāniṣhṭopapattiṣhu
अर्थआसक्ति तथा पुत्र, पत्नी, गृह आदि में अनभिष्वङ्ग (तादात्म्य का अभाव); और इष्ट और अनिष्ट की प्राप्ति में समचित्तता।।
ಮಯಿ ಚಾನನ್ಯಯೋಗೇನ ಭಕ್ಿತರವ್ಯಭಿಚಾರಿಣೀ।ವಿವಿಕ್ತದೇಶಸೇವಿತ್ವಮರತಿರ್ಜನಸಂಸದಿ॥
mayi chānanya-yogena bhaktir avyabhichāriṇī vivikta-deśha-sevitvam aratir jana-sansadi
अर्थअनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि।।
ಅಧ್ಯಾತ್ಮಜ್ಞಾನನಿತ್ಯತ್ವಂ ತತ್ತ್ವಜ್ಞಾನಾರ್ಥದರ್ಶನಮ್।ಏತಜ್ಜ್ಞಾನಮಿತಿ ಪ್ರೋಕ್ತಮಜ್ಞಾನಂ ಯದತೋನ್ಯಥಾ॥
adhyātma-jñāna-nityatvaṁ tattva-jñānārtha-darśhanam etaj jñānam iti proktam ajñānaṁ yad ato ’nyathā
अर्थअध्यात्मज्ञान में नित्यत्व अर्थात् स्थिरता तथा तत्त्वज्ञान के अर्थ रूप परमात्मा का दर्शन, यह सब तो ज्ञान कहा गया है, और जो इससे विपरीत है, वह अज्ञान है।।
ಜ್ಞೇಯಂ ಯತ್ತತ್ಪ್ರವಕ್ಷ್ಯಾಮಿ ಯಜ್ಜ್ಞಾತ್ವಾಽಮೃತಮಶ್ನುತೇ।ಅನಾದಿಮತ್ಪರಂ ಬ್ರಹ್ಮ ನ ಸತ್ತನ್ನಾಸದುಚ್ಯತೇ॥
jñeyaṁ yat tat pravakṣhyāmi yaj jñātvāmṛitam aśhnute anādi mat-paraṁ brahma na sat tan nāsad uchyate
अर्थमैं उस ज्ञेय वस्तु को स्पष्ट कहूंगा जिसे जानकर मनुष्य अमृतत्व को प्राप्त करता है। वह ज्ञेय है - अनादि, परम ब्रह्म, जो न सत् और न असत् ही कहा जा सकता है।।
ಸರ್ವತಃ ಪಾಣಿಪಾದಂ ತತ್ಸರ್ವತೋಽಕ್ಷಿಶಿರೋಮುಖಮ್।ಸರ್ವತಃ ಶ್ರುತಿಮಲ್ಲೋಕೇ ಸರ್ವಮಾವೃತ್ಯ ತಿಷ್ಠತಿ॥
sarvataḥ pāṇi-pādaṁ tat sarvato ’kṣhi-śhiro-mukham sarvataḥ śhrutimal loke sarvam āvṛitya tiṣhṭhati
अर्थवह सब ओर हाथ-पैर वाला है और सब ओर से नेत्र, शिर और मुखवाला तथा सब ओर से श्रोत्रवाला है; वह जगत् में सबको व्याप्त करके स्थित है।।
ಸರ್ವೇನ್ದ್ರಿಯಗುಣಾಭಾಸಂ ಸರ್ವೇನ್ದ್ರಿಯವಿವರ್ಜಿತಮ್।ಅಸಕ್ತಂ ಸರ್ವಭೃಚ್ಚೈವ ನಿರ್ಗುಣಂ ಗುಣಭೋಕ್ತೃ ಚ॥
sarvendriya-guṇābhāsaṁ sarvendriya-vivarjitam asaktaṁ sarva-bhṛich chaiva nirguṇaṁ guṇa-bhoktṛi cha
अर्थवह समस्त इन्द्रियों के गुणो (कार्यों) के द्वारा प्रकाशित होने वाला, परन्तु (वस्तुत:) समस्त इन्द्रियों से रहित है; आसक्ति रहित तथा गुण रहित होते हुए भी सबको धारणपोषण करने वाला और गुणों का भोक्ता है।।
