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ഭഗവദ്ഗീതാ · അധ്യായ 8 / 18

അക്ഷരബ്രഹ്മയോഗ

Bhagavad Gita Chapter 8 in Malayalam

Akṣhar Brahma Yog · अक्षर ब्रह्म · 28 श्लोक

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अध्याय सारांश

भगवद गीता का आठवां अध्याय अक्षरब्रह्मयोग है। इस अध्याय में, कृष्ण मृत्यु से पहले अंतिम विचार का महत्व बताते हैं। अगर हम मृत्यु के समय कृष्ण को याद कर लें तो हम निश्चित रूप से उन्हें प्राप्त करेंगे। इसलिए हर समय प्रभु के बारे में जागरूकता रखना, उनके बारे में सोचना और हर समय उनके नामों का जप करना बहुत महत्वपूर्ण है। अपने मन को पूरी तरह से कृष्ण की निरंतर भक्ति में समाहित करके हम इस भौतिक संसार से परे भगवान के सर्वोच्च निवास तक जा सकते हैं।

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അര്ജുന ഉവാച കിം തദ്ബ്രഹ്മ കിമധ്യാത്മം കിം കര്മ പുരുഷോത്തമ। അധിഭൂതം കിം പ്രോക്തമധിദൈവം കിമുച്യതേ॥

arjuna uvācha kiṁ tad brahma kim adhyātmaṁ kiṁ karma puruṣhottama adhibhūtaṁ cha kiṁ proktam adhidaivaṁ kim uchyate

अर्थअर्जुन ने कहा -हे पुरुषोत्तम ! वह ब्रह्म क्या है अध्यात्म क्या है? तथा कर्म क्या है? और अधिभूत नाम से क्या कहा गया है? तथा अधिदैव नाम से क्या कहा जाता है,

അധിയജ്ഞഃ കഥം കോഽത്ര ദേഹേഽസ്മിന്മധുസൂദന। പ്രയാണകാലേ കഥം ജ്ഞേയോഽസി നിയതാത്മഭിഃ॥

adhiyajñaḥ kathaṁ ko ’tra dehe ’smin madhusūdana prayāṇa-kāle cha kathaṁ jñeyo ’si niyatātmabhiḥ

अर्थऔर हे मधुसूदन ! यहाँ अधियज्ञ कौन है? और वह इस शरीर में कैसे है? और संयत चित्त वाले पुरुषों द्वारा अन्त समय में आप किस प्रकार जाने जाते हैं,

ശ്രീ ഭഗവാനുവാച അക്ഷരം ബ്രഹ്മ പരമം സ്വഭാവോഽധ്യാത്മമുച്യതേ। ഭൂതഭാവോദ്ഭവകരോ വിസര്ഗഃ കര്മസംജ്ഞിതഃ॥

śhrī bhagavān uvācha akṣharaṁ brahma paramaṁ svabhāvo ’dhyātmam uchyate bhūta-bhāvodbhava-karo visargaḥ karma-sanjñitaḥ

अर्थश्रीभगवान् ने कहा -- परम अक्षर (अविनाशी) तत्त्व ब्रह्म है; स्वभाव (अपना स्वरूप) अध्यात्म कहा जाता है; भूतों के भावों को उत्पन्न करने वाला विसर्ग (यज्ञ, प्रेरक बल) कर्म नाम से जाना जाता है।।

അധിഭൂതം ക്ഷരോ ഭാവഃ പുരുഷശ്ചാധിദൈവതമ്। അധിയജ്ഞോഽഹമേവാത്ര ദേഹേ ദേഹഭൃതാം വര॥

adhibhūtaṁ kṣharo bhāvaḥ puruṣhaśh chādhidaivatam adhiyajño ’ham evātra dehe deha-bhṛitāṁ vara

अर्थहे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! नश्वर वस्तु (पंचमहाभूत) अधिभूत और पुरुष अधिदैव है; इस शरीर में मैं ही अधियज्ञ हूँ।।

