ਅਕ੍षਰਬ੍ਰਹ੍ਮਯੋਗ
Bhagavad Gita Chapter 8 in Punjabi (Gurmukhi)
Akṣhar Brahma Yog · अक्षर ब्रह्म · 28 श्लोक
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अध्याय सारांश
भगवद गीता का आठवां अध्याय अक्षरब्रह्मयोग है। इस अध्याय में, कृष्ण मृत्यु से पहले अंतिम विचार का महत्व बताते हैं। अगर हम मृत्यु के समय कृष्ण को याद कर लें तो हम निश्चित रूप से उन्हें प्राप्त करेंगे। इसलिए हर समय प्रभु के बारे में जागरूकता रखना, उनके बारे में सोचना और हर समय उनके नामों का जप करना बहुत महत्वपूर्ण है। अपने मन को पूरी तरह से कृष्ण की निरंतर भक्ति में समाहित करके हम इस भौतिक संसार से परे भगवान के सर्वोच्च निवास तक जा सकते हैं।
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ਅਰ੍ਜੁਨ ਉਵਾਚ ਕਿਂ ਤਦ੍ਬ੍ਰਹ੍ਮ ਕਿਮਧ੍ਯਾਤ੍ਮਂ ਕਿਂ ਕਰ੍ਮ ਪੁਰੁषੋਤ੍ਤਮ। ਅਧਿਭੂਤਂ ਚ ਕਿਂ ਪ੍ਰੋਕ੍ਤਮਧਿਦੈਵਂ ਕਿਮੁਚ੍ਯਤੇ॥
arjuna uvācha kiṁ tad brahma kim adhyātmaṁ kiṁ karma puruṣhottama adhibhūtaṁ cha kiṁ proktam adhidaivaṁ kim uchyate
अर्थअर्जुन ने कहा -हे पुरुषोत्तम ! वह ब्रह्म क्या है अध्यात्म क्या है? तथा कर्म क्या है? और अधिभूत नाम से क्या कहा गया है? तथा अधिदैव नाम से क्या कहा जाता है,
ਅਧਿਯਜ੍ਞਃ ਕਥਂ ਕੋऽਤ੍ਰ ਦੇਹੇऽਸ੍ਮਿਨ੍ਮਧੁਸੂਦਨ। ਪ੍ਰਯਾਣਕਾਲੇ ਚ ਕਥਂ ਜ੍ਞੇਯੋऽਸਿ ਨਿਯਤਾਤ੍ਮਭਿਃ॥
adhiyajñaḥ kathaṁ ko ’tra dehe ’smin madhusūdana prayāṇa-kāle cha kathaṁ jñeyo ’si niyatātmabhiḥ
अर्थऔर हे मधुसूदन ! यहाँ अधियज्ञ कौन है? और वह इस शरीर में कैसे है? और संयत चित्त वाले पुरुषों द्वारा अन्त समय में आप किस प्रकार जाने जाते हैं,
ਸ਼੍ਰੀ ਭਗਵਾਨੁਵਾਚ ਅਕ੍षਰਂ ਬ੍ਰਹ੍ਮ ਪਰਮਂ ਸ੍ਵਭਾਵੋऽਧ੍ਯਾਤ੍ਮਮੁਚ੍ਯਤੇ। ਭੂਤਭਾਵੋਦ੍ਭਵਕਰੋ ਵਿਸਰ੍ਗਃ ਕਰ੍ਮਸਂਜ੍ਞਿਤਃ॥
śhrī bhagavān uvācha akṣharaṁ brahma paramaṁ svabhāvo ’dhyātmam uchyate bhūta-bhāvodbhava-karo visargaḥ karma-sanjñitaḥ
अर्थश्रीभगवान् ने कहा -- परम अक्षर (अविनाशी) तत्त्व ब्रह्म है; स्वभाव (अपना स्वरूप) अध्यात्म कहा जाता है; भूतों के भावों को उत्पन्न करने वाला विसर्ग (यज्ञ, प्रेरक बल) कर्म नाम से जाना जाता है।।
