श्रीमद्भगवद्गीता १२.६-७ — ये तु सर्वाणि कर्माणि — Word-by-Word Meaning
श्रीमद्भगवद्गीता १२.६-७ — ये तु सर्वाणि कर्माणि
Every Sanskrit word explained in English
Word-by-Word Breakdown
ये
ye
जो
तु
tu
परन्तु; निश्चय ही
सर्वाणि कर्माणि
sarvāṇi karmāṇi
समस्त कर्म
मयि
mayi
मुझमें
संन्यस्य
sannyasya
अर्पण करके; न्यास करके
मत्-पराः
mat-paraḥ
मुझे ही परम लक्ष्य माननेवाले
अनन्येन एव योगेन
ananyena eva yogena
अनन्य योग के द्वारा
माम्
mām
मेरा
ध्यायन्तः
dhyāyantaḥ
ध्यान करते हुए
उपासते
upāsate
उपासना करते हैं
तेषाम्
teṣhām
उनका
अहम्
aham
मैं
समुद्धर्ता
samuddhartā
उद्धारकर्ता; रक्षक
मृत्यु-संसार-सागरात्
mṛityu-saṁsāra-sāgarāt
मृत्युरूप संसार-सागर से
भवामि
bhavāmi
मैं होता हूँ
न चिरात्
na chirāt
शीघ्र ही; अति शीघ्र
पार्थ
pārtha
हे पार्थ (अर्जुन)
मयि आवेशित-चेतसाम्
mayi āveśhita-chetasām
जिनका चित्त मुझमें स्थिर है, उनका
Complete Translation
परन्तु जो भक्तजन मुझे ही परम लक्ष्य समझते हुए सब कर्मों को मुझे अर्पण करके अनन्य योग के द्वारा मेरा ही ध्यान करते और उपासना करते हैं — हे पार्थ! जिनका चित्त मुझमें ही स्थिर है, ऐसे भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्युरूप संसार-सागर से उद्धार करने वाला होता हूँ।।
Origin & History
Source: Bhagavad Gita Chapter 12, Verse 6-7
Author: Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva)
Period: Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
बारहवें अध्याय, भक्ति योग, में अर्जुन पूछते हैं कि साकार ईश्वर के उपासक अधिक योगयुक्त हैं अथवा निराकार ब्रह्म के। श्रीकृष्ण अपने साकार स्वरूप की प्रेममयी भक्ति की प्रशंसा करते हैं, और इन श्लोकों में अपना कोमल वचन देते हैं: जो सब कुछ उन्हें अर्पित करते हैं और अनन्य भक्ति से उनका ध्यान करते हैं, उनके वे स्वयं मर्त्य संसार-सागर से शीघ्र उद्धारकर्ता बनते हैं।
Frequently Asked Questions
भगवद्गीता 12.6-7 की मुख्य शिक्षा क्या है?▼
श्रीकृष्ण प्रतिज्ञा करते हैं कि जो अपने समस्त कर्म उन्हें समर्पित करते हैं, उन्हें परम लक्ष्य मानते हैं, और अनन्य भक्ति एवं ध्यान से उनकी उपासना करते हैं, उनका वे स्वयं उद्धार करेंगे — उन्हें जन्म-मृत्यु के सागर से शीघ्र पार उतार देंगे। यह गीता का यह आश्वासन है कि प्रेममयी शरणागति मोक्ष की ओर ले जाती है।
'मृत्युरूप संसार-सागर' (मृत्यु-संसार-सागर) का क्या अर्थ है?▼
यह संसार का एक सजीव चित्र है — बार-बार जन्म, मृत्यु और सांसारिक दुःख का अनन्त, उद्वेलित चक्र जिसमें जीव डोलते रहते हैं। श्रीकृष्ण 'समुद्धर्ता', उद्धारकर्ता बनने की प्रतिज्ञा करते हैं, जो अपने भक्तों को इस सागर से उबारकर मोक्ष प्रदान करते हैं।
यह श्लोक किस प्रकार की भक्ति का वर्णन करता है?▼
अनन्य भक्ति — एकनिष्ठ, अविभाजित भक्ति। भक्त अपने समस्त कर्म भगवान को अर्पित करता है, उन्हें परम लक्ष्य मानता है, एकाग्र मन से उनका ध्यान करता है, और मन को पूर्णतः उनमें स्थिर करता है। ऐसे अविचल प्रेम का उत्तर भगवान शीघ्र और निश्चित कृपा से देते हैं।
श्रीकृष्ण द्वारा प्रतिज्ञात उद्धार मैं कैसे प्राप्त करूँ?▼
अपने कर्मों को भगवान को समर्पित करके, उन्हें अपना परम लक्ष्य बनाकर, और एकाग्र, प्रेममय हृदय से उनकी उपासना करके। ये श्लोक आश्वासन देते हैं कि ऐसी एकनिष्ठ भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती — भगवान स्वयं वह रक्षक बनते हैं जो भक्त को संसार से पार ले जाते हैं।
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