ರಾಜವಿದ್ಯಾರಾಜಗುಹ್ಯಯೋಗ
Bhagavad Gita Chapter 9 in Kannada
Rāja Vidyā Yog · राजविद्या — भक्ति का रहस्य · 34 श्लोक
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अध्याय सारांश
भगवद गीता का नौवां अध्याय राजविद्याराजगुह्ययोग है। इस अध्याय में, कृष्ण समझाते हैं कि वह सर्वोच्च हैं और यह भौतिक संसार उनकी योगमाया द्वारा रचित और खंडित होता रहता है अथवा मनुष्य उनकी देखरेख में आते जाते रहते हैं। वे हमारी आध्यात्मिक जागरूकता के प्रति भक्ति की भूमिका और महत्व का वर्णन करते हैं। ऐसी भक्ति में मनुष्य को भगवन के लिए ही जीवित रहना चाहिए, अपना सर्वस्व भगवन को ही समर्पित करना चाहिए और सबकुछ भगवन के लिए ही करना चाहिए। जो इस प्रकार की भक्ति का अनुसरण करता है वह इस भौतिक संसार के बंधनों से मुक्त हो जाता है और भगवान के साथ एकजुट हो जाता है।
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ಶ್ರೀ ಭಗವಾನುವಾಚ ಇದಂ ತು ತೇ ಗುಹ್ಯತಮಂ ಪ್ರವಕ್ಷ್ಯಾಮ್ಯನಸೂಯವೇ। ಜ್ಞಾನಂ ವಿಜ್ಞಾನಸಹಿತಂ ಯಜ್ಜ್ಞಾತ್ವಾ ಮೋಕ್ಷ್ಯಸೇಽಶುಭಾತ್॥
śhrī bhagavān uvācha idaṁ tu te guhyatamaṁ pravakṣhyāmyanasūyave jñānaṁ vijñāna-sahitaṁ yaj jñātvā mokṣhyase ’śhubhāt
अर्थश्रीभगवान् ने कहा -- तुम अनसूयु (दोष दृष्टि रहित) के लिए मैं इस गुह्यतम ज्ञान को विज्ञान के सहित कहूँगा, जिसको जानकर तुम अशुभ (संसार बंधन) से मुक्त हो जाओगे।।
ರಾಜವಿದ್ಯಾ ರಾಜಗುಹ್ಯಂ ಪವಿತ್ರಮಿದಮುತ್ತಮಮ್। ಪ್ರತ್ಯಕ್ಷಾವಗಮಂ ಧರ್ಮ್ಯಂ ಸುಸುಖಂ ಕರ್ತುಮವ್ಯಯಮ್॥
rāja-vidyā rāja-guhyaṁ pavitram idam uttamam pratyakṣhāvagamaṁ dharmyaṁ su-sukhaṁ kartum avyayam
अर्थयह ज्ञान राजविद्या (विद्याओं का राजा) और राजगुह्य (सब गुह्यों अर्थात् रहस्यों का राजा) एवं पवित्र, उत्तम, प्रत्यक्ष ज्ञानवाला और धर्मयुक्त है, तथा करने में सरल और अव्यय है।।
ಅಶ್ರದ್ದಧಾನಾಃ ಪುರುಷಾ ಧರ್ಮಸ್ಯಾಸ್ಯ ಪರನ್ತಪ। ಅಪ್ರಾಪ್ಯ ಮಾಂ ನಿವರ್ತನ್ತೇ ಮೃತ್ಯುಸಂಸಾರವರ್ತ್ಮನಿ॥
aśhraddadhānāḥ puruṣhā dharmasyāsya parantapa aprāpya māṁ nivartante mṛityu-samsāra-vartmani
अर्थहे परन्तप ! इस धर्म में श्रद्धारहित पुरुष मुझे प्राप्त न होकर मृत्युरूपी संसार में रहते हैं (भ्रमण करते हैं)।।