ਅਧਿਭੂਤਂ ਕ੍षਰੋ ਭਾਵਃ ਪੁਰੁषਸ਼੍ਚਾਧਿਦੈਵਤਮ੍। ਅਧਿਯਜ੍ਞੋऽਹਮੇਵਾਤ੍ਰ ਦੇਹੇ ਦੇਹਭृਤਾਂ ਵਰ॥
adhibhūtaṁ kṣharo bhāvaḥ puruṣhaśh chādhidaivatam adhiyajño ’ham evātra dehe deha-bhṛitāṁ vara
अर्थहे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! नश्वर वस्तु (पंचमहाभूत) अधिभूत और पुरुष अधिदैव है; इस शरीर में मैं ही अधियज्ञ हूँ।।
ਅਨ੍ਤਕਾਲੇ ਚ ਮਾਮੇਵ ਸ੍ਮਰਨ੍ਮੁਕ੍ਤ੍ਵਾ ਕਲੇਵਰਮ੍। ਯਃ ਪ੍ਰਯਾਤਿ ਸ ਮਦ੍ਭਾਵਂ ਯਾਤਿ ਨਾਸ੍ਤ੍ਯਤ੍ਰ ਸਂਸ਼ਯਃ॥
anta-kāle cha mām eva smaran muktvā kalevaram yaḥ prayāti sa mad-bhāvaṁ yāti nāstyatra sanśhayaḥ
अर्थऔर जो कोई पुरुष अन्तकाल में मुझे ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं।।
ਯਂ ਯਂ ਵਾਪਿ ਸ੍ਮਰਨ੍ਭਾਵਂ ਤ੍ਯਜਤ੍ਯਨ੍ਤੇ ਕਲੇਵਰਮ੍। ਤਂ ਤਮੇਵੈਤਿ ਕੌਨ੍ਤੇਯ ਸਦਾ ਤਦ੍ਭਾਵਭਾਵਿਤਃ॥
yaṁ yaṁ vāpi smaran bhāvaṁ tyajatyante kalevaram taṁ tam evaiti kaunteya sadā tad-bhāva-bhāvitaḥ
अर्थहे कौन्तेय ! (यह जीव) अन्तकाल में जिस किसी भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर को त्यागता है, वह सदैव उस भाव के चिन्तन के फलस्वरूप उसी भाव को ही प्राप्त होता है।।
ਤਸ੍ਮਾਤ੍ਸਰ੍ਵੇषੁ ਕਾਲੇषੁ ਮਾਮਨੁਸ੍ਮਰ ਯੁਧ੍ਯ ਚ। ਮਯ੍ਯਰ੍ਪਿਤਮਨੋਬੁਦ੍ਧਿਰ੍ਮਾਮੇਵੈष੍ਯਸ੍ਯਸਂਸ਼ਯਮ੍॥
tasmāt sarveṣhu kāleṣhu mām anusmara yudhya cha mayyarpita-mano-buddhir mām evaiṣhyasyasanśhayam
अर्थइसलिए, तुम सब काल में मेरा निरन्तर स्मरण करो; और युद्ध करो मुझमें अर्पण किये मन, बुद्धि से युक्त हुए निःसन्देह तुम मुझे ही प्राप्त होओगे।।
ਅਭ੍ਯਾਸਯੋਗਯੁਕ੍ਤੇਨ ਚੇਤਸਾ ਨਾਨ੍ਯਗਾਮਿਨਾ। ਪਰਮਂ ਪੁਰੁषਂ ਦਿਵ੍ਯਂ ਯਾਤਿ ਪਾਰ੍ਥਾਨੁਚਿਨ੍ਤਯਨ੍॥
abhyāsa-yoga-yuktena chetasā nānya-gāminā paramaṁ puruṣhaṁ divyaṁ yāti pārthānuchintayan
अर्थहे पार्थ ! अभ्यासयोग से युक्त अन्यत्र न जाने वाले चित्त से निरन्तर चिन्तन करता हुआ (साधक) परम दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है।।
ਕਵਿਂ ਪੁਰਾਣਮਨੁਸ਼ਾਸਿਤਾਰ ਮਣੋਰਣੀਯਾਂਸਮਨੁਸ੍ਮਰੇਦ੍ਯਃ। ਸਰ੍ਵਸ੍ਯ ਧਾਤਾਰਮਚਿਨ੍ਤ੍ਯਰੂਪ ਮਾਦਿਤ੍ਯਵਰ੍ਣਂ ਤਮਸਃ ਪਰਸ੍ਤਾਤ੍॥