ಬಹಿರನ್ತಶ್ಚ ಭೂತಾನಾಮಚರಂ ಚರಮೇವ ಚ।ಸೂಕ್ಷ್ಮತ್ವಾತ್ತದವಿಜ್ಞೇಯಂ ದೂರಸ್ಥಂ ಚಾನ್ತಿಕೇ ಚ ತತ್॥
bahir antaśh cha bhūtānām acharaṁ charam eva cha sūkṣhmatvāt tad avijñeyaṁ dūra-sthaṁ chāntike cha tat
अर्थ(वह ब्रह्म) भूत मात्र के अन्तर्बाह्य स्थित है; वह चर है और अचर भी। सूक्ष्म होने से वह अविज्ञेय है; वह सुदूर और अत्यन्त समीपस्थ भी है।।
ಅವಿಭಕ್ತಂ ಚ ಭೂತೇಷು ವಿಭಕ್ತಮಿವ ಚ ಸ್ಥಿತಮ್।ಭೂತಭರ್ತೃ ಚ ತಜ್ಜ್ಞೇಯಂ ಗ್ರಸಿಷ್ಣು ಪ್ರಭವಿಷ್ಣು ಚ॥
avibhaktaṁ cha bhūteṣhu vibhaktam iva cha sthitam bhūta-bhartṛi cha taj jñeyaṁ grasiṣhṇu prabhaviṣhṇu cha
अर्थऔर वह अविभक्त है, तथापि वह भूतों में विभक्त के समान स्थित है। वह ज्ञेय ब्रह्म भूतमात्र का भर्ता, संहारकर्ता और उत्पत्ति कर्ता है।।
ಜ್ಯೋತಿಷಾಮಪಿ ತಜ್ಜ್ಯೋತಿಸ್ತಮಸಃ ಪರಮುಚ್ಯತೇ।ಜ್ಞಾನಂ ಜ್ಞೇಯಂ ಜ್ಞಾನಗಮ್ಯಂ ಹೃದಿ ಸರ್ವಸ್ಯ ವಿಷ್ಠಿತಮ್॥
jyotiṣhām api taj jyotis tamasaḥ param uchyate jñānaṁ jñeyaṁ jñāna-gamyaṁ hṛidi sarvasya viṣhṭhitam
अर्थ(वह ब्रह्म) ज्योतियों की भी ज्योति और (अज्ञान) अन्धकार से परे कहा जाता है। वह ज्ञान (चैतन्यस्वरूप) ज्ञेय और ज्ञान के द्वारा जानने योग्य (ज्ञानगम्य) है। वह सभी के हृदय में स्थित है।।
ಇತಿ ಕ್ಷೇತ್ರಂ ತಥಾ ಜ್ಞಾನಂ ಜ್ಞೇಯಂ ಚೋಕ್ತಂ ಸಮಾಸತಃ।ಮದ್ಭಕ್ತ ಏತದ್ವಿಜ್ಞಾಯ ಮದ್ಭಾವಾಯೋಪಪದ್ಯತೇ॥
iti kṣhetraṁ tathā jñānaṁ jñeyaṁ choktaṁ samāsataḥ mad-bhakta etad vijñāya mad-bhāvāyopapadyate
अर्थइस प्रकार, (मेरे द्वारा) क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय को संक्षेपत: कहा गया। इसे तत्त्व से जानकर (विज्ञाय) मेरा भक्त मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।।
ಪ್ರಕೃತಿಂ ಪುರುಷಂ ಚೈವ ವಿದ್ಧ್ಯನಾದೀ ಉಭಾವಪಿ।ವಿಕಾರಾಂಶ್ಚ ಗುಣಾಂಶ್ಚೈವ ವಿದ್ಧಿ ಪ್ರಕೃತಿಸಂಭವಾನ್॥
prakṛitiṁ puruṣhaṁ chaiva viddhy anādī ubhāv api vikārānśh cha guṇānśh chaiva viddhi prakṛiti-sambhavān
अर्थप्रकृति और पुरुष इन दोनों को ही तुम अनादि जानो। और तुम यह भी जानो कि सभी विकार और गुण प्रकृति से ही उत्पन्न हुए हैं।।