ಮಯಾ ತತಮಿದಂ ಸರ್ವಂ ಜಗದವ್ಯಕ್ತಮೂರ್ತಿನಾ। ಮತ್ಸ್ಥಾನಿ ಸರ್ವಭೂತಾನಿ ನ ಚಾಹಂ ತೇಷ್ವವಸ್ಥಿತಃ॥
mayā tatam idaṁ sarvaṁ jagad avyakta-mūrtinā mat-sthāni sarva-bhūtāni na chāhaṁ teṣhvavasthitaḥ
अर्थयह सम्पूर्ण जगत् मुझ (परमात्मा) के अव्यक्त स्वरूप से व्याप्त है; भूतमात्र मुझमें स्थित है, परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूं।।
ನ ಚ ಮತ್ಸ್ಥಾನಿ ಭೂತಾನಿ ಪಶ್ಯ ಮೇ ಯೋಗಮೈಶ್ವರಮ್। ಭೂತಭೃನ್ನ ಚ ಭೂತಸ್ಥೋ ಮಮಾತ್ಮಾ ಭೂತಭಾವನಃ॥
na cha mat-sthāni bhūtāni paśhya me yogam aiśhwaram bhūta-bhṛin na cha bhūta-stho mamātmā bhūta-bhāvanaḥ
अर्थऔर (वस्तुत:) भूतमात्र मुझ में स्थित नहीं है; मेरे ईश्वरीय योग को देखो कि भूतों को धारण करने वाली और भूतों को उत्पन्न करने वाली मेरी आत्मा उन भूतों में स्थित नहीं है।।
ಯಥಾಽಽಕಾಶಸ್ಥಿತೋ ನಿತ್ಯಂ ವಾಯುಃ ಸರ್ವತ್ರಗೋ ಮಹಾನ್। ತಥಾ ಸರ್ವಾಣಿ ಭೂತಾನಿ ಮತ್ಸ್ಥಾನೀತ್ಯುಪಧಾರಯ॥
yathākāśha-sthito nityaṁ vāyuḥ sarvatra-go mahān tathā sarvāṇi bhūtāni mat-sthānītyupadhāraya
अर्थजैसे सर्वत्र विचरण करने वाली महान् वायु सदा आकाश में स्थित रहती हैं, वैसे ही सम्पूर्ण भूत मुझमें स्थित हैं, ऐसा तुम जानो।।
ಸರ್ವಭೂತಾನಿ ಕೌನ್ತೇಯ ಪ್ರಕೃತಿಂ ಯಾನ್ತಿ ಮಾಮಿಕಾಮ್। ಕಲ್ಪಕ್ಷಯೇ ಪುನಸ್ತಾನಿ ಕಲ್ಪಾದೌ ವಿಸೃಜಾಮ್ಯಹಮ್॥
sarva-bhūtāni kaunteya prakṛitiṁ yānti māmikām kalpa-kṣhaye punas tāni kalpādau visṛijāmyaham
अर्थहे कौन्तेय ! (एक) कल्प के अन्त में समस्त भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं; और (दूसरे) कल्प के प्रारम्भ में उनको मैं फिर रचता हूँ।।
ಪ್ರಕೃತಿಂ ಸ್ವಾಮವಷ್ಟಭ್ಯ ವಿಸೃಜಾಮಿ ಪುನಃ ಪುನಃ। ಭೂತಗ್ರಾಮಮಿಮಂ ಕೃತ್ಸ್ನಮವಶಂ ಪ್ರಕೃತೇರ್ವಶಾತ್॥
prakṛitiṁ svām avaṣhṭabhya visṛijāmi punaḥ punaḥ bhūta-grāmam imaṁ kṛitsnam avaśhaṁ prakṛiter vaśhāt
अर्थप्रकृति को अपने वश में करके (अर्थात् उसे चेतनता प्रदान कर) स्वभाव के वश से परतन्त्र (अवश) हुए इस सम्पूर्ण भूत समुदाय को मैं पुन:-पुन: रचता हूँ।।
ನ ಚ ಮಾಂ ತಾನಿ ಕರ್ಮಾಣಿ ನಿಬಧ್ನನ್ತಿ ಧನಞ್ಜಯ। ಉದಾಸೀನವದಾಸೀನಮಸಕ್ತಂ ತೇಷು ಕರ್ಮಸು॥