kaviṁ purāṇam anuśhāsitāram aṇor aṇīyānsam anusmared yaḥ sarvasya dhātāram achintya-rūpam āditya-varṇaṁ tamasaḥ parastāt
अर्थजो पुरुष सर्वज्ञ, प्राचीन (पुराण), सबके नियन्ता, सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर, सब के धाता, अचिन्त्यरूप, सूर्य के समान प्रकाश रूप और (अविद्या) अन्धकार से परे तत्त्व का अनुस्मरण करता है।।
ਪ੍ਰਯਾਣਕਾਲੇ ਮਨਸਾऽਚਲੇਨ ਭਕ੍ਤ੍ਯਾ ਯੁਕ੍ਤੋ ਯੋਗਬਲੇਨ ਚੈਵ। ਭ੍ਰੁਵੋਰ੍ਮਧ੍ਯੇ ਪ੍ਰਾਣਮਾਵੇਸ਼੍ਯ ਸਮ੍ਯਕ੍ ਸ ਤਂ ਪਰਂ ਪੁਰੁषਮੁਪੈਤਿ ਦਿਵ੍ਯਮ੍॥
prayāṇa-kāle manasāchalena bhaktyā yukto yoga-balena chaiva bhruvor madhye prāṇam āveśhya samyak sa taṁ paraṁ puruṣham upaiti divyam
अर्थवह (साधक) अन्तकाल में योगबल से प्राण को भ्रकुटि के मध्य सम्यक् प्रकार स्थापन करके निश्चल मन से भक्ति युक्त होकर उस परम दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है।।
ਯਦਕ੍षਰਂ ਵੇਦਵਿਦੋ ਵਦਨ੍ਤਿ ਵਿਸ਼ਨ੍ਤਿ ਯਦ੍ਯਤਯੋ ਵੀਤਰਾਗਾਃ। ਯਦਿਚ੍ਛਨ੍ਤੋ ਬ੍ਰਹ੍ਮਚਰ੍ਯਂ ਚਰਨ੍ਤਿ ਤਤ੍ਤੇ ਪਦਂ ਸਂਗ੍ਰਹੇਣ ਪ੍ਰਵਕ੍ष੍ਯੇ॥
yad akṣharaṁ veda-vido vadanti viśhanti yad yatayo vīta-rāgāḥ yad ichchhanto brahmacharyaṁ charanti tat te padaṁ saṅgraheṇa pravakṣhye
अर्थवेद के जानने वाले विद्वान जिसे अक्षर कहते हैं; रागरहित यत्नशील पुरुष जिसमें प्रवेश करते हैं; जिसकी इच्छा से (साधक गण) ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं - उस पद (लक्ष्य) को मैं तुम्हें संक्षेप में कहूँगा।।
ਸਰ੍ਵਦ੍ਵਾਰਾਣਿ ਸਂਯਮ੍ਯ ਮਨੋ ਹृਦਿ ਨਿਰੁਧ੍ਯ ਚ। ਮੂਰ੍ਧ੍ਨ੍ਯਾਧਾਯਾਤ੍ਮਨਃ ਪ੍ਰਾਣਮਾਸ੍ਥਿਤੋ ਯੋਗਧਾਰਣਾਮ੍॥
sarva-dvārāṇi sanyamya mano hṛidi nirudhya cha mūrdhnyādhāyātmanaḥ prāṇam āsthito yoga-dhāraṇām
अर्थसब (इन्द्रियों के) द्वारों को संयमित कर मन को हृदय में स्थिर करके और प्राण को मस्तक में स्थापित करके योगधारणा में स्थित हुआ।।
ਓਮਿਤ੍ਯੇਕਾਕ੍षਰਂ ਬ੍ਰਹ੍ਮ ਵ੍ਯਾਹਰਨ੍ਮਾਮਨੁਸ੍ਮਰਨ੍। ਯਃ ਪ੍ਰਯਾਤਿ ਤ੍ਯਜਨ੍ਦੇਹਂ ਸ ਯਾਤਿ ਪਰਮਾਂ ਗਤਿਮ੍॥
oṁ ityekākṣharaṁ brahma vyāharan mām anusmaran yaḥ prayāti tyajan dehaṁ sa yāti paramāṁ gatim