അന്തകാലേ മാമേവ സ്മരന്മുക്ത്വാ കലേവരമ്। യഃ പ്രയാതി മദ്ഭാവം യാതി നാസ്ത്യത്ര സംശയഃ॥

anta-kāle cha mām eva smaran muktvā kalevaram yaḥ prayāti sa mad-bhāvaṁ yāti nāstyatra sanśhayaḥ

अर्थऔर जो कोई पुरुष अन्तकाल में मुझे ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं।।

യം യം വാപി സ്മരന്ഭാവം ത്യജത്യന്തേ കലേവരമ്। തം തമേവൈതി കൌന്തേയ സദാ തദ്ഭാവഭാവിതഃ॥

yaṁ yaṁ vāpi smaran bhāvaṁ tyajatyante kalevaram taṁ tam evaiti kaunteya sadā tad-bhāva-bhāvitaḥ

अर्थहे कौन्तेय ! (यह जीव) अन्तकाल में जिस किसी भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर को त्यागता है, वह सदैव उस भाव के चिन्तन के फलस्वरूप उसी भाव को ही प्राप्त होता है।।

തസ്മാത്സര്വേഷു കാലേഷു മാമനുസ്മര യുധ്യ ച। മയ്യര്പിതമനോബുദ്ധിര്മാമേവൈഷ്യസ്യസംശയമ്॥

tasmāt sarveṣhu kāleṣhu mām anusmara yudhya cha mayyarpita-mano-buddhir mām evaiṣhyasyasanśhayam

अर्थइसलिए, तुम सब काल में मेरा निरन्तर स्मरण करो; और युद्ध करो मुझमें अर्पण किये मन, बुद्धि से युक्त हुए निःसन्देह तुम मुझे ही प्राप्त होओगे।।

അഭ്യാസയോഗയുക്തേന ചേതസാ നാന്യഗാമിനാ। പരമം പുരുഷം ദിവ്യം യാതി പാര്ഥാനുചിന്തയന്॥

abhyāsa-yoga-yuktena chetasā nānya-gāminā paramaṁ puruṣhaṁ divyaṁ yāti pārthānuchintayan

अर्थहे पार्थ ! अभ्यासयोग से युक्त अन्यत्र न जाने वाले चित्त से निरन्तर चिन्तन करता हुआ (साधक) परम दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है।।

കവിം പുരാണമനുശാസിതാര മണോരണീയാംസമനുസ്മരേദ്യഃ। സര്വസ്യ ധാതാരമചിന്ത്യരൂപ മാദിത്യവര്ണം തമസഃ പരസ്താത്॥

kaviṁ purāṇam anuśhāsitāram aṇor aṇīyānsam anusmared yaḥ sarvasya dhātāram achintya-rūpam āditya-varṇaṁ tamasaḥ parastāt

अर्थजो पुरुष सर्वज्ञ, प्राचीन (पुराण), सबके नियन्ता, सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर, सब के धाता, अचिन्त्यरूप, सूर्य के समान प्रकाश रूप और (अविद्या) अन्धकार से परे तत्त्व का अनुस्मरण करता है।।

പ്രയാണകാലേ മനസാഽചലേന ഭക്ത്യാ യുക്തോ യോഗബലേന ചൈവ। ഭ്രുവോര്മധ്യേ പ്രാണമാവേശ്യ സമ്യക് തം പരം പുരുഷമുപൈതി ദിവ്യമ്॥

prayāṇa-kāle manasāchalena bhaktyā yukto yoga-balena chaiva bhruvor madhye prāṇam āveśhya samyak sa taṁ paraṁ puruṣham upaiti divyam

अर्थवह (साधक) अन्तकाल में योगबल से प्राण को भ्रकुटि के मध्य सम्यक् प्रकार स्थापन करके निश्चल मन से भक्ति युक्त होकर उस परम दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है।।

