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ਭਗਵਦ੍ਗੀਤਾ · ਅਧ੍ਯਾਯ 16 / 18

ਦੈਵਾਸੁਰਸਮ੍ਪਦ੍ਵਿਭਾਗਯੋਗ

Bhagavad Gita Chapter 16 in Punjabi (Gurmukhi)

Daivāsura Sampad Vibhāg Yog · दैवी और आसुरी प्रकृति · 24 श्लोक

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अध्याय सारांश

भगवद गीता का सोलहवा अध्याय दैवासुरसम्पद्विभागयोग है। इस अध्याय में, कृष्ण स्पष्ट रूप से मानवों की दो प्रकार की प्रकृतियों का वर्णन करते हैं- दैवीय और दानवीय। दानवीय स्वभाव वाले लोग स्वयं को लालसा और अज्ञान के तरीकों से जोड़ते हैं, शास्त्रों के नियमों का पालन नहीं करते हैं और भौतिक विचारों को ग्रहण करते हैं। ये लोग निचली जातियों में जन्म लेते हैं और भौतिक बंधनों में और भी बंध जाते हैं। परन्तु जो लोग दैवीय स्वभाव वाले होते हैं, वे शास्त्रों के निर्देशों का पालन करते हैं, अच्छे काम करते हैं और आध्यात्मिक प्रथाओं के माध्यम से मन को शुद्ध करते हैं। इससे दैवीय गुणों में वृद्धि होती है और वे अंततः आध्यात्मिक प्राप्ति प्राप्त करते हैं।

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ਸ਼੍ਰੀ ਭਗਵਾਨੁਵਾਚ ਅਭਯਂ ਸਤ੍ਤ੍ਵਸਂਸ਼ੁਦ੍ਧਿਃ ਜ੍ਞਾਨਯੋਗਵ੍ਯਵਸ੍ਥਿਤਿਃ। ਦਾਨਂ ਦਮਸ਼੍ਚ ਯਜ੍ਞਸ਼੍ਚ ਸ੍ਵਾਧ੍ਯਾਯਸ੍ਤਪ ਆਰ੍ਜਵਮ੍॥

śhrī-bhagavān uvācha abhayaṁ sattva-sanśhuddhir jñāna-yoga-vyavasthitiḥ dānaṁ damaśh cha yajñaśh cha svādhyāyas tapa ārjavam

अर्थश्री भगवान् ने कहा -- अभय, अन्त:करण की शुद्धि, ज्ञानयोग में दृढ़ स्थिति, दान, दम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप और आर्जव।।

ਅਹਿਂਸਾ ਸਤ੍ਯਮਕ੍ਰੋਧਸ੍ਤ੍ਯਾਗਃ ਸ਼ਾਨ੍ਤਿਰਪੈਸ਼ੁਨਮ੍।ਦਯਾ ਭੂਤੇष੍ਵਲੋਲੁਪ੍ਤ੍ਵਂ ਮਾਰ੍ਦਵਂ ਹ੍ਰੀਰਚਾਪਲਮ੍॥

ahinsā satyam akrodhas tyāgaḥ śhāntir apaiśhunam dayā bhūteṣhv aloluptvaṁ mārdavaṁ hrīr achāpalam

अर्थअहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, त्याग, शान्ति, अपैशुनम् (किसी की निन्दा न करना), भूतमात्र के प्रति दया, अलोलुपता , मार्दव (कोमलता), लज्जा, अचंचलता।।

ਤੇਜਃ ਕ੍षਮਾ ਧृਤਿਃ ਸ਼ੌਚਮਦ੍ਰੋਹੋ ਨਾਤਿਮਾਨਿਤਾ। ਭਵਨ੍ਤਿ ਸਮ੍ਪਦਂ ਦੈਵੀਮਭਿਜਾਤਸ੍ਯ ਭਾਰਤ॥

tejaḥ kṣhamā dhṛitiḥ śhaucham adroho nāti-mānitā bhavanti sampadaṁ daivīm abhijātasya bhārata

अर्थहे भारत ! तेज, क्षमा, धैर्य, शौच (शुद्धि), अद्रोह और अतिमान (गर्व) का अभाव ये सब दैवी संपदा को प्राप्त पुरुष के लक्षण हैं।।