na cha māṁ tāni karmāṇi nibadhnanti dhanañjaya udāsīna-vad āsīnam asaktaṁ teṣhu karmasu
अर्थहे धनंजय ! उन कर्मों में आसक्ति रहित और उदासीन के समान स्थित मुझ (परमात्मा) को वे कर्म नहीं बांधते हैं।।
ಮಯಾಽಧ್ಯಕ್ಷೇಣ ಪ್ರಕೃತಿಃ ಸೂಯತೇ ಸಚರಾಚರಮ್। ಹೇತುನಾಽನೇನ ಕೌನ್ತೇಯ ಜಗದ್ವಿಪರಿವರ್ತತೇ॥
mayādhyakṣheṇa prakṛitiḥ sūyate sa-charācharam hetunānena kaunteya jagad viparivartate
अर्थहे कौन्तेय ! मुझ अध्यक्ष के कारण ( अर्थात् मेरी अध्यक्षता में) प्रकृति चराचर जगत् को उत्पन्न करती है; इस कारण यह जगत् घूमता रहता है।।
ಅವಜಾನನ್ತಿ ಮಾಂ ಮೂಢಾ ಮಾನುಷೀಂ ತನುಮಾಶ್ರಿತಮ್। ಪರಂ ಭಾವಮಜಾನನ್ತೋ ಮಮ ಭೂತಮಹೇಶ್ವರಮ್॥
avajānanti māṁ mūḍhā mānuṣhīṁ tanum āśhritam paraṁ bhāvam ajānanto mama bhūta-maheśhvaram
अर्थसमस्त भूतों के महान् ईश्वर रूप मेरे परम भाव को नहीं जानते हुए मूढ़ लोग मनुष्य शरीरधारी मुझ परमात्मा का अनादर करते हैं।।
ಮೋಘಾಶಾ ಮೋಘಕರ್ಮಾಣೋ ಮೋಘಜ್ಞಾನಾ ವಿಚೇತಸಃ। ರಾಕ್ಷಸೀಮಾಸುರೀಂ ಚೈವ ಪ್ರಕೃತಿಂ ಮೋಹಿನೀಂ ಶ್ರಿತಾಃ॥
moghāśhā mogha-karmāṇo mogha-jñānā vichetasaḥ rākṣhasīm āsurīṁ chaiva prakṛitiṁ mohinīṁ śhritāḥ
अर्थवृथा आशा, वृथा कर्म और वृथा ज्ञान वाले अविचारीजन राक्षसों के और असुरों के मोहित करने वाले स्वभाव को धारण किये रहते हैं।।
ಮಹಾತ್ಮಾನಸ್ತು ಮಾಂ ಪಾರ್ಥ ದೈವೀಂ ಪ್ರಕೃತಿಮಾಶ್ರಿತಾಃ। ಭಜನ್ತ್ಯನನ್ಯಮನಸೋ ಜ್ಞಾತ್ವಾ ಭೂತಾದಿಮವ್ಯಯಮ್॥
mahātmānas tu māṁ pārtha daivīṁ prakṛitim āśhritāḥ bhajantyananya-manaso jñātvā bhūtādim avyayam
अर्थहे पार्थ ! परन्तु दैवी प्रकृति के आश्रित महात्मा पुरुष मुझे समस्त भूतों का आदिकारण और अव्ययस्वरूप जानकर अनन्यमन से युक्त होकर मुझे भजते हैं।।
ಸತತಂ ಕೀರ್ತಯನ್ತೋ ಮಾಂ ಯತನ್ತಶ್ಚ ದೃಢವ್ರತಾಃ। ನಮಸ್ಯನ್ತಶ್ಚ ಮಾಂ ಭಕ್ತ್ಯಾ ನಿತ್ಯಯುಕ್ತಾ ಉಪಾಸತೇ॥
satataṁ kīrtayanto māṁ yatantaśh cha dṛiḍha-vratāḥ namasyantaśh cha māṁ bhaktyā nitya-yuktā upāsate
अर्थसतत मेरा कीर्तन करते हुए, प्रयत्नशील, दढ़व्रती पुरुष मुझे नमस्कार करते हुए, नित्ययुक्त होकर भक्तिपूर्वक मेरी उपासना करते हैं।।
