ਪੁਰੁषੋਤ੍ਤਮਯੋਗ
Bhagavad Gita Chapter 15 in Punjabi (Gurmukhi)
Puruṣhottam Yog · पुरुषोत्तम · 20 श्लोक
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अध्याय सारांश
भगवद गीता का पंद्रहवा अध्याय पुरुषोत्तमयोग है। संस्कृत में, पुरूष का मतलब सर्वव्यापी भगवान है, और पुरुषोत्तम का मतलब है ईश्वर का कालातीत और पारस्परिक पहलू। कृष्णा बताते हैं कि ईश्वर के इस महान ज्ञान का उद्देश्य भौतिक संसार के बंधन से खुद को अलग करना है और कृष्ण को सर्वोच्च दिव्य व्यक्तित्व के रूप में समझना है, जो विश्व के शाश्वत नियंत्रक और निर्वाहक हैं। जो इस परम सत्य को समझता है वह प्रभु को समर्पण करता है और उनकी भक्ति सेवा में संलग्न हो जाता है।
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ਸ਼੍ਰੀ ਭਗਵਾਨੁਵਾਚਊਰ੍ਧ੍ਵਮੂਲਮਧਃਸ਼ਾਖਮਸ਼੍ਵਤ੍ਥਂ ਪ੍ਰਾਹੁਰਵ੍ਯਯਮ੍।ਛਨ੍ਦਾਂਸਿ ਯਸ੍ਯ ਪਰ੍ਣਾਨਿ ਯਸ੍ਤਂ ਵੇਦ ਸ ਵੇਦਵਿਤ੍॥
śhrī-bhagavān uvācha ūrdhva-mūlam adhaḥ-śhākham aśhvatthaṁ prāhur avyayam chhandānsi yasya parṇāni yas taṁ veda sa veda-vit
अर्थश्री भगवान् ने कहा -- (ज्ञानी पुरुष इस संसार वृक्ष को) ऊर्ध्वमूल और अध:शाखा वाला अश्वत्थ और अव्यय कहते हैं; जिसके पर्ण छन्द अर्थात् वेद हैं, ऐसे (संसार वृक्ष) को जो जानता है, वह वेदवित् है।।
ਅਧਸ਼੍ਚੋਰ੍ਧ੍ਵਂ ਪ੍ਰਸृਤਾਸ੍ਤਸ੍ਯ ਸ਼ਾਖਾ ਗੁਣਪ੍ਰਵृਦ੍ਧਾ ਵਿषਯਪ੍ਰਵਾਲਾਃ।ਅਧਸ਼੍ਚ ਮੂਲਾਨ੍ਯਨੁਸਨ੍ਤਤਾਨਿ ਕਰ੍ਮਾਨੁਬਨ੍ਧੀਨਿ ਮਨੁष੍ਯਲੋਕੇ॥
adhaśh chordhvaṁ prasṛitās tasya śhākhā guṇa-pravṛiddhā viṣhaya-pravālāḥ adhaśh cha mūlāny anusantatāni karmānubandhīni manuṣhya-loke
अर्थउस वृक्ष की शाखाएं गुणों से प्रवृद्ध हुईं नीचे और ऊपर फैली हुईं हैं; (पंच) विषय इसके अंकुर हैं; मनुष्य लोक में कर्मों का अनुसरण करने वाली इसकी अन्य जड़ें नीचे फैली हुईं हैं।।
ਨ ਰੂਪਮਸ੍ਯੇਹ ਤਥੋਪਲਭ੍ਯਤੇ ਨਾਨ੍ਤੋ ਨ ਚਾਦਿਰ੍ਨ ਚ ਸਂਪ੍ਰਤਿष੍ਠਾ।ਅਸ਼੍ਵਤ੍ਥਮੇਨਂ ਸੁਵਿਰੂਢਮੂਲ ਮਸਙ੍ਗਸ਼ਸ੍ਤ੍ਰੇਣ ਦृਢੇਨ ਛਿਤ੍ਤ੍ਵਾ॥