ਦਮ੍ਭੋ ਦਰ੍ਪੋऽਭਿਮਾਨਸ਼੍ਚ ਕ੍ਰੋਧਃ ਪਾਰੁष੍ਯਮੇਵ ਚ।ਅਜ੍ਞਾਨਂ ਚਾਭਿਜਾਤਸ੍ਯ ਪਾਰ੍ਥ ਸਮ੍ਪਦਮਾਸੁਰੀਮ੍॥

dambho darpo ’bhimānaśh cha krodhaḥ pāruṣhyam eva cha ajñānaṁ chābhijātasya pārtha sampadam āsurīm

अर्थहे पार्थ ! दम्भ, दर्प, अभिमान, क्रोध, कठोर वाणी (पारुष्य) और अज्ञान यह सब आसुरी सम्पदा है।।

ਦੈਵੀ ਸਮ੍ਪਦ੍ਵਿਮੋਕ੍षਾਯ ਨਿਬਨ੍ਧਾਯਾਸੁਰੀ ਮਤਾ।ਮਾ ਸ਼ੁਚਃ ਸਮ੍ਪਦਂ ਦੈਵੀਮਭਿਜਾਤੋऽਸਿ ਪਾਣ੍ਡਵ॥

daivī sampad vimokṣhāya nibandhāyāsurī matā mā śhuchaḥ sampadaṁ daivīm abhijāto ’si pāṇḍava

अर्थहे पाण्डव ! दैवी सम्पदा मोक्ष के लिए और आसुरी सम्पदा बन्धन के लिए मानी गयी है, तुम शोक मत करो, क्योंकि तुम दैवी सम्पदा को प्राप्त हुए हो।।

ਦ੍ਵੌ ਭੂਤਸਰ੍ਗੌ ਲੋਕੇऽਸ੍ਮਿਨ੍ ਦੈਵ ਆਸੁਰ ਏਵ ਚ।ਦੈਵੋ ਵਿਸ੍ਤਰਸ਼ਃ ਪ੍ਰੋਕ੍ਤ ਆਸੁਰਂ ਪਾਰ੍ਥ ਮੇ ਸ਼੍ਰृਣੁ॥

dvau bhūta-sargau loke ’smin daiva āsura eva cha daivo vistaraśhaḥ prokta āsuraṁ pārtha me śhṛiṇu

अर्थहे पार्थ ! इस लोक में दो प्रकार की भूतिसृष्टि है, दैवी और आसुरी। उनमें देवों का स्वभाव (दैवी सम्पदा) विस्तारपूर्वक कहा गया है; अब असुरों के स्वभाव को विस्तरश: मुझसे सुनो।।

ਪ੍ਰਵृਤ੍ਤਿਂ ਨਿਵृਤ੍ਤਿਂ ਜਨਾ ਵਿਦੁਰਾਸੁਰਾਃ।ਨ ਸ਼ੌਚਂ ਨਾਪਿ ਚਾਚਾਰੋ ਸਤ੍ਯਂ ਤੇषੁ ਵਿਦ੍ਯਤੇ॥

pravṛittiṁ cha nivṛittiṁ cha janā na vidur āsurāḥ na śhauchaṁ nāpi chāchāro na satyaṁ teṣhu vidyate

अर्थआसुरी स्वभाव के लोग न प्रवृत्ति को; जानते हैं और न निवृत्ति को उनमें न शुद्धि होती है, न सदाचार और न सत्य ही होता है।।

ਅਸਤ੍ਯਮਪ੍ਰਤਿष੍ਠਂ ਤੇ ਜਗਦਾਹੁਰਨੀਸ਼੍ਵਰਮ੍।ਅਪਰਸ੍ਪਰਸਮ੍ਭੂਤਂ ਕਿਮਨ੍ਯਤ੍ਕਾਮਹੈਤੁਕਮ੍॥

asatyam apratiṣhṭhaṁ te jagad āhur anīśhvaram aparaspara-sambhūtaṁ kim anyat kāma-haitukam

अर्थवे कहते हैं कि यह जगत् आश्रयरहित, असत्य और ईश्वर रहित है, यह (स्त्रीपुरुष के) परस्पर कामुक संबंध से ही उत्पन्न हुआ है, और (इसका कारण) क्या हो सकता है?