ಜ್ಞಾನಯಜ್ಞೇನ ಚಾಪ್ಯನ್ಯೇ ಯಜನ್ತೋ ಮಾಮುಪಾಸತೇ। ಏಕತ್ವೇನ ಪೃಥಕ್ತ್ವೇನ ಬಹುಧಾ ವಿಶ್ವತೋಮುಖಮ್॥
jñāna-yajñena chāpyanye yajanto mām upāsate ekatvena pṛithaktvena bahudhā viśhvato-mukham
अर्थकोई मुझे ज्ञानयज्ञ के द्वारा पूजन करते हुए एकत्वभाव से उपासते हैं, कोई पृथक भाव से, कोई बहुत प्रकार से मुझ विराट स्वरूप (विश्वतो मुखम्) को उपासते हैं।।
ಅಹಂ ಕ್ರತುರಹಂ ಯಜ್ಞಃ ಸ್ವಧಾಽಹಮಹಮೌಷಧಮ್। ಮಂತ್ರೋಽಹಮಹಮೇವಾಜ್ಯಮಹಮಗ್ನಿರಹಂ ಹುತಮ್॥
ahaṁ kratur ahaṁ yajñaḥ svadhāham aham auṣhadham mantro ’ham aham evājyam aham agnir ahaṁ hutam
अर्थमैं ऋक्रतु हूँ; मैं यज्ञ हूँ; स्वधा और औषध मैं हूँ, मैं मन्त्र हूँ, घी हूँ, मैं अग्नि हूँ और हुतं अर्थात् हवन कर्म मैं हूँ।।
ಪಿತಾಽಹಮಸ್ಯ ಜಗತೋ ಮಾತಾ ಧಾತಾ ಪಿತಾಮಹಃ। ವೇದ್ಯಂ ಪವಿತ್ರಮೋಂಕಾರ ಋಕ್ ಸಾಮ ಯಜುರೇವ ಚ॥
pitāham asya jagato mātā dhātā pitāmahaḥ vedyaṁ pavitram oṁkāra ṛik sāma yajur eva cha
अर्थमैं ही इस जगत् का पिता, माता, धाता (धारण करने वाला) और पितामह हूँमैं वेद्य (जानने योग्य) वस्तु हूँ, पवित्र, ओंकार, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ।।
ಗತಿರ್ಭರ್ತಾ ಪ್ರಭುಃ ಸಾಕ್ಷೀ ನಿವಾಸಃ ಶರಣಂ ಸುಹೃತ್। ಪ್ರಭವಃ ಪ್ರಲಯಃ ಸ್ಥಾನಂ ನಿಧಾನಂ ಬೀಜಮವ್ಯಯಮ್॥
gatir bhartā prabhuḥ sākṣhī nivāsaḥ śharaṇaṁ suhṛit prabhavaḥ pralayaḥ sthānaṁ nidhānaṁ bījam avyayam
अर्थगति (लक्ष्य), भरण-पोषण करने वाला, प्रभु (स्वामी), साक्षी, निवास, शरणस्थान तथा मित्र और उत्पत्ति, प्रलयरूप तथा स्थान (आधार), निधान और अव्यय कारण भी मैं हूँ।।
ತಪಾಮ್ಯಹಮಹಂ ವರ್ಷಂ ನಿಗೃಹ್ಣಾಮ್ಯುತ್ಸೃಜಾಮಿ ಚ। ಅಮೃತಂ ಚೈವ ಮೃತ್ಯುಶ್ಚ ಸದಸಚ್ಚಾಹಮರ್ಜುನ॥
tapāmyaham ahaṁ varṣhaṁ nigṛihṇāmyutsṛijāmi cha amṛitaṁ chaiva mṛityuśh cha sad asach chāham arjuna
अर्थहे अर्जुन ! मैं ही (सूर्य रूप में) तपता हूँ; मैं वर्षा का निग्रह और उत्सर्जन करता हूँ। मैं ही अमृत और मृत्यु एवं सत् और असत् हूँ।।
ತ್ರೈವಿದ್ಯಾ ಮಾಂ ಸೋಮಪಾಃ ಪೂತಪಾಪಾ ಯಜ್ಞೈರಿಷ್ಟ್ವಾ ಸ್ವರ್ಗತಿಂ ಪ್ರಾರ್ಥಯನ್ತೇ। ತೇ ಪುಣ್ಯಮಾಸಾದ್ಯ ಸುರೇನ್ದ್ರಲೋಕ ಮಶ್ನನ್ತಿ ದಿವ್ಯಾನ್ದಿವಿ ದೇವಭೋಗಾನ್॥