ಕಾರ್ಯಕಾರಣಕರ್ತೃತ್ವೇ ಹೇತುಃ ಪ್ರಕೃತಿರುಚ್ಯತೇ।ಪುರುಷಃ ಸುಖದುಃಖಾನಾಂ ಭೋಕ್ತೃತ್ವೇ ಹೇತುರುಚ್ಯತೇ॥
kārya-kāraṇa-kartṛitve hetuḥ prakṛitir uchyate puruṣhaḥ sukha-duḥkhānāṁ bhoktṛitve hetur uchyate
अर्थकार्य और कारण के उत्पन्न करने में हेतु प्रकृति कही जाती है और पुरुष सुख-दु:ख के भोक्तृत्व में हेतु कहा जाता है।।
ಪುರುಷಃ ಪ್ರಕೃತಿಸ್ಥೋ ಹಿ ಭುಙ್ಕ್ತೇ ಪ್ರಕೃತಿಜಾನ್ಗುಣಾನ್।ಕಾರಣಂ ಗುಣಸಙ್ಗೋಽಸ್ಯ ಸದಸದ್ಯೋನಿಜನ್ಮಸು॥
puruṣhaḥ prakṛiti-stho hi bhuṅkte prakṛiti-jān guṇān kāraṇaṁ guṇa-saṅgo ’sya sad-asad-yoni-janmasu
अर्थप्रकृति में स्थित पुरुष प्रकृति से उत्पन्न गुणों को भोगता है। इन गुणों का संग ही इस पुरुष (जीव) के शुभ और अशुभ योनियों में जन्म लेने का कारण है।।
ಉಪದ್ರಷ್ಟಾಽನುಮನ್ತಾ ಚ ಭರ್ತಾ ಭೋಕ್ತಾ ಮಹೇಶ್ವರಃ।ಪರಮಾತ್ಮೇತಿ ಚಾಪ್ಯುಕ್ತೋ ದೇಹೇಽಸ್ಮಿನ್ಪುರುಷಃ ಪರಃ॥
upadraṣhṭānumantā cha bhartā bhoktā maheśhvaraḥ paramātmeti chāpy ukto dehe ’smin puruṣhaḥ paraḥ
अर्थपरम पुरुष ही इस देह में उपद्रष्टा, अनुमन्ता ,भर्ता, भोक्ता, महेश्वर और परमात्मा कहा जाता है।।
ಯ ಏವಂ ವೇತ್ತಿ ಪುರುಷಂ ಪ್ರಕೃತಿಂ ಚ ಗುಣೈಃಸಹ।ಸರ್ವಥಾ ವರ್ತಮಾನೋಽಪಿ ನ ಸ ಭೂಯೋಽಭಿಜಾಯತೇ॥
ya evaṁ vetti puruṣhaṁ prakṛitiṁ cha guṇaiḥ saha sarvathā vartamāno ’pi na sa bhūyo ’bhijāyate
अर्थइस प्रकार पुरुष और गुणों के सहित प्रकृति को जो मनुष्य जानता है, वह सब प्रकार से रहता हुआ (व्यवहार करता हुआ) भी पुन: नहीं जन्मता है।।
ಧ್ಯಾನೇನಾತ್ಮನಿ ಪಶ್ಯನ್ತಿ ಕೇಚಿದಾತ್ಮಾನಮಾತ್ಮನಾ।ಅನ್ಯೇ ಸಾಂಖ್ಯೇನ ಯೋಗೇನ ಕರ್ಮಯೋಗೇನ ಚಾಪರೇ॥
dhyānenātmani paśhyanti kechid ātmānam ātmanā anye sānkhyena yogena karma-yogena chāpare
अर्थकोई पुरुष ध्यान के अभ्यास से आत्मा को आत्मा (हृदय) में आत्मा (शुद्ध बुद्धि) के द्वारा देखते हैं; अन्य लोग सांख्य योग के द्वारा तथा कोई साधक कर्मयोग से (आत्मा को देखते हैं )।।
ಅನ್ಯೇ ತ್ವೇವಮಜಾನನ್ತಃ ಶ್ರುತ್ವಾಽನ್ಯೇಭ್ಯ ಉಪಾಸತೇ।ತೇಽಪಿ ಚಾತಿತರನ್ತ್ಯೇವ ಮೃತ್ಯುಂ ಶ್ರುತಿಪರಾಯಣಾಃ॥
