ਸ਼੍ਰਦ੍ਧਾਤ੍ਰਯਵਿਭਾਗਯੋਗ
Bhagavad Gita Chapter 17 in Punjabi (Gurmukhi)
Śhraddhā Traya Vibhāg Yog · तीन प्रकार की श्रद्धा · 28 श्लोक
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अध्याय सारांश
भगवद गीता का सत्रहवा अध्याय श्रद्धात्रयविभागयोग है। इस अध्याय में, कृष्ण भौतिक प्रकृति के तीन गुणों से संबंधित तीन प्रकार के विश्वासों का वर्णन करते हैं। भगवान कृष्ण आगे बताते हैं कि यह विश्वास की प्रकृति है जो जीवन की गुणवत्ता और जीवित संस्थाओं के चरित्र को निर्धारित करती है। जो लोग लालसा और अज्ञानता में विश्वास रखते हैं, वे ऐसे कार्य करते हैं जो कि अस्थायी और भौतिक फल देते हैं परन्तु जो लोग अच्छाई में विश्वास रखते हैं वे शास्त्रपूर्ण निर्देशों के अनुसार कार्य करते हैं और इसलिए उन्हें स्थायी और अधिक प्रवीण फल प्राप्त होते हैं जो मन को और भी शुद्ध करते हैं।
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ਅਰ੍ਜੁਨ ਉਵਾਚਯੇ ਸ਼ਾਸ੍ਤ੍ਰਵਿਧਿਮੁਤ੍ਸृਜ੍ਯ ਯਜਨ੍ਤੇ ਸ਼੍ਰਦ੍ਧਯਾऽਨ੍ਵਿਤਾਃ।ਤੇषਾਂ ਨਿष੍ਠਾ ਤੁ ਕਾ ਕृष੍ਣ ਸਤ੍ਤ੍ਵਮਾਹੋ ਰਜਸ੍ਤਮਃ॥
arjuna uvācha ye śhāstra-vidhim utsṛijya yajante śhraddhayānvitāḥ teṣhāṁ niṣhṭhā tu kā kṛiṣhṇa sattvam āho rajas tamaḥ
अर्थअर्जुन ने कहा -- हे कृष्ण ! जो लोग शास्त्रविधि को त्यागकर (केवल) श्रद्धा युक्त यज्ञ (पूजा) करते हैं, उनकी स्थिति (निष्ठा) कौन सी है ?क्या वह सात्त्विक है अथवा राजसिक या तामसिक ?
ਸ਼੍ਰੀ ਭਗਵਾਨੁਵਾਚਤ੍ਰਿਵਿਧਾ ਭਵਤਿ ਸ਼੍ਰਦ੍ਧਾ ਦੇਹਿਨਾਂ ਸਾ ਸ੍ਵਭਾਵਜਾ।ਸਾਤ੍ਤ੍ਵਿਕੀ ਰਾਜਸੀ ਚੈਵ ਤਾਮਸੀ ਚੇਤਿ ਤਾਂ ਸ਼੍ਰृਣੁ॥
śhrī-bhagavān uvācha tri-vidhā bhavati śhraddhā dehināṁ sā svabhāva-jā sāttvikī rājasī chaiva tāmasī cheti tāṁ śhṛiṇu
अर्थश्री भगवान् ने कहा -- देहधारियों (मनुष्यों) की वह स्वाभाविक (ज्ञानरहित) श्रद्धा तीन प्रकार की - सात्त्विक, राजसिक और तामसिक - होती हैं, उसे तुम मुझसे सुनो।।
ਸਤ੍ਤ੍ਵਾਨੁਰੂਪਾ ਸਰ੍ਵਸ੍ਯ ਸ਼੍ਰਦ੍ਧਾ ਭਵਤਿ ਭਾਰਤ।ਸ਼੍ਰਦ੍ਧਾਮਯੋऽਯਂ ਪੁਰੁषੋ ਯੋ ਯਚ੍ਛ੍ਰਦ੍ਧਃ ਸ ਏਵ ਸਃ॥