യദക്ഷരം വേദവിദോ വദന്തി വിശന്തി യദ്യതയോ വീതരാഗാഃ। യദിച്ഛന്തോ ബ്രഹ്മചര്യം ചരന്തി തത്തേ പദം സംഗ്രഹേണ പ്രവക്ഷ്യേ॥

yad akṣharaṁ veda-vido vadanti viśhanti yad yatayo vīta-rāgāḥ yad ichchhanto brahmacharyaṁ charanti tat te padaṁ saṅgraheṇa pravakṣhye

अर्थवेद के जानने वाले विद्वान जिसे अक्षर कहते हैं; रागरहित यत्नशील पुरुष जिसमें प्रवेश करते हैं; जिसकी इच्छा से (साधक गण) ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं - उस पद (लक्ष्य) को मैं तुम्हें संक्षेप में कहूँगा।।

സര്വദ്വാരാണി സംയമ്യ മനോ ഹൃദി നിരുധ്യ ച। മൂര്ധ്ന്യാധായാത്മനഃ പ്രാണമാസ്ഥിതോ യോഗധാരണാമ്॥

sarva-dvārāṇi sanyamya mano hṛidi nirudhya cha mūrdhnyādhāyātmanaḥ prāṇam āsthito yoga-dhāraṇām

अर्थसब (इन्द्रियों के) द्वारों को संयमित कर मन को हृदय में स्थिर करके और प्राण को मस्तक में स्थापित करके योगधारणा में स्थित हुआ।।

ഓമിത്യേകാക്ഷരം ബ്രഹ്മ വ്യാഹരന്മാമനുസ്മരന്। യഃ പ്രയാതി ത്യജന്ദേഹം യാതി പരമാം ഗതിമ്॥

oṁ ityekākṣharaṁ brahma vyāharan mām anusmaran yaḥ prayāti tyajan dehaṁ sa yāti paramāṁ gatim

अर्थजो पुरुष ओऽम् इस एक अक्षर ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ और मेरा स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।।

അനന്യചേതാഃ സതതം യോ മാം സ്മരതി നിത്യശഃ। തസ്യാഹം സുലഭഃ പാര്ഥ നിത്യയുക്തസ്യ യോഗിനഃ॥

ananya-chetāḥ satataṁ yo māṁ smarati nityaśhaḥ tasyāhaṁ sulabhaḥ pārtha nitya-yuktasya yoginaḥ

अर्थहे पार्थ ! जो अनन्यचित्त वाला पुरुष मेरा स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ अर्थात् सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ।।

മാമുപേത്യ പുനര്ജന്മ ദുഃഖാലയമശാശ്വതമ്। നാപ്നുവന്തി മഹാത്മാനഃ സംസിദ്ധിം പരമാം ഗതാഃ॥

mām upetya punar janma duḥkhālayam aśhāśhvatam nāpnuvanti mahātmānaḥ sansiddhiṁ paramāṁ gatāḥ

अर्थपरम सिद्धि को प्राप्त हुये महात्माजन मुझे प्राप्त कर अनित्य दुःख के आलयरूप (गृहरूप) पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होते हैं।।

ആബ്രഹ്മഭുവനാല്ലോകാഃ പുനരാവര്തിനോഽര്ജുന। മാമുപേത്യ തു കൌന്തേയ പുനര്ജന്മ വിദ്യതേ॥

ā-brahma-bhuvanāl lokāḥ punar āvartino ’rjuna mām upetya tu kaunteya punar janma na vidyate

अर्थहे अर्जुन ! ब्रह्म लोक तक के सब लोग पुनरावर्ती स्वभाव वाले हैं। परन्तु, हे कौन्तेय ! मुझे प्राप्त होने पर पुनर्जन्म नहीं होता।।

സഹസ്രയുഗപര്യന്തമഹര്യദ്ബ്രഹ്മണോ വിദുഃ। രാത്രിം യുഗസഹസ്രാന്താം തേഽഹോരാത്രവിദോ ജനാഃ॥

sahasra-yuga-paryantam ahar yad brahmaṇo viduḥ rātriṁ yuga-sahasrāntāṁ te ’ho-rātra-vido janāḥ