na rūpam asyeha tathopalabhyate nānto na chādir na cha sampratiṣhṭhā aśhvattham enaṁ su-virūḍha-mūlam asaṅga-śhastreṇa dṛiḍhena chhittvā
अर्थइस (संसार वृक्ष) का स्वरूप जैसा कहा गया है वैसा यहाँ उपलब्ध नहीं होता है, क्योंकि इसका न आदि है और न अंत और न प्रतिष्ठा ही है। इस अति दृढ़ मूल वाले अश्वत्थ वृक्ष को दृढ़ असङ्ग शस्त्र से काटकर ...৷৷৷৷।।
ਤਤਃ ਪਦਂ ਤਤ੍ਪਰਿਮਾਰ੍ਗਿਤਵ੍ਯ ਯਸ੍ਮਿਨ੍ਗਤਾ ਨ ਨਿਵਰ੍ਤਨ੍ਤਿ ਭੂਯਃ।ਤਮੇਵ ਚਾਦ੍ਯਂ ਪੁਰੁषਂ ਪ੍ਰਪਦ੍ਯੇ ਯਤਃ ਪ੍ਰਵृਤ੍ਤਿਃ ਪ੍ਰਸृਤਾ ਪੁਰਾਣੀ॥
tataḥ padaṁ tat parimārgitavyaṁ yasmin gatā na nivartanti bhūyaḥ tam eva chādyaṁ puruṣhaṁ prapadye yataḥ pravṛittiḥ prasṛitā purāṇī
अर्थ(तदुपरान्त) उस पद का अन्वेषण करना चाहिए जिसको प्राप्त हुए पुरुष पुन: संसार में नहीं लौटते हैं। "मैं उस आदि पुरुष की शरण हूँ, जिससे यह पुरातन प्रवृत्ति प्रसृत हुई है"।।
ਨਿਰ੍ਮਾਨਮੋਹਾ ਜਿਤਸਙ੍ਗਦੋषਾ ਅਧ੍ਯਾਤ੍ਮਨਿਤ੍ਯਾ ਵਿਨਿਵृਤ੍ਤਕਾਮਾਃ।ਦ੍ਵਨ੍ਦ੍ਵੈਰ੍ਵਿਮੁਕ੍ਤਾਃ ਸੁਖਦੁਃਖਸਂਜ੍ਞੈ ਰ੍ਗਚ੍ਛਨ੍ਤ੍ਯਮੂਢਾਃ ਪਦਮਵ੍ਯਯਂ ਤਤ੍॥
nirmāna-mohā jita-saṅga-doṣhā adhyātma-nityā vinivṛitta-kāmāḥ dvandvair vimuktāḥ sukha-duḥkha-sanjñair gachchhanty amūḍhāḥ padam avyayaṁ tat
अर्थजिनका मान और मोह निवृत्त हो गया है, जिन्होंने संगदोष को जीत लिया है, जो अध्यात्म में स्थित हैं जिनकी कामनाएं निवृत्त हो चुकी हैं और जो सुख-दु:ख नामक द्वन्द्वों से विमुक्त हो गये हैं, ऐसे सम्मोह रहित ज्ञानीजन उस अव्यय पद को प्राप्त होते हैं।।
ਨ ਤਦ੍ਭਾਸਯਤੇ ਸੂਰ੍ਯੋ ਨ ਸ਼ਸ਼ਾਙ੍ਕੋ ਨ ਪਾਵਕਃ।ਯਦ੍ਗਤ੍ਵਾ ਨ ਨਿਵਰ੍ਤਨ੍ਤੇ ਤਦ੍ਧਾਮ ਪਰਮਂ ਮਮ॥
na tad bhāsayate sūryo na śhaśhāṅko na pāvakaḥ yad gatvā na nivartante tad dhāma paramaṁ mama
अर्थउसे न सूर्य प्रकाशित कर सकता है और न चन्द्रमा और न अग्नि। जिसे प्राप्त कर मनुष्य पुन: (संसार को) नहीं लौटते हैं, वह मेरा परम धाम है।।
