ವಿಭೂತಿಯೋಗ
Bhagavad Gita Chapter 10 in Kannada
Vibhūti Yog · दिव्य विभूतियाँ · 42 श्लोक
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अध्याय सारांश
भगवद गीता का दसवां अध्याय विभूतियोग है। इस अध्याय में, कृष्ण स्वयं को सभी कारणों के कारण बताते हैं। अर्जुन की भक्ति को बढ़ाने के लिए वे अपने विभिन्न अवतारों और प्रतिष्ठानों का वर्णन करते हैं। अर्जुन पूरी तरह से भगवान के सर्वोच्च पद से आश्वस्त हैं और उन्हें सर्वोच्च व्यक्तित्व के रूप में घोषित करते हैं। वे कृष्ण से प्रार्थना करते हैं कि वे अपनी अन्य दिव्य महिमाओं के बारेमे बताएं जो कि सुनने में अमृत सामान हैं।
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ಶ್ರೀ ಭಗವಾನುವಾಚ ಭೂಯ ಏವ ಮಹಾಬಾಹೋ ಶ್ರೃಣು ಮೇ ಪರಮಂ ವಚಃ। ಯತ್ತೇಽಹಂ ಪ್ರೀಯಮಾಣಾಯ ವಕ್ಷ್ಯಾಮಿ ಹಿತಕಾಮ್ಯಯಾ॥
śhrī bhagavān uvācha bhūya eva mahā-bāho śhṛiṇu me paramaṁ vachaḥ yatte ’haṁ prīyamāṇāya vakṣhyāmi hita-kāmyayā
अर्थश्रीभगवान् ने कहा -- हे महाबाहो ! पुन: तुम मेरे परम वचनों का श्रवण करो, जो मैं तुझ अतिशय प्रेम रखने वाले के लिये हित की इच्छा से कहूँगा।।
ನ ಮೇ ವಿದುಃ ಸುರಗಣಾಃ ಪ್ರಭವಂ ನ ಮಹರ್ಷಯಃ। ಅಹಮಾದಿರ್ಹಿ ದೇವಾನಾಂ ಮಹರ್ಷೀಣಾಂ ಚ ಸರ್ವಶಃ॥
na me viduḥ sura-gaṇāḥ prabhavaṁ na maharṣhayaḥ aham ādir hi devānāṁ maharṣhīṇāṁ cha sarvaśhaḥ
अर्थमेरी उत्पत्ति (प्रभव) को न देवतागण जानते हैं और न महर्षिजन; क्योंकि मैं सब प्रकार से देवताओं और महर्षियों का भी आदिकारण हूँ।।
ಯೋ ಮಾಮಜಮನಾದಿಂ ಚ ವೇತ್ತಿ ಲೋಕಮಹೇಶ್ವರಮ್। ಅಸಮ್ಮೂಢಃ ಸ ಮರ್ತ್ಯೇಷು ಸರ್ವಪಾಪೈಃ ಪ್ರಮುಚ್ಯತೇ॥
yo māmajam anādiṁ cha vetti loka-maheśhvaram asammūḍhaḥ sa martyeṣhu sarva-pāpaiḥ pramuchyate
अर्थजो मुझे अजन्मा, अनादि और लोकों के महान् ईश्वर के रूप में जानता है, र्मत्य मनुष्यों में ऐसा संमोहरहित (ज्ञानी) पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाता है।।
ಬುದ್ಧಿರ್ಜ್ಞಾನಮಸಂಮೋಹಃ ಕ್ಷಮಾ ಸತ್ಯಂ ದಮಃ ಶಮಃ। ಸುಖಂ ದುಃಖಂ ಭವೋಽಭಾವೋ ಭಯಂ ಚಾಭಯಮೇವ ಚ॥
buddhir jñānam asammohaḥ kṣhamā satyaṁ damaḥ śhamaḥ sukhaṁ duḥkhaṁ bhavo ’bhāvo bhayaṁ chābhayameva cha