अर्थजो पुरुष ओऽम् इस एक अक्षर ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ और मेरा स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।।
ਅਨਨ੍ਯਚੇਤਾਃ ਸਤਤਂ ਯੋ ਮਾਂ ਸ੍ਮਰਤਿ ਨਿਤ੍ਯਸ਼ਃ। ਤਸ੍ਯਾਹਂ ਸੁਲਭਃ ਪਾਰ੍ਥ ਨਿਤ੍ਯਯੁਕ੍ਤਸ੍ਯ ਯੋਗਿਨਃ॥
ananya-chetāḥ satataṁ yo māṁ smarati nityaśhaḥ tasyāhaṁ sulabhaḥ pārtha nitya-yuktasya yoginaḥ
अर्थहे पार्थ ! जो अनन्यचित्त वाला पुरुष मेरा स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ अर्थात् सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ।।
ਮਾਮੁਪੇਤ੍ਯ ਪੁਨਰ੍ਜਨ੍ਮ ਦੁਃਖਾਲਯਮਸ਼ਾਸ਼੍ਵਤਮ੍। ਨਾਪ੍ਨੁਵਨ੍ਤਿ ਮਹਾਤ੍ਮਾਨਃ ਸਂਸਿਦ੍ਧਿਂ ਪਰਮਾਂ ਗਤਾਃ॥
mām upetya punar janma duḥkhālayam aśhāśhvatam nāpnuvanti mahātmānaḥ sansiddhiṁ paramāṁ gatāḥ
अर्थपरम सिद्धि को प्राप्त हुये महात्माजन मुझे प्राप्त कर अनित्य दुःख के आलयरूप (गृहरूप) पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होते हैं।।
ਆਬ੍ਰਹ੍ਮਭੁਵਨਾਲ੍ਲੋਕਾਃ ਪੁਨਰਾਵਰ੍ਤਿਨੋऽਰ੍ਜੁਨ। ਮਾਮੁਪੇਤ੍ਯ ਤੁ ਕੌਨ੍ਤੇਯ ਪੁਨਰ੍ਜਨ੍ਮ ਨ ਵਿਦ੍ਯਤੇ॥
ā-brahma-bhuvanāl lokāḥ punar āvartino ’rjuna mām upetya tu kaunteya punar janma na vidyate
अर्थहे अर्जुन ! ब्रह्म लोक तक के सब लोग पुनरावर्ती स्वभाव वाले हैं। परन्तु, हे कौन्तेय ! मुझे प्राप्त होने पर पुनर्जन्म नहीं होता।।
ਸਹਸ੍ਰਯੁਗਪਰ੍ਯਨ੍ਤਮਹਰ੍ਯਦ੍ਬ੍ਰਹ੍ਮਣੋ ਵਿਦੁਃ। ਰਾਤ੍ਰਿਂ ਯੁਗਸਹਸ੍ਰਾਨ੍ਤਾਂ ਤੇऽਹੋਰਾਤ੍ਰਵਿਦੋ ਜਨਾਃ॥
sahasra-yuga-paryantam ahar yad brahmaṇo viduḥ rātriṁ yuga-sahasrāntāṁ te ’ho-rātra-vido janāḥ
अर्थजो लोग ब्रह्मा जी के एक दिन की अवधि जानते हैं जो कि सहस्र वर्ष की है तथा एक सहस्र वर्ष की अवधि की एक रात्रि को जानते हैं वे दिन और रात्रि को जानने वाले पुरुष हैं।।
ਅਵ੍ਯਕ੍ਤਾਦ੍ਵ੍ਯਕ੍ਤਯਃ ਸਰ੍ਵਾਃ ਪ੍ਰਭਵਨ੍ਤ੍ਯਹਰਾਗਮੇ। ਰਾਤ੍ਰ੍ਯਾਗਮੇ ਪ੍ਰਲੀਯਨ੍ਤੇ ਤਤ੍ਰੈਵਾਵ੍ਯਕ੍ਤਸਂਜ੍ਞਕੇ॥
avyaktād vyaktayaḥ sarvāḥ prabhavantyahar-āgame rātryāgame pralīyante tatraivāvyakta-sanjñake
अर्थ(ब्रह्माजी के) दिन का उदय होने पर अव्यक्त से (यह) व्यक्त (चराचर जगत्) उत्पन्न होता है; और (ब्रह्माजी की) रात्रि के आगमन पर उसी अव्यक्त में लीन हो जाता है।।