sattvānurūpā sarvasya śhraddhā bhavati bhārata śhraddhā-mayo ‘yaṁ puruṣho yo yach-chhraddhaḥ sa eva saḥ
अर्थहे भारत सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके सत्त्व (स्वभाव, संस्कार) के अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिए जो पुरुष जिस श्रद्धा वाला है वह स्वयं भी वही है अर्थात् जैसी जिसकी श्रद्धा वैसा ही उसका स्वरूप होता है।।
ਯਜਨ੍ਤੇ ਸਾਤ੍ਤ੍ਵਿਕਾ ਦੇਵਾਨ੍ਯਕ੍षਰਕ੍षਾਂਸਿ ਰਾਜਸਾਃ।ਪ੍ਰੇਤਾਨ੍ਭੂਤਗਣਾਂਸ਼੍ਚਾਨ੍ਯੇ ਯਜਨ੍ਤੇ ਤਾਮਸਾ ਜਨਾਃ॥
yajante sāttvikā devān yakṣha-rakṣhānsi rājasāḥ pretān bhūta-gaṇānśh chānye yajante tāmasā janāḥ
अर्थसात्त्विक पुरुष देवताओं को पूजते हैं और राजस लोग यक्ष और राक्षसों को, तथा अन्य तामसी जन प्रेत और भूतगणों को पूजते हैं।।
ਅਸ਼ਾਸ੍ਤ੍ਰਵਿਹਿਤਂ ਘੋਰਂ ਤਪ੍ਯਨ੍ਤੇ ਯੇ ਤਪੋ ਜਨਾਃ।ਦਮ੍ਭਾਹਙ੍ਕਾਰਸਂਯੁਕ੍ਤਾਃ ਕਾਮਰਾਗਬਲਾਨ੍ਵਿਤਾਃ॥
aśhāstra-vihitaṁ ghoraṁ tapyante ye tapo janāḥ dambhāhankāra-sanyuktāḥ kāma-rāga-balānvitāḥ
अर्थजो लोग शास्त्रविधि से रहित घोर तप करते हैं तथा दम्भ, अहंकार, काम और राग से भी युक्त होते हैं।।
ਕਰ੍षਯਨ੍ਤਃ ਸ਼ਰੀਰਸ੍ਥਂ ਭੂਤਗ੍ਰਾਮਮਚੇਤਸਃ।ਮਾਂ ਚੈਵਾਨ੍ਤਃਸ਼ਰੀਰਸ੍ਥਂ ਤਾਨ੍ਵਿਦ੍ਧ੍ਯਾਸੁਰਨਿਸ਼੍ਚਯਾਨ੍॥
karṣhayantaḥ śharīra-sthaṁ bhūta-grāmam achetasaḥ māṁ chaivāntaḥ śharīra-sthaṁ tān viddhy āsura-niśhchayān
अर्थऔर शरीरस्थ भूतसमुदाय को तथा मुझ अन्तर्यामी को भी कृश करने वाले अर्थात् कष्ट पहुँचाने वाले जो अविवेकी लोग हैं, उन्हें तुम आसुरी निश्चय वाले जानो।।
ਆਹਾਰਸ੍ਤ੍ਵਪਿ ਸਰ੍ਵਸ੍ਯ ਤ੍ਰਿਵਿਧੋ ਭਵਤਿ ਪ੍ਰਿਯਃ।ਯਜ੍ਞਸ੍ਤਪਸ੍ਤਥਾ ਦਾਨਂ ਤੇषਾਂ ਭੇਦਮਿਮਂ ਸ਼੍ਰृਣੁ॥
āhāras tv api sarvasya tri-vidho bhavati priyaḥ yajñas tapas tathā dānaṁ teṣhāṁ bhedam imaṁ śhṛiṇu
अर्थ(अपनीअपनी प्रकृति के अनुसार) सब का प्रिय भोजन भी तीन प्रकार का होता है? उसी प्रकार यज्ञ? तप और दान भी तीन प्रकार के होते हैं? उनके भेद को तुम मुझसे सुनो।।