अर्थबुद्धि, ज्ञान, मोह का अभाव, क्षमा, सत्य, दम (इन्द्रिय संयम), शम (मन: संयम), सुख, दु:ख, जन्म और मृत्यु, भय और अभय।।
ಅಹಿಂಸಾ ಸಮತಾ ತುಷ್ಟಿಸ್ತಪೋ ದಾನಂ ಯಶೋಽಯಶಃ। ಭವನ್ತಿ ಭಾವಾ ಭೂತಾನಾಂ ಮತ್ತ ಏವ ಪೃಥಗ್ವಿಧಾಃ॥
ahiṁsā samatā tuṣṭis tapo dānaṁ yaśo 'yaśaḥ bhavanti bhāvā bhūtānāṁ matta eva pṛthag-vidhāḥ
अर्थअहिंसा, समता, सन्तोष, तप, दान. यश और अपयश ऐसे ये प्राणियों के नानाविध भाव मुझ से ही प्रकट होते हैं।।
ಮಹರ್ಷಯಃ ಸಪ್ತ ಪೂರ್ವೇ ಚತ್ವಾರೋ ಮನವಸ್ತಥಾ। ಮದ್ಭಾವಾ ಮಾನಸಾ ಜಾತಾ ಯೇಷಾಂ ಲೋಕ ಇಮಾಃ ಪ್ರಜಾಃ॥
maharṣhayaḥ sapta pūrve chatvāro manavas tathā mad-bhāvā mānasā jātā yeṣhāṁ loka imāḥ prajāḥ
अर्थसात महर्षिजन, पूर्वकाल के चार (सनकादि) तथा (चौदह) मनु ये मेरे प्रभाव वाले मेरे संकल्प से उत्पन्न हुए हैं, जिनकी संसार (लोक) में यह प्रजा है।।
ಏತಾಂ ವಿಭೂತಿಂ ಯೋಗಂ ಚ ಮಮ ಯೋ ವೇತ್ತಿ ತತ್ತ್ವತಃ। ಸೋಽವಿಕಮ್ಪೇನ ಯೋಗೇನ ಯುಜ್ಯತೇ ನಾತ್ರ ಸಂಶಯಃ॥
etāṁ vibhūtiṁ yogaṁ cha mama yo vetti tattvataḥ so ’vikampena yogena yujyate nātra sanśhayaḥ
अर्थजो पुरुष इस मेरी विभूति और योग को तत्त्व से जानता है, वह पुरुष अविकम्प योग (अर्थात् निश्चल ध्यान योग) से युक्त हो जाता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है।।
ಅಹಂ ಸರ್ವಸ್ಯ ಪ್ರಭವೋ ಮತ್ತಃ ಸರ್ವಂ ಪ್ರವರ್ತತೇ। ಇತಿ ಮತ್ವಾ ಭಜನ್ತೇ ಮಾಂ ಬುಧಾ ಭಾವಸಮನ್ವಿತಾಃ॥
ahaṁ sarvasya prabhavo mattaḥ sarvaṁ pravartate iti matvā bhajante māṁ budhā bhāva-samanvitāḥ
अर्थमैं ही सबका प्रभव स्थान हूँ; मुझसे ही सब (जगत्) विकास को प्राप्त होता है, इस प्रकार जानकर बुधजन भक्ति भाव से युक्त होकर मुझे ही भजते हैं।।
ಮಚ್ಚಿತ್ತಾ ಮದ್ಗತಪ್ರಾಣಾ ಬೋಧಯನ್ತಃ ಪರಸ್ಪರಮ್। ಕಥಯನ್ತಶ್ಚ ಮಾಂ ನಿತ್ಯಂ ತುಷ್ಯನ್ತಿ ಚ ರಮನ್ತಿ ಚ॥
mach-chittā mad-gata-prāṇā bodhayantaḥ parasparam kathayantaśh cha māṁ nityaṁ tuṣhyanti cha ramanti cha
अर्थमुझमें ही चित्त को स्थिर करने वाले और मुझमें ही प्राणों (इन्द्रियों) को अर्पित करने वाले भक्तजन, सदैव परस्पर मेरा बोध कराते हुए, मेरे ही विषय में कथन करते हुए सन्तुष्ट होते हैं और रमते हैं।।