anye tv evam ajānantaḥ śhrutvānyebhya upāsate te ’pi chātitaranty eva mṛityuṁ śhruti-parāyaṇāḥ
अर्थपरन्तु, अन्य लोग जो स्वयं इस प्रकार न जानते हुए, दूसरों से (आचार्यों से) सुनकर ही उपासना करते हैं, वे श्रुतिपरायण (अर्थात् श्रवण ही जिनके लिए परम साधन है) लोग भी मृत्यु को नि:सन्देह तर जाते हैं।।
ಯಾವತ್ಸಞ್ಜಾಯತೇ ಕಿಞ್ಚಿತ್ಸತ್ತ್ವಂ ಸ್ಥಾವರಜಙ್ಗಮಮ್।ಕ್ಷೇತ್ರಕ್ಷೇತ್ರಜ್ಞಸಂಯೋಗಾತ್ತದ್ವಿದ್ಧಿ ಭರತರ್ಷಭ॥
yāvat sañjāyate kiñchit sattvaṁ sthāvara-jaṅgamam kṣhetra-kṣhetrajña-sanyogāt tad viddhi bharatarṣhabha
अर्थहे भरत श्रेष्ठ ! यावन्मात्र जो कुछ भी स्थावर जंगम (चराचर) वस्तु उत्पन्न होती है, उस सबको तुम क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से उत्पन्न हुई जानो।।
ಸಮಂ ಸರ್ವೇಷು ಭೂತೇಷು ತಿಷ್ಠನ್ತಂ ಪರಮೇಶ್ವರಮ್।ವಿನಶ್ಯತ್ಸ್ವವಿನಶ್ಯನ್ತಂ ಯಃ ಪಶ್ಯತಿ ಸ ಪಶ್ಯತಿ॥
samaṁ sarveṣhu bhūteṣhu tiṣhṭhantaṁ parameśhvaram vinaśhyatsv avinaśhyantaṁ yaḥ paśhyati sa paśhyati
अर्थजो पुरुष समस्त नश्वर भूतों में अनश्वर परमेश्वर को समभाव से स्थित देखता है, वही (वास्तव में) देखता है।।
ಸಮಂ ಪಶ್ಯನ್ಹಿ ಸರ್ವತ್ರ ಸಮವಸ್ಥಿತಮೀಶ್ವರಮ್।ನ ಹಿನಸ್ತ್ಯಾತ್ಮನಾಽಽತ್ಮಾನಂ ತತೋ ಯಾತಿ ಪರಾಂ ಗತಿಮ್॥
samaṁ paśhyan hi sarvatra samavasthitam īśhvaram na hinasty ātmanātmānaṁ tato yāti parāṁ gatim
अर्थनिश्चय ही, वह पुरुष सर्वत्र सम भाव से स्थित परमेश्वर को समान हुआ आत्मा (स्वयं) के द्वारा आत्मा (स्वयं) का नाश नहीं करता है, इससे वह परम गति को प्राप्त होता है।।
ಪ್ರಕೃತ್ಯೈವ ಚ ಕರ್ಮಾಣಿ ಕ್ರಿಯಮಾಣಾನಿ ಸರ್ವಶಃ।ಯಃ ಪಶ್ಯತಿ ತಥಾಽಽತ್ಮಾನಮಕರ್ತಾರಂ ಸ ಪಶ್ಯತಿ॥
prakṛityaiva cha karmāṇi kriyamāṇāni sarvaśhaḥ yaḥ paśhyati tathātmānam akartāraṁ sa paśhyati
अर्थजो पुरुष समस्त कर्मों को सर्वश: प्रकृति द्वारा ही किये गये देखता है तथा आत्मा को अकर्ता देखता है, वही (वास्तव में) देखता है।।
ಯದಾ ಭೂತಪೃಥಗ್ಭಾವಮೇಕಸ್ಥಮನುಪಶ್ಯತಿ।ತತ ಏವ ಚ ವಿಸ್ತಾರಂ ಬ್ರಹ್ಮ ಸಮ್ಪದ್ಯತೇ ತದಾ॥