trai-vidyā māṁ soma-pāḥ pūta-pāpā yajñair iṣhṭvā svar-gatiṁ prārthayante te puṇyam āsādya surendra-lokam aśhnanti divyān divi deva-bhogān
अर्थतीनों वेदों के ज्ञाता (वेदोक्त सकाम कर्म करने वाले), सोमपान करने वाले एवं पापों से पवित्र हुए पुरुष मुझे यज्ञों के द्वारा पूजकर स्वर्ग प्राप्ति चाहते हैं; वे पुरुष अपने पुण्यों के फलरूप इन्द्रलोक को प्राप्त कर स्वर्ग में दिव्य देवताओं के भोग भोगते हैं।।
ತೇ ತಂ ಭುಕ್ತ್ವಾ ಸ್ವರ್ಗಲೋಕಂ ವಿಶಾಲಂ ಕ್ಷೀಣೇ ಪುಣ್ಯೇ ಮರ್ತ್ಯಲೋಕಂ ವಿಶನ್ತಿ। ಏವ ತ್ರಯೀಧರ್ಮಮನುಪ್ರಪನ್ನಾ ಗತಾಗತಂ ಕಾಮಕಾಮಾ ಲಭನ್ತೇ॥
te taṁ bhuktvā swarga-lokaṁ viśhālaṁ kṣhīṇe puṇye martya-lokaṁ viśhanti evaṁ trayī-dharmam anuprapannā gatāgataṁ kāma-kāmā labhante
अर्थवे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर, पुण्यक्षीण होने पर, मृत्युलोक को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार तीनों वेदों में कहे गये कर्म के शरण हुए और भोगों की कामना वाले पुरुष आवागमन (गतागत) को प्राप्त होते हैं।।
ಅನನ್ಯಾಶ್ಚಿನ್ತಯನ್ತೋ ಮಾಂ ಯೇ ಜನಾಃ ಪರ್ಯುಪಾಸತೇ। ತೇಷಾಂ ನಿತ್ಯಾಭಿಯುಕ್ತಾನಾಂ ಯೋಗಕ್ಷೇಮಂ ವಹಾಮ್ಯಹಮ್॥
ananyāśh chintayanto māṁ ye janāḥ paryupāsate teṣhāṁ nityābhiyuktānāṁ yoga-kṣhemaṁ vahāmyaham
अर्थअनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ।।
ಯೇಽಪ್ಯನ್ಯದೇವತಾ ಭಕ್ತಾ ಯಜನ್ತೇ ಶ್ರದ್ಧಯಾಽನ್ವಿತಾಃ। ತೇಽಪಿ ಮಾಮೇವ ಕೌನ್ತೇಯ ಯಜನ್ತ್ಯವಿಧಿಪೂರ್ವಕಮ್॥
ye ’pyanya-devatā-bhaktā yajante śhraddhayānvitāḥ te ’pi mām eva kaunteya yajantyavidhi-pūrvakam
अर्थहे कौन्तेय ! श्रद्धा से युक्त जो भक्त अन्य देवताओं को पूजते हैं, वे भी मुझे ही अविधिपूर्वक पूजते हैं।।
ಅಹಂ ಹಿ ಸರ್ವಯಜ್ಞಾನಾಂ ಭೋಕ್ತಾ ಚ ಪ್ರಭುರೇವ ಚ। ನ ತು ಮಾಮಭಿಜಾನನ್ತಿ ತತ್ತ್ವೇನಾತಶ್ಚ್ಯವನ್ತಿ ತೇ॥
ahaṁ hi sarva-yajñānāṁ bhoktā cha prabhureva cha na tu mām abhijānanti tattvenātaśh chyavanti te
अर्थक्योंकि सब यज्ञों का भोक्ता और स्वामी मैं ही हूँ, परन्तु वे मुझे तत्त्वत: नहीं जानते हैं, इसलिए वे गिरते हैं, अर्थात् संसार को प्राप्त होते हैं।।
