శ్రద్ధాత్రయవిభాగయోగ
Bhagavad Gita Chapter 17 in Telugu
Śhraddhā Traya Vibhāg Yog · तीन प्रकार की श्रद्धा · 28 श्लोक
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अध्याय सारांश
भगवद गीता का सत्रहवा अध्याय श्रद्धात्रयविभागयोग है। इस अध्याय में, कृष्ण भौतिक प्रकृति के तीन गुणों से संबंधित तीन प्रकार के विश्वासों का वर्णन करते हैं। भगवान कृष्ण आगे बताते हैं कि यह विश्वास की प्रकृति है जो जीवन की गुणवत्ता और जीवित संस्थाओं के चरित्र को निर्धारित करती है। जो लोग लालसा और अज्ञानता में विश्वास रखते हैं, वे ऐसे कार्य करते हैं जो कि अस्थायी और भौतिक फल देते हैं परन्तु जो लोग अच्छाई में विश्वास रखते हैं वे शास्त्रपूर्ण निर्देशों के अनुसार कार्य करते हैं और इसलिए उन्हें स्थायी और अधिक प्रवीण फल प्राप्त होते हैं जो मन को और भी शुद्ध करते हैं।
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అర్జున ఉవాచయే శాస్త్రవిధిముత్సృజ్య యజన్తే శ్రద్ధయాఽన్వితాః।తేషాం నిష్ఠా తు కా కృష్ణ సత్త్వమాహో రజస్తమః॥
arjuna uvācha ye śhāstra-vidhim utsṛijya yajante śhraddhayānvitāḥ teṣhāṁ niṣhṭhā tu kā kṛiṣhṇa sattvam āho rajas tamaḥ
अर्थअर्जुन ने कहा -- हे कृष्ण ! जो लोग शास्त्रविधि को त्यागकर (केवल) श्रद्धा युक्त यज्ञ (पूजा) करते हैं, उनकी स्थिति (निष्ठा) कौन सी है ?क्या वह सात्त्विक है अथवा राजसिक या तामसिक ?
శ్రీ భగవానువాచత్రివిధా భవతి శ్రద్ధా దేహినాం సా స్వభావజా।సాత్త్వికీ రాజసీ చైవ తామసీ చేతి తాం శ్రృణు॥
śhrī-bhagavān uvācha tri-vidhā bhavati śhraddhā dehināṁ sā svabhāva-jā sāttvikī rājasī chaiva tāmasī cheti tāṁ śhṛiṇu
अर्थश्री भगवान् ने कहा -- देहधारियों (मनुष्यों) की वह स्वाभाविक (ज्ञानरहित) श्रद्धा तीन प्रकार की - सात्त्विक, राजसिक और तामसिक - होती हैं, उसे तुम मुझसे सुनो।।
సత్త్వానురూపా సర్వస్య శ్రద్ధా భవతి భారత।శ్రద్ధామయోఽయం పురుషో యో యచ్ఛ్రద్ధః స ఏవ సః॥
sattvānurūpā sarvasya śhraddhā bhavati bhārata śhraddhā-mayo ‘yaṁ puruṣho yo yach-chhraddhaḥ sa eva saḥ
अर्थहे भारत सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके सत्त्व (स्वभाव, संस्कार) के अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिए जो पुरुष जिस श्रद्धा वाला है वह स्वयं भी वही है अर्थात् जैसी जिसकी श्रद्धा वैसा ही उसका स्वरूप होता है।।
యజన్తే సాత్త్వికా దేవాన్యక్షరక్షాంసి రాజసాః।ప్రేతాన్భూతగణాంశ్చాన్యే యజన్తే తామసా జనాః॥
yajante sāttvikā devān yakṣha-rakṣhānsi rājasāḥ pretān bhūta-gaṇānśh chānye yajante tāmasā janāḥ
अर्थसात्त्विक पुरुष देवताओं को पूजते हैं और राजस लोग यक्ष और राक्षसों को, तथा अन्य तामसी जन प्रेत और भूतगणों को पूजते हैं।।
అశాస్త్రవిహితం ఘోరం తప్యన్తే యే తపో జనాః।దమ్భాహఙ్కారసంయుక్తాః కామరాగబలాన్వితాః॥
aśhāstra-vihitaṁ ghoraṁ tapyante ye tapo janāḥ dambhāhankāra-sanyuktāḥ kāma-rāga-balānvitāḥ