ਮਮੈਵਾਂਸ਼ੋ ਜੀਵਲੋਕੇ ਜੀਵਭੂਤਃ ਸਨਾਤਨਃ।ਮਨਃषष੍ਠਾਨੀਨ੍ਦ੍ਰਿਯਾਣਿ ਪ੍ਰਕृਤਿਸ੍ਥਾਨਿ ਕਰ੍षਤਿ॥
mamaivānśho jīva-loke jīva-bhūtaḥ sanātanaḥ manaḥ-ṣhaṣhṭhānīndriyāṇi prakṛiti-sthāni karṣhati
अर्थइस जीव लोक में मेरा ही एक सनातन अंश जीव बना है। वह प्रकृति में स्थित हुआ (देहत्याग के समय) पाँचो इन्द्रियों तथा मन को अपनी ओर खींच लेता है अर्थात् उन्हें एकत्रित कर लेता है।।
ਸ਼ਰੀਰਂ ਯਦਵਾਪ੍ਨੋਤਿ ਯਚ੍ਚਾਪ੍ਯੁਤ੍ਕ੍ਰਾਮਤੀਸ਼੍ਵਰਃ।ਗृਹੀਤ੍ਵੈਤਾਨਿ ਸਂਯਾਤਿ ਵਾਯੁਰ੍ਗਨ੍ਧਾਨਿਵਾਸ਼ਯਾਤ੍॥
śharīraṁ yad avāpnoti yach chāpy utkrāmatīśhvaraḥ gṛihītvaitāni sanyāti vāyur gandhān ivāśhayāt
अर्थजब (देहादि का) ईश्वर (जीव) (एक शरीर से) उत्क्रमण करता है, तब इन (इन्द्रियों और मन) को ग्रहण कर अन्य शरीर में इस प्रकार ले जाता है, जैसे गन्ध के आश्रय (फूलादि) से गन्ध को वायु ले जाता है।।
ਸ਼੍ਰੋਤ੍ਰਂ ਚਕ੍षੁਃ ਸ੍ਪਰ੍ਸ਼ਨਂ ਚ ਰਸਨਂ ਘ੍ਰਾਣਮੇਵ ਚ।ਅਧਿष੍ਠਾਯ ਮਨਸ਼੍ਚਾਯਂ ਵਿषਯਾਨੁਪਸੇਵਤੇ॥
śhrotraṁ chakṣhuḥ sparśhanaṁ cha rasanaṁ ghrāṇam eva cha adhiṣhṭhāya manaśh chāyaṁ viṣhayān upasevate
अर्थ(यह जीव) श्रोत्र, चक्षु, स्पर्शेन्द्रिय, रसना और घ्राण (नाक) इन इन्द्रियों तथा मन को आश्रय करके अर्थात् इनके द्वारा विषयों का सेवन करता है।।
ਉਤ੍ਕ੍ਰਾਮਨ੍ਤਂ ਸ੍ਥਿਤਂ ਵਾਪਿ ਭੁਞ੍ਜਾਨਂ ਵਾ ਗੁਣਾਨ੍ਵਿਤਮ੍।ਵਿਮੂਢਾ ਨਾਨੁਪਸ਼੍ਯਨ੍ਤਿ ਪਸ਼੍ਯਨ੍ਤਿ ਜ੍ਞਾਨਚਕ੍षੁषਃ॥
utkrāmantaṁ sthitaṁ vāpi bhuñjānaṁ vā guṇānvitam vimūḍhā nānupaśhyanti paśhyanti jñāna-chakṣhuṣhaḥ
अर्थशरीर को त्यागते हुये, उसमें स्थित हुये अथवा (विषयों को) भोगते हुये, गुणों से समन्वित आत्मा को विमूढ़ लोग नहीं देखते हैं; (परन्तु) ज्ञानचक्षु वाले पुरुष उसे देखते हैं।।
ਯਤਨ੍ਤੋ ਯੋਗਿਨਸ਼੍ਚੈਨਂ ਪਸ਼੍ਯਨ੍ਤ੍ਯਾਤ੍ਮਨ੍ਯਵਸ੍ਥਿਤਮ੍।ਯਤਨ੍ਤੋऽਪ੍ਯਕृਤਾਤ੍ਮਾਨੋ ਨੈਨਂ ਪਸ਼੍ਯਨ੍ਤ੍ਯਚੇਤਸਃ॥
yatanto yoginaśh chainaṁ paśhyanty ātmany avasthitam yatanto ‘py akṛitātmāno nainaṁ paśhyanty achetasaḥ