yadā bhūta-pṛithag-bhāvam eka-stham anupaśhyati tata eva cha vistāraṁ brahma sampadyate tadā
अर्थयह पुरुष जब भूतों के पृथक् भावों को एक (परमात्मा) में स्थित देखता है तथा उस (परमात्मा) से ही यह विस्तार हुआ जानता है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त होता है।।
ಅನಾದಿತ್ವಾನ್ನಿರ್ಗುಣತ್ವಾತ್ಪರಮಾತ್ಮಾಯಮವ್ಯಯಃ।ಶರೀರಸ್ಥೋಽಪಿ ಕೌನ್ತೇಯ ನ ಕರೋತಿ ನ ಲಿಪ್ಯತೇ॥
anāditvān nirguṇatvāt paramātmāyam avyayaḥ śharīra-stho ’pi kaunteya na karoti na lipyate
अर्थहे कौन्तेय ! अनादि और निर्गुण होने से यह परमात्मा अव्यय है। शरीर में स्थित हुआ भी, वस्तुत:, वह न (कर्म) करता है और न (फलों से) लिप्त होता है।।
ಯಥಾ ಸರ್ವಗತಂ ಸೌಕ್ಷ್ಮ್ಯಾದಾಕಾಶಂ ನೋಪಲಿಪ್ಯತೇ।ಸರ್ವತ್ರಾವಸ್ಥಿತೋ ದೇಹೇ ತಥಾಽಽತ್ಮಾ ನೋಪಲಿಪ್ಯತೇ॥
yathā sarva-gataṁ saukṣhmyād ākāśhaṁ nopalipyate sarvatrāvasthito dehe tathātmā nopalipyate
अर्थजिस प्रकार सर्वगत आकाश सूक्ष्म होने के कारण लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार सर्वत्र देह में स्थित आत्मा लिप्त नहीं होता।।
ಯಥಾ ಪ್ರಕಾಶಯತ್ಯೇಕಃ ಕೃತ್ಸ್ನಂ ಲೋಕಮಿಮಂ ರವಿಃ।ಕ್ಷೇತ್ರಂ ಕ್ಷೇತ್ರೀ ತಥಾ ಕೃತ್ಸ್ನಂ ಪ್ರಕಾಶಯತಿ ಭಾರತ॥
yathā prakāśhayaty ekaḥ kṛitsnaṁ lokam imaṁ raviḥ kṣhetraṁ kṣhetrī tathā kṛitsnaṁ prakāśhayati bhārata
अर्थहे भारत ! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण लोक को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही क्षेत्री (क्षेत्रज्ञ) सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है।।
ಕ್ಷೇತ್ರಕ್ಷೇತ್ರಜ್ಞಯೋರೇವಮನ್ತರಂ ಜ್ಞಾನಚಕ್ಷುಷಾ।ಭೂತಪ್ರಕೃತಿಮೋಕ್ಷಂ ಚ ಯೇ ವಿದುರ್ಯಾನ್ತಿ ತೇ ಪರಮ್॥
kṣhetra-kṣhetrajñayor evam antaraṁ jñāna-chakṣhuṣhā bhūta-prakṛiti-mokṣhaṁ cha ye vidur yānti te param
अर्थइस प्रकार, जो पुरुष ज्ञानचक्षु के द्वारा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को तथा प्रकृति के विकारों से मोक्ष को जानते हैं, वे परम ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।।