अर्थजो लोग शास्त्रविधि से रहित घोर तप करते हैं तथा दम्भ, अहंकार, काम और राग से भी युक्त होते हैं।।
కర్షయన్తః శరీరస్థం భూతగ్రామమచేతసః।మాం చైవాన్తఃశరీరస్థం తాన్విద్ధ్యాసురనిశ్చయాన్॥
karṣhayantaḥ śharīra-sthaṁ bhūta-grāmam achetasaḥ māṁ chaivāntaḥ śharīra-sthaṁ tān viddhy āsura-niśhchayān
अर्थऔर शरीरस्थ भूतसमुदाय को तथा मुझ अन्तर्यामी को भी कृश करने वाले अर्थात् कष्ट पहुँचाने वाले जो अविवेकी लोग हैं, उन्हें तुम आसुरी निश्चय वाले जानो।।
ఆహారస్త్వపి సర్వస్య త్రివిధో భవతి ప్రియః।యజ్ఞస్తపస్తథా దానం తేషాం భేదమిమం శ్రృణు॥
āhāras tv api sarvasya tri-vidho bhavati priyaḥ yajñas tapas tathā dānaṁ teṣhāṁ bhedam imaṁ śhṛiṇu
अर्थ(अपनीअपनी प्रकृति के अनुसार) सब का प्रिय भोजन भी तीन प्रकार का होता है? उसी प्रकार यज्ञ? तप और दान भी तीन प्रकार के होते हैं? उनके भेद को तुम मुझसे सुनो।।
ఆయుఃసత్త్వబలారోగ్యసుఖప్రీతివివర్ధనాః।రస్యాః స్నిగ్ధాః స్థిరా హృద్యా ఆహారాః సాత్త్వికప్రియాః॥
āyuḥ-sattva-balārogya-sukha-prīti-vivardhanāḥ rasyāḥ snigdhāḥ sthirā hṛidyā āhārāḥ sāttvika-priyāḥ
अर्थआयु, सत्त्व (शुद्धि), बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को प्रवृद्ध करने वाले एवं रसयुक्त, स्निग्ध ( घी आदि की चिकनाई से युक्त) स्थिर तथा मन को प्रसन्न करने वाले आहार अर्थात् भोज्य पदार्थ सात्त्विक पुरुषों को प्रिय होते हैं।।
కట్వమ్లలవణాత్యుష్ణతీక్ష్ణరూక్షవిదాహినః।ఆహారా రాజసస్యేష్టా దుఃఖశోకామయప్రదాః॥
kaṭv-amla-lavaṇāty-uṣhṇa- tīkṣhṇa-rūkṣha-vidāhinaḥ āhārā rājasasyeṣhṭā duḥkha-śhokāmaya-pradāḥ
अर्थकड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, अति उष्ण, तीक्ष्ण (तीखे, मिर्च युक्त), रूखे. दाहकारक, दु:ख, शोक और रोग उत्पन्न कारक भोज्य पदार्थ राजस पुरुष को प्रिय होते हैं।।
యాతయామం గతరసం పూతి పర్యుషితం చ యత్।ఉచ్ఛిష్టమపి చామేధ్యం భోజనం తామసప్రియమ్॥
yāta-yāmaṁ gata-rasaṁ pūti paryuṣhitaṁ cha yat uchchhiṣhṭam api chāmedhyaṁ bhojanaṁ tāmasa-priyam
अर्थअर्धपक्व, रसरहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी, उच्छिष्ट तथा अपवित्र (अमेध्य) अन्न तामस जनों को प्रिय होता है।।
అఫలాకాఙ్క్షిభిర్యజ్ఞో విధిదృష్టో య ఇజ్యతే।యష్టవ్యమేవేతి మనః సమాధాయ స సాత్త్వికః॥
aphalākāṅkṣhibhir yajño vidhi-driṣhṭo ya ijyate yaṣhṭavyam eveti manaḥ samādhāya sa sāttvikaḥ
अर्थजो यज्ञ शास्त्रविधि से नियन्त्रित किया हुआ तथा जिसे "यह मेरा कर्तव्य है" ऐसा मन का समाधान (निश्चय) कर फल की आकांक्षा नहीं रखने वाले लोगों के द्वारा किया जाता है, वह यज्ञ सात्त्विक है।।
అభిసంధాయ తు ఫలం దమ్భార్థమపి చైవ యత్।ఇజ్యతే భరతశ్రేష్ఠ తం యజ్ఞం విద్ధి రాజసమ్॥
abhisandhāya tu phalaṁ dambhārtham api chaiva yat ijyate bharata-śhreṣhṭha taṁ yajñaṁ viddhi rājasam