अर्थजो लोग ब्रह्मा जी के एक दिन की अवधि जानते हैं जो कि सहस्र वर्ष की है तथा एक सहस्र वर्ष की अवधि की एक रात्रि को जानते हैं वे दिन और रात्रि को जानने वाले पुरुष हैं।।

അവ്യക്താദ്വ്യക്തയഃ സര്വാഃ പ്രഭവന്ത്യഹരാഗമേ। രാത്ര്യാഗമേ പ്രലീയന്തേ തത്രൈവാവ്യക്തസംജ്ഞകേ॥

avyaktād vyaktayaḥ sarvāḥ prabhavantyahar-āgame rātryāgame pralīyante tatraivāvyakta-sanjñake

अर्थ(ब्रह्माजी के) दिन का उदय होने पर अव्यक्त से (यह) व्यक्त (चराचर जगत्) उत्पन्न होता है; और (ब्रह्माजी की) रात्रि के आगमन पर उसी अव्यक्त में लीन हो जाता है।।

ഭൂതഗ്രാമഃ ഏവായം ഭൂത്വാ ഭൂത്വാ പ്രലീയതേ। രാത്ര്യാഗമേഽവശഃ പാര്ഥ പ്രഭവത്യഹരാഗമേ॥

bhūta-grāmaḥ sa evāyaṁ bhūtvā bhūtvā pralīyate rātryāgame ’vaśhaḥ pārtha prabhavatyahar-āgame

अर्थहे पार्थ ! वही यह भूतसमुदाय, है जो पुनः पुनः उत्पन्न होकर लीन होता है। अवश हुआ (यह भूतग्राम) रात्रि के आगमन पर लीन तथा दिन के उदय होने पर व्यक्त होता है।।

പരസ്തസ്മാത്തു ഭാവോഽന്യോഽവ്യക്തോഽവ്യക്താത്സനാതനഃ। യഃ സര്വേഷു ഭൂതേഷു നശ്യത്സു വിനശ്യതി॥

paras tasmāt tu bhāvo ’nyo ’vyakto ’vyaktāt sanātanaḥ yaḥ sa sarveṣhu bhūteṣhu naśhyatsu na vinaśhyati

अर्थपरन्तु उस अव्यक्त से परे अन्य जो सनातन अव्यक्त भाव है, वह समस्त भूतों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता।।

അവ്യക്തോഽക്ഷര ഇത്യുക്തസ്തമാഹുഃ പരമാം ഗതിമ്। യം പ്രാപ്യ നിവര്തന്തേ തദ്ധാമ പരമം മമ॥

avyakto ’kṣhara ityuktas tam āhuḥ paramāṁ gatim yaṁ prāpya na nivartante tad dhāma paramaṁ mama

अर्थजो अव्यक्त अक्षर कहा गया है, वही परम गति (लक्ष्य) है। जिसे प्राप्त होकर (साधकगण) पुनः (संसार को) नहीं लौटते, वह मेरा परम धाम है।।

പുരുഷഃ പരഃ പാര്ഥ ഭക്ത്യാ ലഭ്യസ്ത്വനന്യയാ। യസ്യാന്തഃസ്ഥാനി ഭൂതാനി യേന സര്വമിദം തതമ്॥

puruṣhaḥ sa paraḥ pārtha bhaktyā labhyas tvananyayā yasyāntaḥ-sthāni bhūtāni yena sarvam idaṁ tatam

अर्थहे पार्थ ! जिस (परमात्मा) के अन्तर्गत समस्त भूत हैं और जिससे यह सम्पूर्ण (जगत्) व्याप्त है, वह परम पुरुष अनन्य भक्ति से ही प्राप्त करने योग्य है।।

യത്ര കാലേ ത്വനാവൃത്തിമാവൃത്തിം ചൈവ യോഗിനഃ। പ്രയാതാ യാന്തി തം കാലം വക്ഷ്യാമി ഭരതര്ഷഭ॥

yatra kāle tvanāvṛittim āvṛittiṁ chaiva yoginaḥ prayātā yānti taṁ kālaṁ vakṣhyāmi bharatarṣhabha