ਭੂਤਗ੍ਰਾਮਃ ਸ ਏਵਾਯਂ ਭੂਤ੍ਵਾ ਭੂਤ੍ਵਾ ਪ੍ਰਲੀਯਤੇ। ਰਾਤ੍ਰ੍ਯਾਗਮੇऽਵਸ਼ਃ ਪਾਰ੍ਥ ਪ੍ਰਭਵਤ੍ਯਹਰਾਗਮੇ॥
bhūta-grāmaḥ sa evāyaṁ bhūtvā bhūtvā pralīyate rātryāgame ’vaśhaḥ pārtha prabhavatyahar-āgame
अर्थहे पार्थ ! वही यह भूतसमुदाय, है जो पुनः पुनः उत्पन्न होकर लीन होता है। अवश हुआ (यह भूतग्राम) रात्रि के आगमन पर लीन तथा दिन के उदय होने पर व्यक्त होता है।।
ਪਰਸ੍ਤਸ੍ਮਾਤ੍ਤੁ ਭਾਵੋऽਨ੍ਯੋऽਵ੍ਯਕ੍ਤੋऽਵ੍ਯਕ੍ਤਾਤ੍ਸਨਾਤਨਃ। ਯਃ ਸ ਸਰ੍ਵੇषੁ ਭੂਤੇषੁ ਨਸ਼੍ਯਤ੍ਸੁ ਨ ਵਿਨਸ਼੍ਯਤਿ॥
paras tasmāt tu bhāvo ’nyo ’vyakto ’vyaktāt sanātanaḥ yaḥ sa sarveṣhu bhūteṣhu naśhyatsu na vinaśhyati
अर्थपरन्तु उस अव्यक्त से परे अन्य जो सनातन अव्यक्त भाव है, वह समस्त भूतों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता।।
ਅਵ੍ਯਕ੍ਤੋऽਕ੍षਰ ਇਤ੍ਯੁਕ੍ਤਸ੍ਤਮਾਹੁਃ ਪਰਮਾਂ ਗਤਿਮ੍। ਯਂ ਪ੍ਰਾਪ੍ਯ ਨ ਨਿਵਰ੍ਤਨ੍ਤੇ ਤਦ੍ਧਾਮ ਪਰਮਂ ਮਮ॥
avyakto ’kṣhara ityuktas tam āhuḥ paramāṁ gatim yaṁ prāpya na nivartante tad dhāma paramaṁ mama
अर्थजो अव्यक्त अक्षर कहा गया है, वही परम गति (लक्ष्य) है। जिसे प्राप्त होकर (साधकगण) पुनः (संसार को) नहीं लौटते, वह मेरा परम धाम है।।
ਪੁਰੁषਃ ਸ ਪਰਃ ਪਾਰ੍ਥ ਭਕ੍ਤ੍ਯਾ ਲਭ੍ਯਸ੍ਤ੍ਵਨਨ੍ਯਯਾ। ਯਸ੍ਯਾਨ੍ਤਃਸ੍ਥਾਨਿ ਭੂਤਾਨਿ ਯੇਨ ਸਰ੍ਵਮਿਦਂ ਤਤਮ੍॥
puruṣhaḥ sa paraḥ pārtha bhaktyā labhyas tvananyayā yasyāntaḥ-sthāni bhūtāni yena sarvam idaṁ tatam
अर्थहे पार्थ ! जिस (परमात्मा) के अन्तर्गत समस्त भूत हैं और जिससे यह सम्पूर्ण (जगत्) व्याप्त है, वह परम पुरुष अनन्य भक्ति से ही प्राप्त करने योग्य है।।
ਯਤ੍ਰ ਕਾਲੇ ਤ੍ਵਨਾਵृਤ੍ਤਿਮਾਵृਤ੍ਤਿਂ ਚੈਵ ਯੋਗਿਨਃ। ਪ੍ਰਯਾਤਾ ਯਾਨ੍ਤਿ ਤਂ ਕਾਲਂ ਵਕ੍ष੍ਯਾਮਿ ਭਰਤਰ੍षਭ॥
yatra kāle tvanāvṛittim āvṛittiṁ chaiva yoginaḥ prayātā yānti taṁ kālaṁ vakṣhyāmi bharatarṣhabha
अर्थहे भरतश्रेष्ठ ! जिस काल में (मार्ग में) शरीर त्याग कर गये हुए योगीजन अपुनरावृत्ति को, और (या) पुनरावृत्ति को प्राप्त होते हैं, वह काल (मार्ग) मैं तुम्हें बताऊँगा।।
ਅਗ੍ਨਿਰ੍ਜ੍ਯੋਤਿਰਹਃ ਸ਼ੁਕ੍ਲਃ षਣ੍ਮਾਸਾ ਉਤ੍ਤਰਾਯਣਮ੍। ਤਤ੍ਰ ਪ੍ਰਯਾਤਾ ਗਚ੍ਛਨ੍ਤਿ ਬ੍ਰਹ੍ਮ ਬ੍ਰਹ੍ਮਵਿਦੋ ਜਨਾਃ॥