ਏਤਾਂ ਦृष੍ਟਿਮਵष੍ਟਭ੍ਯ ਨष੍ਟਾਤ੍ਮਾਨੋऽਲ੍ਪਬੁਦ੍ਧਯਃ।ਪ੍ਰਭਵਨ੍ਤ੍ਯੁਗ੍ਰਕਰ੍ਮਾਣਃ ਕ੍षਯਾਯ ਜਗਤੋऽਹਿਤਾਃ॥

etāṁ dṛiṣhṭim avaṣhṭabhya naṣhṭātmāno ’lpa-buddhayaḥ prabhavanty ugra-karmāṇaḥ kṣhayāya jagato ’hitāḥ

अर्थइस दृष्टि का अवलम्बन करके नष्टस्वभाव के अल्प बुद्धि वाले, घोर कर्म करने वाले लोग जगत् के शत्रु (अहित चाहने वाले) के रूप में उसका नाश करने के लिए उत्पन्न होते हैं।।

ਕਾਮਮਾਸ਼੍ਰਿਤ੍ਯ ਦੁष੍ਪੂਰਂ ਦਮ੍ਭਮਾਨਮਦਾਨ੍ਵਿਤਾਃ।ਮੋਹਾਦ੍ਗृਹੀਤ੍ਵਾਸਦ੍ਗ੍ਰਾਹਾਨ੍ਪ੍ਰਵਰ੍ਤਨ੍ਤੇऽਸ਼ੁਚਿਵ੍ਰਤਾਃ॥

kāmam āśhritya duṣhpūraṁ dambha-māna-madānvitāḥ mohād gṛihītvāsad-grāhān pravartante ’śhuchi-vratāḥ

अर्थदम्भ, मान और मद से युक्त कभी न पूर्ण होने वाली कामनाओं का आश्रय लिये, मोहवश मिथ्या धारणाओं को ग्रहण करके ये अशुद्ध संकल्पों के लोग जगत् में कार्य करते हैं।।

ਚਿਨ੍ਤਾਮਪਰਿਮੇਯਾਂ ਪ੍ਰਲਯਾਨ੍ਤਾਮੁਪਾਸ਼੍ਰਿਤਾਃ।ਕਾਮੋਪਭੋਗਪਰਮਾ ਏਤਾਵਦਿਤਿ ਨਿਸ਼੍ਿਚਤਾਃ॥

chintām aparimeyāṁ cha pralayāntām upāśhritāḥ kāmopabhoga-paramā etāvad iti niśhchitāḥ

अर्थमरणपर्यन्त रहने वाली अपरिमित चिन्ताओं से ग्रस्त और विषयोपभोग को ही परम लक्ष्य मानने वाले ये आसुरी लोग इस निश्चित मत के होते हैं कि "इतना ही (सत्य, आनन्द) है"।।

ਆਸ਼ਾਪਾਸ਼ਸ਼ਤੈਰ੍ਬਦ੍ਧਾਃ ਕਾਮਕ੍ਰੋਧਪਰਾਯਣਾਃ।ਈਹਨ੍ਤੇ ਕਾਮਭੋਗਾਰ੍ਥਮਨ੍ਯਾਯੇਨਾਰ੍ਥਸਞ੍ਚਯਾਨ੍॥

āśhā-pāśha-śhatair baddhāḥ kāma-krodha-parāyaṇāḥ īhante kāma-bhogārtham anyāyenārtha-sañchayān

अर्थसैकड़ों आशापाशों से बन्धे हुये, काम और क्रोध के वश में ये लोग विषयभोगों की पूर्ति के लिये अन्यायपूर्वक धन का संग्रह करने के लिये चेष्टा करते हैं।।

ਇਦਮਦ੍ਯ ਮਯਾ ਲਬ੍ਧਮਿਮਂ ਪ੍ਰਾਪ੍ਸ੍ਯੇ ਮਨੋਰਥਮ੍।ਇਦਮਸ੍ਤੀਦਮਪਿ ਮੇ ਭਵਿष੍ਯਤਿ ਪੁਨਰ੍ਧਨਮ੍॥

idam adya mayā labdham imaṁ prāpsye manoratham idam astīdam api me bhaviṣhyati punar dhanam

अर्थमैंने आज यह पाया है और इस मनोरथ को भी प्राप्त करूंगा, मेरे पास यह इतना धन है और इससे भी अधिक धन भविष्य में होगा।।

ਅਸੌ ਮਯਾ ਹਤਃ ਸ਼ਤ੍ਰੁਰ੍ਹਨਿष੍ਯੇ ਚਾਪਰਾਨਪਿ।ਈਸ਼੍ਵਰੋऽਹਮਹਂ ਭੋਗੀ ਸਿਦ੍ਧੋऽਹਂ ਬਲਵਾਨ੍ਸੁਖੀ॥

asau mayā hataḥ śhatrur haniṣhye chāparān api īśhvaro ’ham ahaṁ bhogī siddho ’haṁ balavān sukhī