अर्थहे भरतश्रेष्ठ ! जिस काल में (मार्ग में) शरीर त्याग कर गये हुए योगीजन अपुनरावृत्ति को, और (या) पुनरावृत्ति को प्राप्त होते हैं, वह काल (मार्ग) मैं तुम्हें बताऊँगा।।

അഗ്നിര്ജ്യോതിരഹഃ ശുക്ലഃ ഷണ്മാസാ ഉത്തരായണമ്। തത്ര പ്രയാതാ ഗച്ഛന്തി ബ്രഹ്മ ബ്രഹ്മവിദോ ജനാഃ॥

agnir jyotir ahaḥ śhuklaḥ ṣhaṇ-māsā uttarāyaṇam tatra prayātā gachchhanti brahma brahma-vido janāḥ

अर्थजो ब्रह्मविद् साधकजन मरणोपरान्त अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्लपक्ष और उत्तरायण के छः मास वाले मार्ग से जाते हैं, वे ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।।

ധൂമോ രാത്രിസ്തഥാ കൃഷ്ണഃ ഷണ്മാസാ ദക്ഷിണായനമ്। തത്ര ചാന്ദ്രമസം ജ്യോതിര്യോഗീ പ്രാപ്യ നിവര്തതേ॥

dhūmo rātris tathā kṛiṣhṇaḥ ṣhaṇ-māsā dakṣhiṇāyanam tatra chāndramasaṁ jyotir yogī prāpya nivartate

अर्थधूम, रात्रि, कृष्णपक्ष और दक्षिणायन के छः मास वाले मार्ग से चन्द्रमा की ज्योति को प्राप्त कर, योगी (संसार को) लौटता है।।

ശുക്ലകൃഷ്ണേ ഗതീ ഹ്യേതേ ജഗതഃ ശാശ്വതേ മതേ। ഏകയാ യാത്യനാവൃത്തിമന്യയാഽഽവര്തതേ പുനഃ॥

śhukla-kṛiṣhṇe gatī hyete jagataḥ śhāśhvate mate ekayā yātyanāvṛittim anyayāvartate punaḥ

अर्थजगत् के ये दो प्रकार के शुक्ल और कृष्ण मार्ग सनातन माने गये हैं । इनमें एक (शुक्ल) के द्वारा (साधक) अपुनरावृत्ति को तथा अन्य (कृष्ण) के द्वारा पुनरावृत्ति को प्राप्त होता है।।

നൈതേ സൃതീ പാര്ഥ ജാനന്യോഗീ മുഹ്യതി കശ്ചന। തസ്മാത്സര്വേഷു കാലേഷു യോഗയുക്തോ ഭവാര്ജുന॥

naite sṛitī pārtha jānan yogī muhyati kaśhchana tasmāt sarveṣhu kāleṣhu yoga-yukto bhavārjuna

अर्थहे पार्थ इन दो मार्गों को (तत्त्व से) जानने वाला कोई भी योगी मोहित नहीं होता। इसलिए, हे अर्जुन ! तुम सब काल में योगयुक्त बनो।।

വേദേഷു യജ്ഞേഷു തപഃസു ചൈവ ദാനേഷു യത്പുണ്യഫലം പ്രദിഷ്ടമ്। അത്യേതി തത്സര്വമിദം വിദിത്വാ യോഗീ പരം സ്ഥാനമുപൈതി ചാദ്യമ്॥

vedeṣhu yajñeṣhu tapaḥsu chaiva dāneṣhu yat puṇya-phalaṁ pradiṣhṭam atyeti tat sarvam idaṁ viditvā yogī paraṁ sthānam upaiti chādyam

अर्थयोगी पुरुष यह सब (दोनों मार्गों के तत्त्व को) जानकर वेदाध्ययन, यज्ञ, तप और दान करने में जो पुण्य फल कहा गया है, उस सबका उल्लंघन कर जाता है और आद्य (सनातन), परम स्थान को प्राप्त होता है।।