ತೇಷಾಂ ಸತತಯುಕ್ತಾನಾಂ ಭಜತಾಂ ಪ್ರೀತಿಪೂರ್ವಕಮ್। ದದಾಮಿ ಬುದ್ಧಿಯೋಗಂ ತಂ ಯೇನ ಮಾಮುಪಯಾನ್ತಿ ತೇ॥
teṣhāṁ satata-yuktānāṁ bhajatāṁ prīti-pūrvakam dadāmi buddhi-yogaṁ taṁ yena mām upayānti te
अर्थउन (मुझ से) नित्य युक्त हुए और प्रेमपूर्वक मेरा भजन करने वाले भक्तों को, मैं वह 'बुद्धियोग' देता हूँ जिससे वे मुझे प्राप्त होते हैं।।
ತೇಷಾಮೇವಾನುಕಮ್ಪಾರ್ಥಮಹಮಜ್ಞಾನಜಂ ತಮಃ। ನಾಶಯಾಮ್ಯಾತ್ಮಭಾವಸ್ಥೋ ಜ್ಞಾನದೀಪೇನ ಭಾಸ್ವತಾ॥
teṣhām evānukampārtham aham ajñāna-jaṁ tamaḥ nāśhayāmyātma-bhāva-stho jñāna-dīpena bhāsvatā
अर्थउनके ऊपर अनुग्रह करने के लिए मैं उनके अन्त:करण में स्थित होकर, अज्ञानजनित अन्धकार को प्रकाशमय ज्ञान के दीपक द्वारा नष्ट करता हूँ।।
ಅರ್ಜುನ ಉವಾಚ ಪರಂ ಬ್ರಹ್ಮ ಪರಂ ಧಾಮ ಪವಿತ್ರಂ ಪರಮಂ ಭವಾನ್। ಪುರುಷಂ ಶಾಶ್ವತಂ ದಿವ್ಯಮಾದಿದೇವಮಜಂ ವಿಭುಮ್॥
arjuna uvācha paraṁ brahma paraṁ dhāma pavitraṁ paramaṁ bhavān puruṣhaṁ śhāśhvataṁ divyam ādi-devam ajaṁ vibhum
अर्थअर्जुन ने कहा आप -परम ब्रह्म, परम धाम और परम पवित्र हंै; सनातन दिव्य पुरुष, देवों के भी आदि देव, जन्म रहित और सर्वव्यापी हैं।।
ಆಹುಸ್ತ್ವಾಮೃಷಯಃ ಸರ್ವೇ ದೇವರ್ಷಿರ್ನಾರದಸ್ತಥಾ। ಅಸಿತೋ ದೇವಲೋ ವ್ಯಾಸಃ ಸ್ವಯಂ ಚೈವ ಬ್ರವೀಷಿ ಮೇ॥
āhus tvām ṛiṣhayaḥ sarve devarṣhir nāradas tathā asito devalo vyāsaḥ svayaṁ chaiva bravīṣhi me
अर्थऐसा आपको समस्त ऋषिजन कहते हैं; वैसे ही देवर्षि नारद, असित, देवल ऋषि तथा व्यास और स्वयं आप भी मेरे प्रति कहते हैं।।
ಸರ್ವಮೇತದೃತಂ ಮನ್ಯೇ ಯನ್ಮಾಂ ವದಸಿ ಕೇಶವ। ನ ಹಿ ತೇ ಭಗವನ್ ವ್ಯಕ್ಿತಂ ವಿದುರ್ದೇವಾ ನ ದಾನವಾಃ॥
sarvam etad ṛitaṁ manye yan māṁ vadasi keśhava na hi te bhagavan vyaktiṁ vidur devā na dānavāḥ
अर्थहे केशव ! जो कुछ भी आप मेरे प्रति कहते हैं, इस सबको मैं सत्य मानता हूँ। हे भगवन्, आपके (वास्तविक) स्वरूप को न देवता जानते हैं और न दानव।।
ಸ್ವಯಮೇವಾತ್ಮನಾಽತ್ಮಾನಂ ವೇತ್ಥ ತ್ವಂ ಪುರುಷೋತ್ತಮ। ಭೂತಭಾವನ ಭೂತೇಶ ದೇವದೇವ ಜಗತ್ಪತೇ॥
swayam evātmanātmānaṁ vettha tvaṁ puruṣhottama bhūta-bhāvana bhūteśha deva-deva jagat-pate