अर्थयोगीजन प्रयत्न करते हुये ही अपने हृदय में स्थित आत्मा को देखते हैं, जब कि अशुद्ध अन्त:करण वाले (अकृतात्मान:) और अविवेकी (अचेतस:) लोग यत्न करते हुये भी इसे नहीं देखते हैं।।
ਯਦਾਦਿਤ੍ਯਗਤਂ ਤੇਜੋ ਜਗਦ੍ਭਾਸਯਤੇऽਖਿਲਮ੍।ਯਚ੍ਚਨ੍ਦ੍ਰਮਸਿ ਯਚ੍ਚਾਗ੍ਨੌ ਤਤ੍ਤੇਜੋ ਵਿਦ੍ਧਿ ਮਾਮਕਮ੍॥
yad āditya-gataṁ tejo jagad bhāsayate ’khilam yach chandramasi yach chāgnau tat tejo viddhi māmakam
अर्थजो तेज सूर्य में स्थित होकर सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चन्द्रमा में है और अग्नि में है, उस तेज को तुम मेरा ही जानो।।
ਗਾਮਾਵਿਸ਼੍ਯ ਚ ਭੂਤਾਨਿ ਧਾਰਯਾਮ੍ਯਹਮੋਜਸਾ।ਪੁष੍ਣਾਮਿ ਚੌषਧੀਃ ਸਰ੍ਵਾਃ ਸੋਮੋ ਭੂਤ੍ਵਾ ਰਸਾਤ੍ਮਕਃ॥
gām āviśhya cha bhūtāni dhārayāmy aham ojasā puṣhṇāmi chauṣhadhīḥ sarvāḥ somo bhūtvā rasātmakaḥ
अर्थमैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपने ओज से भूतमात्र को धारण करता हूँ और रसस्वरूप चन्द्रमा बनकर समस्त औषधियों का अर्थात् वनस्पतियों का पोषण करता हूँ।।
ਅਹਂ ਵੈਸ਼੍ਵਾਨਰੋ ਭੂਤ੍ਵਾ ਪ੍ਰਾਣਿਨਾਂ ਦੇਹਮਾਸ਼੍ਰਿਤਃ।ਪ੍ਰਾਣਾਪਾਨਸਮਾਯੁਕ੍ਤਃ ਪਚਾਮ੍ਯਨ੍ਨਂ ਚਤੁਰ੍ਵਿਧਮ੍॥
ahaṁ vaiśhvānaro bhūtvā prāṇināṁ deham āśhritaḥ prāṇāpāna-samāyuktaḥ pachāmy annaṁ chatur-vidham
अर्थमैं ही समस्त प्राणियों के देह में स्थित वैश्वानर अग्निरूप होकर प्राण और अपान से युक्त चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ।।
ਸਰ੍ਵਸ੍ਯ ਚਾਹਂ ਹृਦਿ ਸਨ੍ਨਿਵਿष੍ਟੋ ਮਤ੍ਤਃ ਸ੍ਮृਤਿਰ੍ਜ੍ਞਾਨਮਪੋਹਨਂ ਚ।ਵੇਦੈਸ਼੍ਚ ਸਰ੍ਵੈਰਹਮੇਵ ਵੇਦ੍ਯੋ ਵੇਦਾਨ੍ਤਕृਦ੍ਵੇਦਵਿਦੇਵ ਚਾਹਮ੍॥
sarvasya chāhaṁ hṛidi sanniviṣhṭo mattaḥ smṛitir jñānam apohanaṁ cha vedaiśh cha sarvair aham eva vedyo vedānta-kṛid veda-vid eva chāham
अर्थमैं ही समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ। मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (उनका अभाव) होता है। समस्त वेदों के द्वारा मैं ही वेद्य (जानने योग्य) वस्तु हूँ तथा वेदान्त का और वेदों का ज्ञाता भी मैं ही हूँ।।