ਆਯੁਃਸਤ੍ਤ੍ਵਬਲਾਰੋਗ੍ਯਸੁਖਪ੍ਰੀਤਿਵਿਵਰ੍ਧਨਾਃ।ਰਸ੍ਯਾਃ ਸ੍ਨਿਗ੍ਧਾਃ ਸ੍ਥਿਰਾ ਹृਦ੍ਯਾ ਆਹਾਰਾਃ ਸਾਤ੍ਤ੍ਵਿਕਪ੍ਰਿਯਾਃ॥
āyuḥ-sattva-balārogya-sukha-prīti-vivardhanāḥ rasyāḥ snigdhāḥ sthirā hṛidyā āhārāḥ sāttvika-priyāḥ
अर्थआयु, सत्त्व (शुद्धि), बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को प्रवृद्ध करने वाले एवं रसयुक्त, स्निग्ध ( घी आदि की चिकनाई से युक्त) स्थिर तथा मन को प्रसन्न करने वाले आहार अर्थात् भोज्य पदार्थ सात्त्विक पुरुषों को प्रिय होते हैं।।
ਕਟ੍ਵਮ੍ਲਲਵਣਾਤ੍ਯੁष੍ਣਤੀਕ੍ष੍ਣਰੂਕ੍षਵਿਦਾਹਿਨਃ।ਆਹਾਰਾ ਰਾਜਸਸ੍ਯੇष੍ਟਾ ਦੁਃਖਸ਼ੋਕਾਮਯਪ੍ਰਦਾਃ॥
kaṭv-amla-lavaṇāty-uṣhṇa- tīkṣhṇa-rūkṣha-vidāhinaḥ āhārā rājasasyeṣhṭā duḥkha-śhokāmaya-pradāḥ
अर्थकड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, अति उष्ण, तीक्ष्ण (तीखे, मिर्च युक्त), रूखे. दाहकारक, दु:ख, शोक और रोग उत्पन्न कारक भोज्य पदार्थ राजस पुरुष को प्रिय होते हैं।।
ਯਾਤਯਾਮਂ ਗਤਰਸਂ ਪੂਤਿ ਪਰ੍ਯੁषਿਤਂ ਚ ਯਤ੍।ਉਚ੍ਛਿष੍ਟਮਪਿ ਚਾਮੇਧ੍ਯਂ ਭੋਜਨਂ ਤਾਮਸਪ੍ਰਿਯਮ੍॥
yāta-yāmaṁ gata-rasaṁ pūti paryuṣhitaṁ cha yat uchchhiṣhṭam api chāmedhyaṁ bhojanaṁ tāmasa-priyam
अर्थअर्धपक्व, रसरहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी, उच्छिष्ट तथा अपवित्र (अमेध्य) अन्न तामस जनों को प्रिय होता है।।
ਅਫਲਾਕਾਙ੍ਕ੍षਿਭਿਰ੍ਯਜ੍ਞੋ ਵਿਧਿਦृष੍ਟੋ ਯ ਇਜ੍ਯਤੇ।ਯष੍ਟਵ੍ਯਮੇਵੇਤਿ ਮਨਃ ਸਮਾਧਾਯ ਸ ਸਾਤ੍ਤ੍ਵਿਕਃ॥
aphalākāṅkṣhibhir yajño vidhi-driṣhṭo ya ijyate yaṣhṭavyam eveti manaḥ samādhāya sa sāttvikaḥ
अर्थजो यज्ञ शास्त्रविधि से नियन्त्रित किया हुआ तथा जिसे "यह मेरा कर्तव्य है" ऐसा मन का समाधान (निश्चय) कर फल की आकांक्षा नहीं रखने वाले लोगों के द्वारा किया जाता है, वह यज्ञ सात्त्विक है।।
ਅਭਿਸਂਧਾਯ ਤੁ ਫਲਂ ਦਮ੍ਭਾਰ੍ਥਮਪਿ ਚੈਵ ਯਤ੍।ਇਜ੍ਯਤੇ ਭਰਤਸ਼੍ਰੇष੍ਠ ਤਂ ਯਜ੍ਞਂ ਵਿਦ੍ਧਿ ਰਾਜਸਮ੍॥
abhisandhāya tu phalaṁ dambhārtham api chaiva yat ijyate bharata-śhreṣhṭha taṁ yajñaṁ viddhi rājasam