अर्थहे पुरुषोत्तम ! हे भूतभावन ! हे भूतेश ! हे देवों के देव ! हे जगत् के स्वामी ! आप स्वयं ही अपने आप को जानते हैं।।
ವಕ್ತುಮರ್ಹಸ್ಯಶೇಷೇಣ ದಿವ್ಯಾ ಹ್ಯಾತ್ಮವಿಭೂತಯಃ। ಯಾಭಿರ್ವಿಭೂತಿಭಿರ್ಲೋಕಾನಿಮಾಂಸ್ತ್ವಂ ವ್ಯಾಪ್ಯ ತಿಷ್ಠಸಿ॥
vaktum arhasyaśheṣheṇa divyā hyātma-vibhūtayaḥ yābhir vibhūtibhir lokān imāṁs tvaṁ vyāpya tiṣhṭhasi
अर्थआप ही उन अपनी दिव्य विभूतियों को अशेषत: कहने के लिए योग्य हैं, जिन विभूतियों के द्वारा इन समस्त लोकों को आप व्याप्त करके स्थित हैं।।
ಕಥಂ ವಿದ್ಯಾಮಹಂ ಯೋಗಿಂಸ್ತ್ವಾಂ ಸದಾ ಪರಿಚಿನ್ತಯನ್। ಕೇಷು ಕೇಷು ಚ ಭಾವೇಷು ಚಿನ್ತ್ಯೋಽಸಿ ಭಗವನ್ಮಯಾ॥
kathaṁ vidyām ahaṁ yogins tvāṁ sadā parichintayan keṣhu keṣhu cha bhāveṣhu chintyo ’si bhagavan mayā
अर्थहे योगेश्वर ! मैं किस प्रकार निरन्तर चिन्तन करता हुआ आपको जानूँ, और हे भगवन् ! आप किनकिन भावों में मेरे द्वारा चिन्तन करने योग्य हैं।।
ವಿಸ್ತರೇಣಾತ್ಮನೋ ಯೋಗಂ ವಿಭೂತಿಂ ಚ ಜನಾರ್ದನ। ಭೂಯಃ ಕಥಯ ತೃಪ್ತಿರ್ಹಿ ಶ್ರೃಣ್ವತೋ ನಾಸ್ತಿ ಮೇಽಮೃತಮ್॥
vistareṇātmano yogaṁ vibhūtiṁ cha janārdana bhūyaḥ kathaya tṛiptir hi śhṛiṇvato nāsti me ’mṛitam
अर्थहे जनार्दन ! अपनी योग शक्ति और विभूति को पुन: विस्तारपूर्वक कहिए, क्योंकि आपके अमृतमय वचनों को सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं होती।।
ಶ್ರೀ ಭಗವಾನುವಾಚ ಹನ್ತ ತೇ ಕಥಯಿಷ್ಯಾಮಿ ದಿವ್ಯಾ ಹ್ಯಾತ್ಮವಿಭೂತಯಃ। ಪ್ರಾಧಾನ್ಯತಃ ಕುರುಶ್ರೇಷ್ಠ ನಾಸ್ತ್ಯನ್ತೋ ವಿಸ್ತರಸ್ಯ ಮೇ॥
śhrī bhagavān uvācha hanta te kathayiṣhyāmi divyā hyātma-vibhūtayaḥ prādhānyataḥ kuru-śhreṣhṭha nāstyanto vistarasya me
अर्थश्रीभगवान् ने कहा -हन्त अब मैं तुम्हें अपनी दिव्य विभूतियों को प्रधानता से कहूँगा। हे कुरुश्रेष्ठ मेरे विस्तार का अन्त नहीं है।।
ಅಹಮಾತ್ಮಾ ಗುಡಾಕೇಶ ಸರ್ವಭೂತಾಶಯಸ್ಥಿತಃ। ಅಹಮಾದಿಶ್ಚ ಮಧ್ಯಂ ಚ ಭೂತಾನಾಮನ್ತ ಏವ ಚ॥
aham ātmā guḍākeśha sarva-bhūtāśhaya-sthitaḥ aham ādiśh cha madhyaṁ cha bhūtānām anta eva cha
अर्थहे गुडाकेश (निद्राजित्) ! मैं समस्त भूतों के हृदय में स्थित सबकी आत्मा हूँ तथा सम्पूर्ण भूतों का आदि, मध्य और अन्त भी मैं ही हूँ।।