agnir jyotir ahaḥ śhuklaḥ ṣhaṇ-māsā uttarāyaṇam tatra prayātā gachchhanti brahma brahma-vido janāḥ
अर्थजो ब्रह्मविद् साधकजन मरणोपरान्त अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्लपक्ष और उत्तरायण के छः मास वाले मार्ग से जाते हैं, वे ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।।
ਧੂਮੋ ਰਾਤ੍ਰਿਸ੍ਤਥਾ ਕृष੍ਣਃ षਣ੍ਮਾਸਾ ਦਕ੍षਿਣਾਯਨਮ੍। ਤਤ੍ਰ ਚਾਨ੍ਦ੍ਰਮਸਂ ਜ੍ਯੋਤਿਰ੍ਯੋਗੀ ਪ੍ਰਾਪ੍ਯ ਨਿਵਰ੍ਤਤੇ॥
dhūmo rātris tathā kṛiṣhṇaḥ ṣhaṇ-māsā dakṣhiṇāyanam tatra chāndramasaṁ jyotir yogī prāpya nivartate
अर्थधूम, रात्रि, कृष्णपक्ष और दक्षिणायन के छः मास वाले मार्ग से चन्द्रमा की ज्योति को प्राप्त कर, योगी (संसार को) लौटता है।।
ਸ਼ੁਕ੍ਲਕृष੍ਣੇ ਗਤੀ ਹ੍ਯੇਤੇ ਜਗਤਃ ਸ਼ਾਸ਼੍ਵਤੇ ਮਤੇ। ਏਕਯਾ ਯਾਤ੍ਯਨਾਵृਤ੍ਤਿਮਨ੍ਯਯਾऽऽਵਰ੍ਤਤੇ ਪੁਨਃ॥
śhukla-kṛiṣhṇe gatī hyete jagataḥ śhāśhvate mate ekayā yātyanāvṛittim anyayāvartate punaḥ
अर्थजगत् के ये दो प्रकार के शुक्ल और कृष्ण मार्ग सनातन माने गये हैं । इनमें एक (शुक्ल) के द्वारा (साधक) अपुनरावृत्ति को तथा अन्य (कृष्ण) के द्वारा पुनरावृत्ति को प्राप्त होता है।।
ਨੈਤੇ ਸृਤੀ ਪਾਰ੍ਥ ਜਾਨਨ੍ਯੋਗੀ ਮੁਹ੍ਯਤਿ ਕਸ਼੍ਚਨ। ਤਸ੍ਮਾਤ੍ਸਰ੍ਵੇषੁ ਕਾਲੇषੁ ਯੋਗਯੁਕ੍ਤੋ ਭਵਾਰ੍ਜੁਨ॥
naite sṛitī pārtha jānan yogī muhyati kaśhchana tasmāt sarveṣhu kāleṣhu yoga-yukto bhavārjuna
अर्थहे पार्थ इन दो मार्गों को (तत्त्व से) जानने वाला कोई भी योगी मोहित नहीं होता। इसलिए, हे अर्जुन ! तुम सब काल में योगयुक्त बनो।।
ਵੇਦੇषੁ ਯਜ੍ਞੇषੁ ਤਪਃਸੁ ਚੈਵ ਦਾਨੇषੁ ਯਤ੍ਪੁਣ੍ਯਫਲਂ ਪ੍ਰਦਿष੍ਟਮ੍। ਅਤ੍ਯੇਤਿ ਤਤ੍ਸਰ੍ਵਮਿਦਂ ਵਿਦਿਤ੍ਵਾ ਯੋਗੀ ਪਰਂ ਸ੍ਥਾਨਮੁਪੈਤਿ ਚਾਦ੍ਯਮ੍॥
vedeṣhu yajñeṣhu tapaḥsu chaiva dāneṣhu yat puṇya-phalaṁ pradiṣhṭam atyeti tat sarvam idaṁ viditvā yogī paraṁ sthānam upaiti chādyam
अर्थयोगी पुरुष यह सब (दोनों मार्गों के तत्त्व को) जानकर वेदाध्ययन, यज्ञ, तप और दान करने में जो पुण्य फल कहा गया है, उस सबका उल्लंघन कर जाता है और आद्य (सनातन), परम स्थान को प्राप्त होता है।।