अर्थहे भरतश्रेष्ठ अर्जुन ! जो यज्ञ दम्भ के लिए तथा फल की आकांक्षा रख कर किया जाता है, उस यज्ञ को तुम राजस समझो।।
విధిహీనమసృష్టాన్నం మన్త్రహీనమదక్షిణమ్।శ్రద్ధావిరహితం యజ్ఞం తామసం పరిచక్షతే॥
vidhi-hīnam asṛiṣhṭānnaṁ mantra-hīnam adakṣhiṇam śhraddhā-virahitaṁ yajñaṁ tāmasaṁ parichakṣhate
अर्थशास्त्रविधि से रहित, अन्नदान से रहित, बिना मन्त्रों, बिना दक्षिणा और बिना श्रद्धा के किये हुए यज्ञ को तामस यज्ञ कहते हैं।।
దేవద్విజగురుప్రాజ్ఞపూజనం శౌచమార్జవమ్।బ్రహ్మచర్యమహింసా చ శారీరం తప ఉచ్యతే॥
deva-dwija-guru-prājña- pūjanaṁ śhaucham ārjavam brahmacharyam ahinsā cha śhārīraṁ tapa uchyate
अर्थदेव, द्विज (ब्राह्मण), गुरु और ज्ञानी जनों का पूजन, शौच, आर्जव (सरलता), ब्रह्मचर्य और अहिंसा, यह शरीर संबंधी तप कहा जाता है।।
అనుద్వేగకరం వాక్యం సత్యం ప్రియహితం చ యత్।స్వాధ్యాయాభ్యసనం చైవ వాఙ్మయం తప ఉచ్యతే॥
anudvega-karaṁ vākyaṁ satyaṁ priya-hitaṁ cha yat svādhyāyābhyasanaṁ chaiva vāṅ-mayaṁ tapa uchyate
अर्थजो वाक्य (भाषण) उद्वेग उत्पन्न करने वाला नहीं है, जो प्रिय, हितकारक और सत्य है तथा वेदों का स्वाध्याय अभ्यास वाङ्मय (वाणी का) तप कहलाता है।।
మనఃప్రసాదః సౌమ్యత్వం మౌనమాత్మవినిగ్రహః।భావసంశుద్ధిరిత్యేతత్తపో మానసముచ్యతే॥
manaḥ-prasādaḥ saumyatvaṁ maunam ātma-vinigrahaḥ bhāva-sanśhuddhir ity etat tapo mānasam uchyate
अर्थमन की प्रसन्नता, सौम्यभाव, मौन आत्मसंयम और अन्त:करण की शुद्धि यह सब मानस तप कहलाता है।।
శ్రద్ధయా పరయా తప్తం తపస్తత్ిత్రవిధం నరైః।అఫలాకాఙ్క్షిభిర్యుక్తైః సాత్త్వికం పరిచక్షతే॥
śhraddhayā parayā taptaṁ tapas tat tri-vidhaṁ naraiḥ aphalākāṅkṣhibhir yuktaiḥ sāttvikaṁ parichakṣhate
अर्थफल की आकांक्षा न रखने वाले युक्त पुरुषों के द्वारा परम श्रद्धा से किये गये उस पूर्वोक्त त्रिविध तप को सात्त्विक कहते हैं।।
సత్కారమానపూజార్థం తపో దమ్భేన చైవ యత్।క్రియతే తదిహ ప్రోక్తం రాజసం చలమధ్రువమ్॥
satkāra-māna-pūjārthaṁ tapo dambhena chaiva yat kriyate tad iha proktaṁ rājasaṁ chalam adhruvam
अर्थजो तप सत्कार, मान और पूजा के लिए अथवा केवल दम्भ (पाखण्ड) से ही किया जाता है, वह अनिश्चित और क्षणिक तप यहाँ राजस कहा गया है।।
మూఢగ్రాహేణాత్మనో యత్పీడయా క్రియతే తపః।పరస్యోత్సాదనార్థం వా తత్తామసముదాహృతమ్॥
mūḍha-grāheṇātmano yat pīḍayā kriyate tapaḥ parasyotsādanārthaṁ vā tat tāmasam udāhṛitam
अर्थजो तप मूढ़तापूर्वक स्वयं को पीड़ित करते हुए अथवा अन्य लोगों के नाश के लिए किया जाता है, वह तप तामस कहा गया है।।
దాతవ్యమితి యద్దానం దీయతేఽనుపకారిణే।దేశే కాలే చ పాత్రే చ తద్దానం సాత్త్వికం స్మృతమ్॥
dātavyam iti yad dānaṁ dīyate ‘nupakāriṇe deśhe kāle cha pātre cha tad dānaṁ sāttvikaṁ smṛitam
अर्थ"दान देना ही कर्तव्य है" - इस भाव से जो दान योग्य देश, काल को देखकर ऐसे (योग्य) पात्र (व्यक्ति) को दिया जाता है, जिससे प्रत्युपकार की अपेक्षा नहीं होती है, वह दान सात्त्विक माना गया है।।