ಯಾನ್ತಿ ದೇವವ್ರತಾ ದೇವಾನ್ ಪಿತೃ़ನ್ಯಾನ್ತಿ ಪಿತೃವ್ರತಾಃ। ಭೂತಾನಿ ಯಾನ್ತಿ ಭೂತೇಜ್ಯಾ ಯಾನ್ತಿ ಮದ್ಯಾಜಿನೋಽಪಿ ಮಾಮ್॥
yānti deva-vratā devān pitṝīn yānti pitṛi-vratāḥ bhūtāni yānti bhūtejyā yānti mad-yājino ’pi mām
अर्थदेवताओं के पूजक देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरपूजक पितरों को जाते हैं, भूतों का यजन करने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं और मुझे पूजने वाले भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं।।
ಪತ್ರಂ ಪುಷ್ಪಂ ಫಲಂ ತೋಯಂ ಯೋ ಮೇ ಭಕ್ತ್ಯಾ ಪ್ರಯಚ್ಛತಿ। ತದಹಂ ಭಕ್ತ್ಯುಪಹೃತಮಶ್ನಾಮಿ ಪ್ರಯತಾತ್ಮನಃ॥
patraṁ puṣhpaṁ phalaṁ toyaṁ yo me bhaktyā prayachchhati tadahaṁ bhaktyupahṛitam aśhnāmi prayatātmanaḥ
अर्थजो कोई भी भक्त मेरे लिए पत्र, पुष्प, फल, जल आदि भक्ति से अर्पण करता है, उस शुद्ध मन के भक्त का वह भक्तिपूर्वक अर्पण किया हुआ (पत्र पुष्पादि) मैं भोगता हूँ अर्थात् स्वीकार करता हूँ।।
ಯತ್ಕರೋಷಿ ಯದಶ್ನಾಸಿ ಯಜ್ಜುಹೋಷಿ ದದಾಸಿ ಯತ್। ಯತ್ತಪಸ್ಯಸಿ ಕೌನ್ತೇಯ ತತ್ಕುರುಷ್ವ ಮದರ್ಪಣಮ್॥
yat karoṣhi yad aśhnāsi yaj juhoṣhi dadāsi yat yat tapasyasi kaunteya tat kuruṣhva mad-arpaṇam
अर्थहे कौन्तेय ! तुम जो कुछ कर्म करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ हवन करते हो, जो कुछ दान देते हो और जो कुछ तप करते हो, वह सब तुम मुझे अर्पण करो।।
ಶುಭಾಶುಭಫಲೈರೇವಂ ಮೋಕ್ಷ್ಯಸೇ ಕರ್ಮಬನ್ಧನೈಃ। ಸಂನ್ಯಾಸಯೋಗಯುಕ್ತಾತ್ಮಾ ವಿಮುಕ್ತೋ ಮಾಮುಪೈಷ್ಯಸಿ॥
śhubhāśhubha-phalair evaṁ mokṣhyase karma-bandhanaiḥ sannyāsa-yoga-yuktātmā vimukto mām upaiṣhyasi
अर्थइस प्रकार तुम शुभाशुभ फलस्वरूप कर्मबन्धनों से मुक्त हो जाओगे; और संन्यासयोग से युक्तचित्त हुए तुम विमुक्त होकर मुझे ही प्राप्त हो जाओगे।।
ಸಮೋಽಹಂ ಸರ್ವಭೂತೇಷು ನ ಮೇ ದ್ವೇಷ್ಯೋಽಸ್ತಿ ನ ಪ್ರಿಯಃ। ಯೇ ಭಜನ್ತಿ ತು ಮಾಂ ಭಕ್ತ್ಯಾ ಮಯಿ ತೇ ತೇಷು ಚಾಪ್ಯಹಮ್॥
samo ’haṁ sarva-bhūteṣhu na me dveṣhyo ’sti na priyaḥ ye bhajanti tu māṁ bhaktyā mayi te teṣhu chāpyaham
अर्थमैं समस्त भूतों में सम हूँ; न कोई मुझे अप्रिय है और न प्रिय; परन्तु जो मुझे भक्तिपूर्वक भजते हैं, वे मुझमें और मैं भी उनमें हूँ।।