ಆದಿತ್ಯಾನಾಮಹಂ ವಿಷ್ಣುರ್ಜ್ಯೋತಿಷಾಂ ರವಿರಂಶುಮಾನ್। ಮರೀಚಿರ್ಮರುತಾಮಸ್ಮಿ ನಕ್ಷತ್ರಾಣಾಮಹಂ ಶಶೀ॥
ādityānām ahaṁ viṣhṇur jyotiṣhāṁ ravir anśhumān marīchir marutām asmi nakṣhatrāṇām ahaṁ śhaśhī
अर्थमैं (बारह) आदित्यों में विष्णु और ज्योतियों में अंशुमान् सूर्य हूँ; मैं (उनचास) मरुतों (वायु देवताओं) में मरीचि हूँ और नक्षत्रों में शशी (चन्द्रमा) हूँ।।
ವೇದಾನಾಂ ಸಾಮವೇದೋಽಸ್ಮಿ ದೇವಾನಾಮಸ್ಮಿ ವಾಸವಃ। ಇನ್ದ್ರಿಯಾಣಾಂ ಮನಶ್ಚಾಸ್ಮಿ ಭೂತಾನಾಮಸ್ಮಿ ಚೇತನಾ॥
vedānāṁ sāma-vedo ’smi devānām asmi vāsavaḥ indriyāṇāṁ manaśh chāsmi bhūtānām asmi chetanā
अर्थमैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में वासव (इन्द्र) हूँ; मैं इन्द्रियों में मन और भूतप्राणियों में चेतना (ज्ञानशक्ति) हूँ।।
ರುದ್ರಾಣಾಂ ಶಙ್ಕರಶ್ಚಾಸ್ಮಿ ವಿತ್ತೇಶೋ ಯಕ್ಷರಕ್ಷಸಾಮ್। ವಸೂನಾಂ ಪಾವಕಶ್ಚಾಸ್ಮಿ ಮೇರುಃ ಶಿಖರಿಣಾಮಹಮ್॥
rudrāṇāṁ śhaṅkaraśh chāsmi vitteśho yakṣha-rakṣhasām vasūnāṁ pāvakaśh chāsmi meruḥ śhikhariṇām aham
अर्थमैं (ग्यारह) रुद्रों में शंकर हूँ और यक्ष तथा राक्षसों में धनपति कुबेर (वित्तेश) हूँ; (आठ) वसुओं में अग्नि हूँ तथा शिखर वाले पर्वतों में मेरु हूँ।।
ಪುರೋಧಸಾಂ ಚ ಮುಖ್ಯಂ ಮಾಂ ವಿದ್ಧಿ ಪಾರ್ಥ ಬೃಹಸ್ಪತಿಮ್। ಸೇನಾನೀನಾಮಹಂ ಸ್ಕನ್ದಃ ಸರಸಾಮಸ್ಮಿ ಸಾಗರಃ॥
purodhasāṁ cha mukhyaṁ māṁ viddhi pārtha bṛihaspatim senānīnām ahaṁ skandaḥ sarasām asmi sāgaraḥ
अर्थहे पार्थ ! पुरोहितों में मुझे बृहस्पति जानो; मैं सेनापतियों में स्कन्द और जलाशयों में समुद्र हूँ।।
ಮಹರ್ಷೀಣಾಂ ಭೃಗುರಹಂ ಗಿರಾಮಸ್ಮ್ಯೇಕಮಕ್ಷರಮ್। ಯಜ್ಞಾನಾಂ ಜಪಯಜ್ಞೋಽಸ್ಮಿ ಸ್ಥಾವರಾಣಾಂ ಹಿಮಾಲಯಃ॥
maharṣhīṇāṁ bhṛigur ahaṁ girām asmyekam akṣharam yajñānāṁ japa-yajño ’smi sthāvarāṇāṁ himālayaḥ
अर्थमैं महर्षियों में भृगु और वाणी (शब्दों) में एकाक्षर ओंकार हूँ। मैं यज्ञों में जपयज्ञ और स्थावरों (अचलों) में हिमालय हूँ।।
ಅಶ್ವತ್ಥಃ ಸರ್ವವೃಕ್ಷಾಣಾಂ ದೇವರ್ಷೀಣಾಂ ಚ ನಾರದಃ। ಗನ್ಧರ್ವಾಣಾಂ ಚಿತ್ರರಥಃ ಸಿದ್ಧಾನಾಂ ಕಪಿಲೋ ಮುನಿಃ॥