अर्थ"यह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया है और दूसरे शत्रुओं को भी मैं मारूंगा", "मैं ईश्वर हूँ और भोगी हूँ", "मैं सिद्ध पुरुष हूँ", "मैं बलवान और सुखी हूँ",।।

ਆਢ੍ਯੋऽਭਿਜਨਵਾਨਸ੍ਮਿ ਕੋऽਨ੍ਯੋऽਸ੍ਤਿ ਸਦृਸ਼ੋ ਮਯਾ।ਯਕ੍ष੍ਯੇ ਦਾਸ੍ਯਾਮਿ ਮੋਦਿष੍ਯ ਇਤ੍ਯਜ੍ਞਾਨਵਿਮੋਹਿਤਾਃ॥

āḍhyo ’bhijanavān asmi ko ’nyo ’sti sadṛiśho mayā yakṣhye dāsyāmi modiṣhya ity ajñāna-vimohitāḥ aneka-chitta-vibhrāntā moha-jāla-samāvṛitāḥ prasaktāḥ kāma-bhogeṣhu patanti narake ’śhuchau

अर्थ"मैं धनवान् और श्रेष्ठकुल में जन्मा हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है?",'मैं यज्ञ करूंगा', 'मैं दान दूँगा', 'मैं मौज करूँगा' - इस प्रकार के अज्ञान से वे मोहित होते हैं।।

ਅਨੇਕਚਿਤ੍ਤਵਿਭ੍ਰਾਨ੍ਤਾ ਮੋਹਜਾਲਸਮਾਵृਤਾਃ।ਪ੍ਰਸਕ੍ਤਾਃ ਕਾਮਭੋਗੇषੁ ਪਤਨ੍ਤਿ ਨਰਕੇऽਸ਼ੁਚੌ॥

aneka-citta-vibhrāntā moha-jāla-samāvṛtāḥ prasaktāḥ kāma-bhogeṣu patanti narake 'śucau

अर्थअनेक प्रकार से भ्रमित चित्त वाले, मोह जाल में फँसे तथा विषयभोगों में आसक्त ये लोग घोर, अपवित्र नरक में गिरते हैं।।

ਆਤ੍ਮਸਮ੍ਭਾਵਿਤਾਃ ਸ੍ਤਬ੍ਧਾ ਧਨਮਾਨਮਦਾਨ੍ਵਿਤਾਃ।ਯਜਨ੍ਤੇ ਨਾਮਯਜ੍ਞੈਸ੍ਤੇ ਦਮ੍ਭੇਨਾਵਿਧਿਪੂਰ੍ਵਕਮ੍॥

ātma-sambhāvitāḥ stabdhā dhana-māna-madānvitāḥ yajante nāma-yajñais te dambhenāvidhi-pūrvakam

अर्थअपने आप को ही श्रेष्ठ मानने वाले, स्तब्ध (गर्वयुक्त), धन और मान के मद से युक्त लोग शास्त्रविधि से रहित केवल नाममात्र के यज्ञों द्वारा दम्भपूर्वक यजन करते हैं।।

ਅਹਙ੍ਕਾਰਂ ਬਲਂ ਦਰ੍ਪਂ ਕਾਮਂ ਕ੍ਰੋਧਂ ਸਂਸ਼੍ਰਿਤਾਃ।ਮਾਮਾਤ੍ਮਪਰਦੇਹੇषੁ ਪ੍ਰਦ੍ਵਿषਨ੍ਤੋऽਭ੍ਯਸੂਯਕਾਃ॥

ahankāraṁ balaṁ darpaṁ kāmaṁ krodhaṁ cha sanśhritāḥ mām ātma-para-deheṣhu pradviṣhanto ’bhyasūyakāḥ

अर्थअहंकार, बल, दर्प, काम और क्रोध के वशीभूत हुए परनिन्दा करने वाले ये लोग अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझ (परमात्मा) से द्वेष करने वाले होते हैं।।

ਤਾਨਹਂ ਦ੍ਵਿषਤਃ ਕ੍ਰੂਰਾਨ੍ਸਂਸਾਰੇषੁ ਨਰਾਧਮਾਨ੍।ਕ੍षਿਪਾਮ੍ਯਜਸ੍ਰਮਸ਼ੁਭਾਨਾਸੁਰੀष੍ਵੇਵ ਯੋਨਿषੁ॥

tān ahaṁ dviṣhataḥ krūrān sansāreṣhu narādhamān kṣhipāmy ajasram aśhubhān āsurīṣhv eva yoniṣhu