अर्थहे भरतश्रेष्ठ अर्जुन ! जो यज्ञ दम्भ के लिए तथा फल की आकांक्षा रख कर किया जाता है, उस यज्ञ को तुम राजस समझो।।
ਵਿਧਿਹੀਨਮਸृष੍ਟਾਨ੍ਨਂ ਮਨ੍ਤ੍ਰਹੀਨਮਦਕ੍षਿਣਮ੍।ਸ਼੍ਰਦ੍ਧਾਵਿਰਹਿਤਂ ਯਜ੍ਞਂ ਤਾਮਸਂ ਪਰਿਚਕ੍षਤੇ॥
vidhi-hīnam asṛiṣhṭānnaṁ mantra-hīnam adakṣhiṇam śhraddhā-virahitaṁ yajñaṁ tāmasaṁ parichakṣhate
अर्थशास्त्रविधि से रहित, अन्नदान से रहित, बिना मन्त्रों, बिना दक्षिणा और बिना श्रद्धा के किये हुए यज्ञ को तामस यज्ञ कहते हैं।।
ਦੇਵਦ੍ਵਿਜਗੁਰੁਪ੍ਰਾਜ੍ਞਪੂਜਨਂ ਸ਼ੌਚਮਾਰ੍ਜਵਮ੍।ਬ੍ਰਹ੍ਮਚਰ੍ਯਮਹਿਂਸਾ ਚ ਸ਼ਾਰੀਰਂ ਤਪ ਉਚ੍ਯਤੇ॥
deva-dwija-guru-prājña- pūjanaṁ śhaucham ārjavam brahmacharyam ahinsā cha śhārīraṁ tapa uchyate
अर्थदेव, द्विज (ब्राह्मण), गुरु और ज्ञानी जनों का पूजन, शौच, आर्जव (सरलता), ब्रह्मचर्य और अहिंसा, यह शरीर संबंधी तप कहा जाता है।।
ਅਨੁਦ੍ਵੇਗਕਰਂ ਵਾਕ੍ਯਂ ਸਤ੍ਯਂ ਪ੍ਰਿਯਹਿਤਂ ਚ ਯਤ੍।ਸ੍ਵਾਧ੍ਯਾਯਾਭ੍ਯਸਨਂ ਚੈਵ ਵਾਙ੍ਮਯਂ ਤਪ ਉਚ੍ਯਤੇ॥
anudvega-karaṁ vākyaṁ satyaṁ priya-hitaṁ cha yat svādhyāyābhyasanaṁ chaiva vāṅ-mayaṁ tapa uchyate
अर्थजो वाक्य (भाषण) उद्वेग उत्पन्न करने वाला नहीं है, जो प्रिय, हितकारक और सत्य है तथा वेदों का स्वाध्याय अभ्यास वाङ्मय (वाणी का) तप कहलाता है।।
ਮਨਃਪ੍ਰਸਾਦਃ ਸੌਮ੍ਯਤ੍ਵਂ ਮੌਨਮਾਤ੍ਮਵਿਨਿਗ੍ਰਹਃ।ਭਾਵਸਂਸ਼ੁਦ੍ਧਿਰਿਤ੍ਯੇਤਤ੍ਤਪੋ ਮਾਨਸਮੁਚ੍ਯਤੇ॥
manaḥ-prasādaḥ saumyatvaṁ maunam ātma-vinigrahaḥ bhāva-sanśhuddhir ity etat tapo mānasam uchyate
अर्थमन की प्रसन्नता, सौम्यभाव, मौन आत्मसंयम और अन्त:करण की शुद्धि यह सब मानस तप कहलाता है।।
ਸ਼੍ਰਦ੍ਧਯਾ ਪਰਯਾ ਤਪ੍ਤਂ ਤਪਸ੍ਤਤ੍ਿਤ੍ਰਵਿਧਂ ਨਰੈਃ।ਅਫਲਾਕਾਙ੍ਕ੍षਿਭਿਰ੍ਯੁਕ੍ਤੈਃ ਸਾਤ੍ਤ੍ਵਿਕਂ ਪਰਿਚਕ੍षਤੇ॥
śhraddhayā parayā taptaṁ tapas tat tri-vidhaṁ naraiḥ aphalākāṅkṣhibhir yuktaiḥ sāttvikaṁ parichakṣhate
अर्थफल की आकांक्षा न रखने वाले युक्त पुरुषों के द्वारा परम श्रद्धा से किये गये उस पूर्वोक्त त्रिविध तप को सात्त्विक कहते हैं।।
ਸਤ੍ਕਾਰਮਾਨਪੂਜਾਰ੍ਥਂ ਤਪੋ ਦਮ੍ਭੇਨ ਚੈਵ ਯਤ੍।ਕ੍ਰਿਯਤੇ ਤਦਿਹ ਪ੍ਰੋਕ੍ਤਂ ਰਾਜਸਂ ਚਲਮਧ੍ਰੁਵਮ੍॥