aśhvatthaḥ sarva-vṛikṣhāṇāṁ devarṣhīṇāṁ cha nāradaḥ gandharvāṇāṁ chitrarathaḥ siddhānāṁ kapilo muniḥ
अर्थमैं समस्त वृक्षों में अश्वत्थ (पीपल) हूँ और देवर्षियों में नारद हूँ; मैं गन्धर्वों में चित्ररथ और सिद्ध पुरुषों में कपिल मुनि हूँ।।
ಉಚ್ಚೈಃಶ್ರವಸಮಶ್ವಾನಾಂ ವಿದ್ಧಿ ಮಾಮಮೃತೋದ್ಭವಮ್। ಐರಾವತಂ ಗಜೇನ್ದ್ರಾಣಾಂ ನರಾಣಾಂ ಚ ನರಾಧಿಪಮ್॥
uchchaiḥśhravasam aśhvānāṁ viddhi mām amṛitodbhavam airāvataṁ gajendrāṇāṁ narāṇāṁ cha narādhipam
अर्थअश्वों में अमृत से उत्पन्न हुए उच्चैश्रवा नामक अश्व, हाथियों में ऐरावत और मनुष्यों में राजा मुझे ही जानो।।
ಆಯುಧಾನಾಮಹಂ ವಜ್ರಂ ಧೇನೂನಾಮಸ್ಮಿ ಕಾಮಧುಕ್। ಪ್ರಜನಶ್ಚಾಸ್ಮಿ ಕನ್ದರ್ಪಃ ಸರ್ಪಾಣಾಮಸ್ಮಿ ವಾಸುಕಿಃ॥
āyudhānām ahaṁ vajraṁ dhenūnām asmi kāmadhuk prajanaśh chāsmi kandarpaḥ sarpāṇām asmi vāsukiḥ
अर्थमैं शस्त्रों में वज्र और धेनुओं (गायों) में कामधेनु हूँ, प्रजा उत्पत्ति का हेतु कन्दर्प (कामदेव) मैं हूँ और सर्पों में वासुकि हूँ।।
ಅನನ್ತಶ್ಚಾಸ್ಮಿ ನಾಗಾನಾಂ ವರುಣೋ ಯಾದಸಾಮಹಮ್। ಪಿತೃ़ಣಾಮರ್ಯಮಾ ಚಾಸ್ಮಿ ಯಮಃ ಸಂಯಮತಾಮಹಮ್॥
anantaśh chāsmi nāgānāṁ varuṇo yādasām aham pitṝīṇām aryamā chāsmi yamaḥ sanyamatām aham
अर्थमैं नागों में अनन्त (शेषनाग) हूँ और जल देवताओं में वरुण हूँ; मैं पितरों में अर्यमा हँ और नियमन करने वालों में यम हूँ।।
ಪ್ರಹ್ಲಾದಶ್ಚಾಸ್ಮಿ ದೈತ್ಯಾನಾಂ ಕಾಲಃ ಕಲಯತಾಮಹಮ್। ಮೃಗಾಣಾಂ ಚ ಮೃಗೇನ್ದ್ರೋಽಹಂ ವೈನತೇಯಶ್ಚ ಪಕ್ಷಿಣಾಮ್॥
prahlādaśh chāsmi daityānāṁ kālaḥ kalayatām aham mṛigāṇāṁ cha mṛigendro ’haṁ vainateyaśh cha pakṣhiṇām
अर्थमैं दैत्यों में प्रह्लाद और गणना करने वालों में काल हूँ, मैं 'पशुओं' में सिंह (मृगेन्द्र) और पक्षियों में गरुड़ हूँ।।
ಪವನಃ ಪವತಾಮಸ್ಮಿ ರಾಮಃ ಶಸ್ತ್ರಭೃತಾಮಹಮ್। ಝಷಾಣಾಂ ಮಕರಶ್ಚಾಸ್ಮಿ ಸ್ರೋತಸಾಮಸ್ಮಿ ಜಾಹ್ನವೀ॥
pavanaḥ pavatām asmi rāmaḥ śhastra-bhṛitām aham jhaṣhāṇāṁ makaraśh chāsmi srotasām asmi jāhnavī
अर्थमैं पवित्र करने वालों में वायु हूँ और शस्त्रधारियों में राम हूँ; तथा मत्स्यों (जलचरों) में मैं मगरमच्छ और नदियों में मैं गंगा हूँ।।
