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अच्युतानन्तगोविन्द

🕉️ hindu·📿 108× जप·🕐 प्रातः और सायं, अथवा अस्वस्थ व्यक्ति की शय्या के पास; रोग अथवा स्वास्थ्य-लाभ के समय।·📜 Traditional Vaishnava nama-mahima verse (recited in the Vishnu-smarana / Sahasranama tradition)

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अर्थ

अच्युतानन्तगोविन्द एक प्रसिद्ध एक-श्लोकीय आरोग्य मंत्र है, जो घोषित करता है कि भगवान के तीन पवित्र नामों — अच्युत, अनन्त और गोविन्द — का उच्चारण औषधि बनकर समस्त रोगों का नाश करता है। कवि बल देकर 'सत्यं सत्यम्' कहता है। रोगी तथा उनके शुभचिंतक तन-मन के स्वास्थ्य-लाभ की प्रार्थना के रूप में इसे जपते हैं।

उत्पत्ति और कथा

Traditional Vaishnava nama-mahima verse (recited in the Vishnu-smarana / Sahasranama tradition) · Traditional · Puranic / classical

वैष्णव परम्परा में पवित्र नाम की महिमा (नाम-महिमा) का गुणगान करने वाले श्लोकों में, यह छोटा श्लोक आरोग्य के प्रयोजन हेतु सर्वाधिक प्रसिद्ध है। यह पुराणों में बार-बार दोहराए गए उस विश्वास को सार रूप में प्रकट करता है कि भगवान के नाम सामान्य ध्वनि नहीं, अपितु स्वयं भगवान का सामर्थ्य धारण करते हैं। नामों को 'भेषज' (औषधि) कहकर और दो बार सत्य की शपथ लेकर, यह श्लोक पीड़ितों को शुद्ध श्रद्धा की औषधि प्रदान करता है। इसे प्रायः रोगशय्या के पास और स्वास्थ्य-लाभ के समय जपा जाता है।

शास्त्रों में वर्णित

भक्त बताते हैं कि जब सामान्य उपचार विफल हो गए, तब रोगशय्या के पास 'अच्युतानन्त गोविन्द' का बार-बार जप करने से शान्ति, सुखद निद्रा और क्रमशः स्वास्थ्य-लाभ हुआ — ऋषि की दो बार ली गई 'सत्यं सत्यम्' की शपथ इस वचन के रूप में स्थिर है कि पवित्र नाम उस पर कभी विफल नहीं होता जो उस पर विश्वास करता है।

मंत्र

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अच्युतानन्तगोविन्द नामोच्चारणभेषजात्। नश्यन्ति सकला रोगाः सत्यं सत्यं वदाम्यहम्॥

Acyutānanta-govinda nāmoccāraṇa-bheṣajāt. naśyanti sakalā rogāḥ satyaṃ satyaṃ vadāmy aham.

अर्थ:अच्युत, अनन्त और गोविन्द — इन नामों के उच्चारण रूपी औषधि से समस्त रोग नष्ट हो जाते हैं; यह सत्य है, सत्य है, ऐसा मैं कहता हूँ।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

अच्युत🔊acyutaअच्युत — अविनाशी, जो अपने स्वरूप से कभी च्युत नहीं होते (विष्णु)
अनन्त🔊anantaअनन्त — अन्तरहित, असीम
गोविन्द🔊govindaगोविन्द — गौओं तथा इन्द्रियों के रक्षक, श्रीकृष्ण
नाम🔊nāmaनाम — (पवित्र) नाम
उच्चारण🔊uccāraṇaउच्चारण — उच्चारण, उच्चार
भेषजात्🔊bheṣajātऔषधि से (की)
नश्यन्ति🔊naśyantiनष्ट हो जाते हैं, विनष्ट हो जाते हैं
सकलाः🔊sakalāḥसमस्त, सब प्रकार के
रोगाः🔊rogāḥरोग, व्याधियाँ
सत्यं सत्यं🔊satyaṃ satyaṃसत्य है, सत्य है (यह सत्य है, यह सत्य है)
वदामि अहम्🔊vadāmi ahamमैं कहता हूँ, मैं घोषणा करता हूँ

अच्युतानन्तगोविन्द पाठ के लाभ

शारीरिक तथा मानसिक रोग से मुक्ति की कामना से परम्परागत रूप से जपा जाता है।

पुष्टि करता है कि पवित्र नाम स्वयं दिव्य औषधि (नाम-औषध) के रूप में कार्य करते हैं।

रोगी और उनके परिवार को सान्त्वना, आशा और श्रद्धा प्रदान करता है।

विष्णु का उनके अविनाशी (अच्युत), अनन्त (अनन्त) और रक्षक (गोविन्द) रूपों में आवाहन करता है।

सरल और सहजता से दोहराने योग्य, दुर्बल या शय्याग्रस्त व्यक्ति के लिए भी।

इस विश्वास को दृढ़ करता है कि भगवान की शरण तन और आत्मा दोनों को स्वस्थ करती है।

रोगी को देने से पूर्व जल या औषधि पर अभिमंत्रित कर इसे जपा जा सकता है।

अच्युतानन्तगोविन्द जप विधि

जप संख्या108बार
उत्तम समयप्रातः और सायं, अथवा अस्वस्थ व्यक्ति की शय्या के पास; रोग अथवा स्वास्थ्य-लाभ के समय।

श्रद्धापूर्वक श्लोक को दोहराएँ, तीनों नामों — अच्युत, अनन्त और गोविन्द — को आरोग्यप्रद औषधि के रूप में ध्यान में रखते हुए। इसे रोगी के लिए १०८ बार जपा जा सकता है, अथवा रोगी की शय्या के पास धीरे-धीरे पाठ किया जा सकता है। कुछ लोग इस जप से अभिमंत्रित जल का छिड़काव करते या रोगी को पिलाते हैं। 'सत्यं सत्यं वदाम्यहम्' पर बल ऋषि का दृढ़ आश्वासन है — उसी विश्वास के साथ इसे जपें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह एक परम्परागत आरोग्य-प्रार्थना है। श्लोक कहता है कि भगवान के नाम अच्युत, अनन्त और गोविन्द का उच्चारण स्वयं एक औषधि है जो समस्त रोगों का नाश करती है, इसलिए इसे स्वास्थ्य और रोग-निवृत्ति हेतु जपा जाता है।
अच्युत का अर्थ है 'अविनाशी, जो कभी च्युत नहीं होते'; अनन्त का अर्थ है 'अन्तरहित, असीम'; गोविन्द का अर्थ है 'गौओं तथा इन्द्रियों के रक्षक' — ये सभी भगवान विष्णु / श्रीकृष्ण के सुप्रसिद्ध नाम हैं।
परम्परा से इसे सामान्य उपचार के साथ जपा जाता है, उसके स्थान पर नहीं। यह एक भक्तिपूर्ण प्रार्थना है जो रोग के समय श्रद्धा, मन की शान्ति और भगवान की कृपा प्रदान करती है तथा स्वास्थ्य-लाभ में सहायक होती है।
इसे कोई भी जप सकता है — रोगी, परिवारजन अथवा शुभचिंतक। इसके लिए किसी औपचारिक दीक्षा की आवश्यकता नहीं, और यह इसी कारण मूल्यवान है कि छोटा और भक्तिपूर्वक दोहराने में सरल है।

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