satkāra-māna-pūjārthaṁ tapo dambhena chaiva yat kriyate tad iha proktaṁ rājasaṁ chalam adhruvam
अर्थजो तप सत्कार, मान और पूजा के लिए अथवा केवल दम्भ (पाखण्ड) से ही किया जाता है, वह अनिश्चित और क्षणिक तप यहाँ राजस कहा गया है।।
ਮੂਢਗ੍ਰਾਹੇਣਾਤ੍ਮਨੋ ਯਤ੍ਪੀਡਯਾ ਕ੍ਰਿਯਤੇ ਤਪਃ।ਪਰਸ੍ਯੋਤ੍ਸਾਦਨਾਰ੍ਥਂ ਵਾ ਤਤ੍ਤਾਮਸਮੁਦਾਹृਤਮ੍॥
mūḍha-grāheṇātmano yat pīḍayā kriyate tapaḥ parasyotsādanārthaṁ vā tat tāmasam udāhṛitam
अर्थजो तप मूढ़तापूर्वक स्वयं को पीड़ित करते हुए अथवा अन्य लोगों के नाश के लिए किया जाता है, वह तप तामस कहा गया है।।
ਦਾਤਵ੍ਯਮਿਤਿ ਯਦ੍ਦਾਨਂ ਦੀਯਤੇऽਨੁਪਕਾਰਿਣੇ।ਦੇਸ਼ੇ ਕਾਲੇ ਚ ਪਾਤ੍ਰੇ ਚ ਤਦ੍ਦਾਨਂ ਸਾਤ੍ਤ੍ਵਿਕਂ ਸ੍ਮृਤਮ੍॥
dātavyam iti yad dānaṁ dīyate ‘nupakāriṇe deśhe kāle cha pātre cha tad dānaṁ sāttvikaṁ smṛitam
अर्थ"दान देना ही कर्तव्य है" - इस भाव से जो दान योग्य देश, काल को देखकर ऐसे (योग्य) पात्र (व्यक्ति) को दिया जाता है, जिससे प्रत्युपकार की अपेक्षा नहीं होती है, वह दान सात्त्विक माना गया है।।
ਯਤ੍ਤੁ ਪ੍ਰਤ੍ਯੁਪਕਾਰਾਰ੍ਥਂ ਫਲਮੁਦ੍ਦਿਸ਼੍ਯ ਵਾ ਪੁਨਃ।ਦੀਯਤੇ ਚ ਪਰਿਕ੍ਲਿष੍ਟਂ ਤਦ੍ਦਾਨਂ ਰਾਜਸਂ ਸ੍ਮृਤਮ੍॥
yat tu pratyupakārārthaṁ phalam uddiśhya vā punaḥ dīyate cha parikliṣhṭaṁ tad dānaṁ rājasaṁ smṛitam
अर्थऔर जो दान क्लेशपूर्वक तथा प्रत्युपकार के उद्देश्य से अथवा फल की कामना रखकर दिया जाता हैं, वह दान राजस माना गया है।।
ਅਦੇਸ਼ਕਾਲੇ ਯਦ੍ਦਾਨਮਪਾਤ੍ਰੇਭ੍ਯਸ਼੍ਚ ਦੀਯਤੇ।ਅਸਤ੍ਕृਤਮਵਜ੍ਞਾਤਂ ਤਤ੍ਤਾਮਸਮੁਦਾਹृਤਮ੍॥
adeśha-kāle yad dānam apātrebhyaśh cha dīyate asat-kṛitam avajñātaṁ tat tāmasam udāhṛitam
अर्थजो दान बिना सत्कार किये, अथवा तिरस्कारपूर्वक, अयोग्य देशकाल में, कुपात्रों के लिए दिया जाता है, वह दान तामस माना गया है।।
ਤਤ੍ਸਦਿਤਿ ਨਿਰ੍ਦੇਸ਼ੋ ਬ੍ਰਹ੍ਮਣਸ੍ਤ੍ਰਿਵਿਧਃ ਸ੍ਮृਤਃ।ਬ੍ਰਾਹ੍ਮਣਾਸ੍ਤੇਨ ਵੇਦਾਸ਼੍ਚ ਯਜ੍ਞਾਸ਼੍ਚ ਵਿਹਿਤਾਃ ਪੁਰਾ॥
oṁ tat sad iti nirdeśho brahmaṇas tri-vidhaḥ smṛitaḥ brāhmaṇās tena vedāśh cha yajñāśh cha vihitāḥ purā