యత్తు ప్రత్యుపకారార్థం ఫలముద్దిశ్య వా పునః।దీయతే చ పరిక్లిష్టం తద్దానం రాజసం స్మృతమ్॥
yat tu pratyupakārārthaṁ phalam uddiśhya vā punaḥ dīyate cha parikliṣhṭaṁ tad dānaṁ rājasaṁ smṛitam
अर्थऔर जो दान क्लेशपूर्वक तथा प्रत्युपकार के उद्देश्य से अथवा फल की कामना रखकर दिया जाता हैं, वह दान राजस माना गया है।।
అదేశకాలే యద్దానమపాత్రేభ్యశ్చ దీయతే।అసత్కృతమవజ్ఞాతం తత్తామసముదాహృతమ్॥
adeśha-kāle yad dānam apātrebhyaśh cha dīyate asat-kṛitam avajñātaṁ tat tāmasam udāhṛitam
अर्थजो दान बिना सत्कार किये, अथवा तिरस्कारपूर्वक, अयोग्य देशकाल में, कुपात्रों के लिए दिया जाता है, वह दान तामस माना गया है।।
తత్సదితి నిర్దేశో బ్రహ్మణస్త్రివిధః స్మృతః।బ్రాహ్మణాస్తేన వేదాశ్చ యజ్ఞాశ్చ విహితాః పురా॥
oṁ tat sad iti nirdeśho brahmaṇas tri-vidhaḥ smṛitaḥ brāhmaṇās tena vedāśh cha yajñāśh cha vihitāḥ purā
अर्थ'ऊँ, तत् सत्' ऐसा यह ब्रह्म का त्रिविध निर्देश (नाम) कहा गया है; उसी से आदिकाल में (पुरा) ब्राहम्ण, वेद और यज्ञ निर्मित हुए हैं।।
తస్మాదోమిత్యుదాహృత్య యజ్ఞదానతపఃక్రియాః।ప్రవర్తన్తే విధానోక్తాః సతతం బ్రహ్మవాదినామ్॥
tasmād oṁ ity udāhṛitya yajña-dāna-tapaḥ-kriyāḥ pravartante vidhānoktāḥ satataṁ brahma-vādinām
अर्थइसलिए, ब्रह्मवादियों की शास्त्र प्रतिपादित यज्ञ, दान और तप की क्रियायें सदैव ओंकार के उच्चारण के साथ प्रारम्भ होती हैं।।
తదిత్యనభిసన్ధాయ ఫలం యజ్ఞతపఃక్రియాః।దానక్రియాశ్చ వివిధాః క్రియన్తే మోక్షకాఙ్క్షి॥
tad ity anabhisandhāya phalaṁ yajña-tapaḥ-kriyāḥ dāna-kriyāśh cha vividhāḥ kriyante mokṣha-kāṅkṣhibhiḥ
अर्थ'तत्' शब्द का उच्चारण कर, फल की इच्छा नहीं रखते हुए, मुमुक्षुजन यज्ञ, तप, दान आदि विविध कर्म करते हैं।।
సద్భావే సాధుభావే చ సదిత్యేతత్ప్రయుజ్యతే।ప్రశస్తే కర్మణి తథా సచ్ఛబ్దః పార్థ యుజ్యతే॥
sad-bhāve sādhu-bhāve cha sad ity etat prayujyate praśhaste karmaṇi tathā sach-chhabdaḥ pārtha yujyate
अर्थहे पार्थ ! सत्य भाव व साधुभाव में 'सत्' शब्द का प्रयोग किया जाता है, और प्रशस्त (श्रेष्ठ, शुभ) कर्म में 'सत्' शब्द प्रयुक्त होता है।।
యజ్ఞే తపసి దానే చ స్థితిః సదితి చోచ్యతే।కర్మ చైవ తదర్థీయం సదిత్యేవాభిధీయతే॥
yajñe tapasi dāne cha sthitiḥ sad iti chochyate karma chaiva tad-arthīyaṁ sad ity evābhidhīyate
अर्थयज्ञ, तप और दान में दृढ़ स्थिति भी सत् कही जाती है, और उस (परमात्मा) के लिए किया गया कर्म भी सत् ही कहलाता है।।
అశ్రద్ధయా హుతం దత్తం తపస్తప్తం కృతం చ యత్।అసదిత్యుచ్యతే పార్థ న చ తత్ప్రేత్య నో ఇహ॥
aśhraddhayā hutaṁ dattaṁ tapas taptaṁ kṛitaṁ cha yat asad ity uchyate pārtha na cha tat pretya no iha
अर्थहे पार्थ ! जो यज्ञ, दान, तप और कर्म अश्रद्धापूर्वक किया जाता है, वह 'असत्' कहा जाता है; वह न इस लोक में (इह) और न मरण के पश्चात् (उस लोक में) लाभदायक होता है।।