ಸರ್ಗಾಣಾಮಾದಿರನ್ತಶ್ಚ ಮಧ್ಯಂ ಚೈವಾಹಮರ್ಜುನ। ಅಧ್ಯಾತ್ಮವಿದ್ಯಾ ವಿದ್ಯಾನಾಂ ವಾದಃ ಪ್ರವದತಾಮಹಮ್॥
sargāṇām ādir antaśh cha madhyaṁ chaivāham arjuna adhyātma-vidyā vidyānāṁ vādaḥ pravadatām aham
अर्थहे अर्जुन ! सृष्टियों का आदि, अन्त और मध्य भी मैं ही हूँ, मैं विद्याओं में अध्यात्मविद्या और विवाद करने वालों में (अर्थात् विवाद के प्रकारों में) मैं वाद हूँ।।
ಅಕ್ಷರಾಣಾಮಕಾರೋಽಸ್ಮಿ ದ್ವನ್ದ್ವಃ ಸಾಮಾಸಿಕಸ್ಯ ಚ। ಅಹಮೇವಾಕ್ಷಯಃ ಕಾಲೋ ಧಾತಾಽಹಂ ವಿಶ್ವತೋಮುಖಃ॥
अहमेवाक्षय: कालो धाताहं विश्वतोमुख: || 33|| akṣharāṇām a-kāro ’smi dvandvaḥ sāmāsikasya cha aham evākṣhayaḥ kālo dhātāhaṁ viśhvato-mukhaḥ
अर्थमैं अक्षरों (वर्णमाला) में अकार और समासों में द्वन्द्व (नामक समास) हूँ; मैं अक्षय काल और विश्वतोमुख (विराट् स्वरूप) धाता हूँ।।
ಮೃತ್ಯುಃ ಸರ್ವಹರಶ್ಚಾಹಮುದ್ಭವಶ್ಚ ಭವಿಷ್ಯತಾಮ್। ಕೀರ್ತಿಃ ಶ್ರೀರ್ವಾಕ್ಚ ನಾರೀಣಾಂ ಸ್ಮೃತಿರ್ಮೇಧಾ ಧೃತಿಃ ಕ್ಷಮಾ॥
mṛityuḥ sarva-haraśh chāham udbhavaśh cha bhaviṣhyatām kīrtiḥ śhrīr vāk cha nārīṇāṁ smṛitir medhā dhṛitiḥ kṣhamā
अर्थमैं सर्वभक्षक मृत्यु और भविष्य में होने वालों की उत्पत्ति का कारण हूँ; स्त्रियों में कीर्ति, श्री, वाक (वाणी), स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ।।
ಬೃಹತ್ಸಾಮ ತಥಾ ಸಾಮ್ನಾಂ ಗಾಯತ್ರೀ ಛನ್ದಸಾಮಹಮ್। ಮಾಸಾನಾಂ ಮಾರ್ಗಶೀರ್ಷೋಽಹಮೃತೂನಾಂ ಕುಸುಮಾಕರಃ॥
bṛihat-sāma tathā sāmnāṁ gāyatrī chhandasām aham māsānāṁ mārga-śhīrṣho ’ham ṛitūnāṁ kusumākaraḥ
अर्थसामों (गेय मन्त्रों) में मैं बृहत्साम और छन्दों में गायत्री छन्द हूँ; मैं मासों में मार्गशीर्ष (दिसम्बरजनवरी के भाग) और ऋतुओं में वसन्त हूँ।।
ದ್ಯೂತಂ ಛಲಯತಾಮಸ್ಮಿ ತೇಜಸ್ತೇಜಸ್ವಿನಾಮಹಮ್। ಜಯೋಽಸ್ಮಿ ವ್ಯವಸಾಯೋಽಸ್ಮಿ ಸತ್ತ್ವಂ ಸತ್ತ್ವವತಾಮಹಮ್॥
dyūtaṁ chhalayatām asmi tejas tejasvinām aham jayo ’smi vyavasāyo ’smi sattvaṁ sattvavatām aham
अर्थमैं छल करने वालों में द्यूत हूँ और तेजस्वियों में तेज हूँ, मैं विजय हूँ; मैं व्यवसाय (उद्यमशीलता) हूँ और सात्विक पुरुषों का सात्विक भाव हूँ।।
ವೃಷ್ಣೀನಾಂ ವಾಸುದೇವೋಽಸ್ಮಿ ಪಾಣ್ಡವಾನಾಂ ಧನಂಜಯಃ। ಮುನೀನಾಮಪ್ಯಹಂ ವ್ಯಾಸಃ ಕವೀನಾಮುಶನಾ ಕವಿಃ॥