ಅಪಿ ಚೇತ್ಸುದುರಾಚಾರೋ ಭಜತೇ ಮಾಮನನ್ಯಭಾಕ್। ಸಾಧುರೇವ ಸ ಮನ್ತವ್ಯಃ ಸಮ್ಯಗ್ವ್ಯವಸಿತೋ ಹಿ ಸಃ॥
api chet su-durāchāro bhajate mām ananya-bhāk sādhur eva sa mantavyaḥ samyag vyavasito hi saḥ
अर्थयदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भक्त होकर मुझे भजता है, वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है।।
ಕ್ಷಿಪ್ರಂ ಭವತಿ ಧರ್ಮಾತ್ಮಾ ಶಶ್ವಚ್ಛಾನ್ತಿಂ ನಿಗಚ್ಛತಿ। ಕೌನ್ತೇಯ ಪ್ರತಿಜಾನೀಹಿ ನ ಮೇ ಭಕ್ತಃ ಪ್ರಣಶ್ಯತಿ॥
kṣhipraṁ bhavati dharmātmā śhaśhvach-chhāntiṁ nigachchhati kaunteya pratijānīhi na me bhaktaḥ praṇaśhyati
अर्थहे कौन्तेय, वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है। तुम निश्चयपूर्वक सत्य जानो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।।
ಮಾಂ ಹಿ ಪಾರ್ಥ ವ್ಯಪಾಶ್ರಿತ್ಯ ಯೇಽಪಿ ಸ್ಯುಃ ಪಾಪಯೋನಯಃ। ಸ್ತ್ರಿಯೋ ವೈಶ್ಯಾಸ್ತಥಾ ಶೂದ್ರಾಸ್ತೇಽಪಿ ಯಾನ್ತಿ ಪರಾಂ ಗತಿಮ್॥
māṁ hi pārtha vyapāśhritya ye ’pi syuḥ pāpa-yonayaḥ striyo vaiśhyās tathā śhūdrās te ’pi yānti parāṁ gatim
अर्थहे पार्थ ! स्त्री, वैश्य और शूद्र ये जो कोई पापयोनि वाले हों, वे भी मुझ पर आश्रित (मेरे शरण) होकर परम गति को प्राप्त होते हैं।।
ಕಿಂ ಪುನರ್ಬ್ರಾಹ್ಮಣಾಃ ಪುಣ್ಯಾ ಭಕ್ತಾ ರಾಜರ್ಷಯಸ್ತಥಾ। ಅನಿತ್ಯಮಸುಖಂ ಲೋಕಮಿಮಂ ಪ್ರಾಪ್ಯ ಭಜಸ್ವ ಮಾಮ್॥
kiṁ punar brāhmaṇāḥ puṇyā bhaktā rājarṣhayas tathā anityam asukhaṁ lokam imaṁ prāpya bhajasva mām
अर्थफिर क्या कहना है कि पुण्यशील ब्राह्मण और राजर्षि भक्तजन (परम गति को प्राप्त होते हैं); (इसलिए) इस अनित्य और सुखरहित लोक को प्राप्त होकर (अब) तुम भक्तिपूर्वक मेरी ही पूजा करो।।
ಮನ್ಮನಾ ಭವ ಮದ್ಭಕ್ತೋ ಮದ್ಯಾಜೀ ಮಾಂ ನಮಸ್ಕುರು। ಮಾಮೇವೈಷ್ಯಸಿ ಯುಕ್ತ್ವೈವಮಾತ್ಮಾನಂ ಮತ್ಪರಾಯಣಃ॥
man-manā bhava mad-bhakto mad-yājī māṁ namaskuru mām evaiṣhyasi yuktvaivam ātmānaṁ mat-parāyaṇaḥ
अर्थ(तुम) मुझमें स्थिर मन वाले बनो; मेरे भक्त और मेरे पूजन करने वाले बनो; मुझे नमस्कार करो; इस प्रकार मत्परायण (अर्थात् मैं ही जिसका परम लक्ष्य हूँ ऐसे) होकर आत्मा को मुझसे युक्त करके तुम मुझे ही प्राप्त होओगे।।