अर्थ'ऊँ, तत् सत्' ऐसा यह ब्रह्म का त्रिविध निर्देश (नाम) कहा गया है; उसी से आदिकाल में (पुरा) ब्राहम्ण, वेद और यज्ञ निर्मित हुए हैं।।
ਤਸ੍ਮਾਦੋਮਿਤ੍ਯੁਦਾਹृਤ੍ਯ ਯਜ੍ਞਦਾਨਤਪਃਕ੍ਰਿਯਾਃ।ਪ੍ਰਵਰ੍ਤਨ੍ਤੇ ਵਿਧਾਨੋਕ੍ਤਾਃ ਸਤਤਂ ਬ੍ਰਹ੍ਮਵਾਦਿਨਾਮ੍॥
tasmād oṁ ity udāhṛitya yajña-dāna-tapaḥ-kriyāḥ pravartante vidhānoktāḥ satataṁ brahma-vādinām
अर्थइसलिए, ब्रह्मवादियों की शास्त्र प्रतिपादित यज्ञ, दान और तप की क्रियायें सदैव ओंकार के उच्चारण के साथ प्रारम्भ होती हैं।।
ਤਦਿਤ੍ਯਨਭਿਸਨ੍ਧਾਯ ਫਲਂ ਯਜ੍ਞਤਪਃਕ੍ਰਿਯਾਃ।ਦਾਨਕ੍ਰਿਯਾਸ਼੍ਚ ਵਿਵਿਧਾਃ ਕ੍ਰਿਯਨ੍ਤੇ ਮੋਕ੍षਕਾਙ੍ਕ੍षਿ॥
tad ity anabhisandhāya phalaṁ yajña-tapaḥ-kriyāḥ dāna-kriyāśh cha vividhāḥ kriyante mokṣha-kāṅkṣhibhiḥ
अर्थ'तत्' शब्द का उच्चारण कर, फल की इच्छा नहीं रखते हुए, मुमुक्षुजन यज्ञ, तप, दान आदि विविध कर्म करते हैं।।
ਸਦ੍ਭਾਵੇ ਸਾਧੁਭਾਵੇ ਚ ਸਦਿਤ੍ਯੇਤਤ੍ਪ੍ਰਯੁਜ੍ਯਤੇ।ਪ੍ਰਸ਼ਸ੍ਤੇ ਕਰ੍ਮਣਿ ਤਥਾ ਸਚ੍ਛਬ੍ਦਃ ਪਾਰ੍ਥ ਯੁਜ੍ਯਤੇ॥
sad-bhāve sādhu-bhāve cha sad ity etat prayujyate praśhaste karmaṇi tathā sach-chhabdaḥ pārtha yujyate
अर्थहे पार्थ ! सत्य भाव व साधुभाव में 'सत्' शब्द का प्रयोग किया जाता है, और प्रशस्त (श्रेष्ठ, शुभ) कर्म में 'सत्' शब्द प्रयुक्त होता है।।
ਯਜ੍ਞੇ ਤਪਸਿ ਦਾਨੇ ਚ ਸ੍ਥਿਤਿਃ ਸਦਿਤਿ ਚੋਚ੍ਯਤੇ।ਕਰ੍ਮ ਚੈਵ ਤਦਰ੍ਥੀਯਂ ਸਦਿਤ੍ਯੇਵਾਭਿਧੀਯਤੇ॥
yajñe tapasi dāne cha sthitiḥ sad iti chochyate karma chaiva tad-arthīyaṁ sad ity evābhidhīyate
अर्थयज्ञ, तप और दान में दृढ़ स्थिति भी सत् कही जाती है, और उस (परमात्मा) के लिए किया गया कर्म भी सत् ही कहलाता है।।
ਅਸ਼੍ਰਦ੍ਧਯਾ ਹੁਤਂ ਦਤ੍ਤਂ ਤਪਸ੍ਤਪ੍ਤਂ ਕृਤਂ ਚ ਯਤ੍।ਅਸਦਿਤ੍ਯੁਚ੍ਯਤੇ ਪਾਰ੍ਥ ਨ ਚ ਤਤ੍ਪ੍ਰੇਤ੍ਯ ਨੋ ਇਹ॥
aśhraddhayā hutaṁ dattaṁ tapas taptaṁ kṛitaṁ cha yat asad ity uchyate pārtha na cha tat pretya no iha
अर्थहे पार्थ ! जो यज्ञ, दान, तप और कर्म अश्रद्धापूर्वक किया जाता है, वह 'असत्' कहा जाता है; वह न इस लोक में (इह) और न मरण के पश्चात् (उस लोक में) लाभदायक होता है।।