अर्थऐसे उन द्वेष करने वाले, क्रूरकर्मी और नराधमों को मैं संसार में बारम्बार (अजस्रम्) आसुरी योनियों में ही गिराता हूँ अर्थात् उत्पन्न करता हूँ।।

ਅਸੁਰੀਂ ਯੋਨਿਮਾਪਨ੍ਨਾ ਮੂਢਾ ਜਨ੍ਮਨਿ ਜਨ੍ਮਨਿ।ਮਾਮਪ੍ਰਾਪ੍ਯੈਵ ਕੌਨ੍ਤੇਯ ਤਤੋ ਯਾਨ੍ਤ੍ਯਧਮਾਂ ਗਤਿਮ੍॥

āsurīṁ yonim āpannā mūḍhā janmani janmani mām aprāpyaiva kaunteya tato yānty adhamāṁ gatim

अर्थहे कौन्तेय ! वे मूढ़ पुरुष जन्मजन्मान्तर में आसुरी योनि को प्राप्त होते हैं और ( इस प्रकार) मुझे प्राप्त न होकर अधम गति को प्राप्त होते है।।

ਤ੍ਰਿਵਿਧਂ ਨਰਕਸ੍ਯੇਦਂ ਦ੍ਵਾਰਂ ਨਾਸ਼ਨਮਾਤ੍ਮਨਃ।ਕਾਮਃ ਕ੍ਰੋਧਸ੍ਤਥਾ ਲੋਭਸ੍ਤਸ੍ਮਾਦੇਤਤ੍ਤ੍ਰਯਂ ਤ੍ਯਜੇਤ੍॥

tri-vidhaṁ narakasyedaṁ dvāraṁ nāśhanam ātmanaḥ kāmaḥ krodhas tathā lobhas tasmād etat trayaṁ tyajet

अर्थकाम, क्रोध और लोभ ये आत्मनाश के त्रिविध द्वार हैं, इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।।

ਏਤੈਰ੍ਵਿਮੁਕ੍ਤਃ ਕੌਨ੍ਤੇਯ ਤਮੋਦ੍ਵਾਰੈਸ੍ਤ੍ਰਿਭਿਰ੍ਨਰਃ।ਆਚਰਤ੍ਯਾਤ੍ਮਨਃ ਸ਼੍ਰੇਯਸ੍ਤਤੋ ਯਾਤਿ ਪਰਾਂ ਗਤਿਮ੍॥

etair vimuktaḥ kaunteya tamo-dvārais tribhir naraḥ ācharaty ātmanaḥ śhreyas tato yāti parāṁ gatim

अर्थहे कौन्तेय ! नरक के इन तीनों द्वारों से विमुक्त पुरुष अपने कल्याण के साधन का आचरण करता है और इस प्रकार परा गति को प्राप्त होता है।।

ਯਃ ਸ਼ਾਸ੍ਤ੍ਰਵਿਧਿਮੁਤ੍ਸृਜ੍ਯ ਵਰ੍ਤਤੇ ਕਾਮਕਾਰਤਃ।ਨ ਸਿਦ੍ਧਿਮਵਾਪ੍ਨੋਤਿ ਸੁਖਂ ਪਰਾਂ ਗਤਿਮ੍॥

yaḥ śhāstra-vidhim utsṛijya vartate kāma-kārataḥ na sa siddhim avāpnoti na sukhaṁ na parāṁ gatim

अर्थजो पुरुष शास्त्रविधि को त्यागकर अपनी कामना से प्रेरित होकर ही कार्य करता है, वह न पूर्णत्व की सिद्धि प्राप्त करता है, न सुख और न परा गति।।

ਤਸ੍ਮਾਚ੍ਛਾਸ੍ਤ੍ਰਂ ਪ੍ਰਮਾਣਂ ਤੇ ਕਾਰ੍ਯਾਕਾਰ੍ਯਵ੍ਯਵਸ੍ਥਿਤੌ।ਜ੍ਞਾਤ੍ਵਾ ਸ਼ਾਸ੍ਤ੍ਰਵਿਧਾਨੋਕ੍ਤਂ ਕਰ੍ਮ ਕਰ੍ਤੁਮਿਹਾਰ੍ਹਸਿ॥

tasmāch chhāstraṁ pramāṇaṁ te kāryākārya-vyavasthitau jñātvā śhāstra-vidhānoktaṁ karma kartum ihārhasi

अर्थइसलिए तुम्हारे लिए कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था (निर्णय) में शास्त्र ही प्रमाण है शास्त्रोक्त विधान को जानकर तुम्हें अपने कर्म करने चाहिए।।