vṛiṣhṇīnāṁ vāsudevo ’smi pāṇḍavānāṁ dhanañjayaḥ munīnām apyahaṁ vyāsaḥ kavīnām uśhanā kaviḥ
अर्थमैं वृष्णियों में वासुदेव हूँ और पाण्डवों में धनंजय, मैं मुनियों में व्यास और कवियों में उशना कवि हूँ।।
ದಣ್ಡೋ ದಮಯತಾಮಸ್ಮಿ ನೀತಿರಸ್ಮಿ ಜಿಗೀಷತಾಮ್। ಮೌನಂ ಚೈವಾಸ್ಮಿ ಗುಹ್ಯಾನಾಂ ಜ್ಞಾನಂ ಜ್ಞಾನವತಾಮಹಮ್॥
daṇḍo damayatām asmi nītir asmi jigīṣhatām maunaṁ chaivāsmi guhyānāṁ jñānaṁ jñānavatām aham
अर्थमैं दमन करने वालों का दण्ड हूँ और विजयेच्छुओं की नीति हूँ; मैं गुह्यों में मौन हूँ और ज्ञानवानों का ज्ञान हूँ।।
ಯಚ್ಚಾಪಿ ಸರ್ವಭೂತಾನಾಂ ಬೀಜಂ ತದಹಮರ್ಜುನ। ನ ತದಸ್ತಿ ವಿನಾ ಯತ್ಸ್ಯಾನ್ಮಯಾ ಭೂತಂ ಚರಾಚರಮ್॥
yach chāpi sarva-bhūtānāṁ bījaṁ tad aham arjuna na tad asti vinā yat syān mayā bhūtaṁ charācharam
अर्थहे अर्जुन ! जो समस्त भूतों की उत्पत्ति का बीज (कारण) है, वह भी में ही हूँ, क्योंकि ऐसा कोई चर और अचर भूत नहीं है, जो मुझसे रहित है।।
ನಾನ್ತೋಽಸ್ತಿ ಮಮ ದಿವ್ಯಾನಾಂ ವಿಭೂತೀನಾಂ ಪರಂತಪ। ಏಷ ತೂದ್ದೇಶತಃ ಪ್ರೋಕ್ತೋ ವಿಭೂತೇರ್ವಿಸ್ತರೋ ಮಯಾ॥
nānto ’sti mama divyānāṁ vibhūtīnāṁ parantapa eṣha tūddeśhataḥ prokto vibhūter vistaro mayā
अर्थहे परन्तप ! मेरी दिव्य विभूतियों का अन्त नहीं है; अपनी विभूतियों का यह विस्तार मैंने एक देश से अर्थात् संक्षेप में कहा है।।
ಯದ್ಯದ್ವಿಭೂತಿಮತ್ಸತ್ತ್ವಂ ಶ್ರೀಮದೂರ್ಜಿತಮೇವ ವಾ। ತತ್ತದೇವಾವಗಚ್ಛ ತ್ವಂ ಮಮ ತೇಜೋಂಽಶಸಂಭವಮ್॥
yad yad vibhūtimat sattvaṁ śhrīmad ūrjitam eva vā tat tad evāvagachchha tvaṁ mama tejo ’nśha-sambhavam
अर्थजो कोई भी विभूतियुक्त, कान्तियुक्त अथवा शक्तियुक्त वस्तु (या प्राणी) है, उसको तुम मेरे तेज के अंश से ही उत्पन्न हुई जानो।।
ಅಥವಾ ಬಹುನೈತೇನ ಕಿಂ ಜ್ಞಾತೇನ ತವಾರ್ಜುನ। ವಿಷ್ಟಭ್ಯಾಹಮಿದಂ ಕೃತ್ಸ್ನಮೇಕಾಂಶೇನ ಸ್ಥಿತೋ ಜಗತ್॥
atha vā bahunaitena kiṁ jñātena tavārjuna viṣhṭabhyāham idaṁ kṛitsnam ekānśhena sthito jagat
अर्थअथवा हे अर्जुन ! बहुत जानने से तुम्हारा क्या प्रयोजन है? मैं इस सम्पूर्ण जगत् को अपने एक अंश मात्र से धारण करके स्थित हूँ।।