ਦ੍ਵਾਵਿਮੌ ਪੁਰੁषੌ ਲੋਕੇ ਕ੍षਰਸ਼੍ਚਾਕ੍षਰ ਏਵ ਚ।ਕ੍षਰਃ ਸਰ੍ਵਾਣਿ ਭੂਤਾਨਿ ਕੂਟਸ੍ਥੋऽਕ੍षਰ ਉਚ੍ਯਤੇ॥
dvāv imau puruṣhau loke kṣharaśh chākṣhara eva cha kṣharaḥ sarvāṇi bhūtāni kūṭa-stho ’kṣhara uchyate
अर्थइस लोक में क्षर (नश्वर) और अक्षर (अनश्वर) ये दो पुरुष हैं, समस्त भूत क्षर हैं और 'कूटस्थ' अक्षर कहलाता है।।
ਉਤ੍ਤਮਃ ਪੁਰੁषਸ੍ਤ੍ਵਨ੍ਯਃ ਪਰਮਾਤ੍ਮੇਤ੍ਯੁਦਾਹृਤਃ।ਯੋ ਲੋਕਤ੍ਰਯਮਾਵਿਸ਼੍ਯ ਬਿਭਰ੍ਤ੍ਯਵ੍ਯਯ ਈਸ਼੍ਵਰਃ॥
uttamaḥ puruṣhas tv anyaḥ paramātmety udāhṛitaḥ yo loka-trayam āviśhya bibharty avyaya īśhvaraḥ
अर्थपरन्तु उत्तम पुरुष अन्य ही है, जो परमात्मा कहलाता है और जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण करने वाला अव्यय ईश्वर है।।
ਯਸ੍ਮਾਤ੍ਕ੍षਰਮਤੀਤੋऽਹਮਕ੍षਰਾਦਪਿ ਚੋਤ੍ਤਮਃ।ਅਤੋऽਸ੍ਮਿ ਲੋਕੇ ਵੇਦੇ ਚ ਪ੍ਰਥਿਤਃ ਪੁਰੁषੋਤ੍ਤਮਃ॥
yasmāt kṣharam atīto ’ham akṣharād api chottamaḥ ato ’smi loke vede cha prathitaḥ puruṣhottamaḥ
अर्थक्योंकि मैं क्षर से अतीत हूँ और अक्षर से भी उत्तम हूँ, इसलिये लोक में और वेद में भी पुरुषोत्तम के नाम से प्रसिद्ध हूँ।।
ਯੋ ਮਾਮੇਵਮਸਮ੍ਮੂਢੋ ਜਾਨਾਤਿ ਪੁਰੁषੋਤ੍ਤਮਮ੍।ਸ ਸਰ੍ਵਵਿਦ੍ਭਜਤਿ ਮਾਂ ਸਰ੍ਵਭਾਵੇਨ ਭਾਰਤ॥
yo mām evam asammūḍho jānāti puruṣhottamam sa sarva-vid bhajati māṁ sarva-bhāvena bhārata
अर्थहे भारत ! इस प्रकार, जो, संमोहरहित, पुरुष मुझ पुरुषोत्तम को जानता है, वह सर्वज्ञ होकर सम्पूर्ण भाव से अर्थात् पूर्ण हृदय से मेरी भक्ति करता है।।
ਇਤਿ ਗੁਹ੍ਯਤਮਂ ਸ਼ਾਸ੍ਤ੍ਰਮਿਦਮੁਕ੍ਤਂ ਮਯਾऽਨਘ।ਏਤਦ੍ਬੁਦ੍ਧ੍ਵਾ ਬੁਦ੍ਧਿਮਾਨ੍ਸ੍ਯਾਤ੍ਕृਤਕृਤ੍ਯਸ਼੍ਚ ਭਾਰਤ॥
iti guhyatamaṁ śhāstram idam uktaṁ mayānagha etad buddhvā buddhimān syāt kṛita-kṛityaśh cha bhārata
अर्थहे निष्पाप भारत ! इस प्रकार यह गुह्यतम शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया, इसको जानकर मनुष्य बुद्धिमान और कृतकृत्य हो जाता है।।