श्रीमद्भगवद्गीता १२.६-७ — ये तु सर्वाणि कर्माणि
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✦ अर्थ
भक्ति योग अध्याय के ये दो श्लोक गीता के सबसे आश्वस्तकारी वचनों में से एक हैं। जो भक्त अपने समस्त कर्म श्रीकृष्ण को अर्पित करते हैं, उन्हें परम लक्ष्य मानते हैं, और अनन्य भक्ति एवं ध्यान से उनकी उपासना करते हैं, उनका स्वयं भगवान उद्धारकर्ता बनने की प्रतिज्ञा करते हैं — उन्हें जन्म-मृत्यु के भयंकर संसार-सागर से शीघ्र ही पार उतार देते हैं। प्रेमपूर्ण, एकनिष्ठ शरणागति को ईश्वर की व्यक्तिगत कृपा और मोक्ष का वरदान प्राप्त होता है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 12, Verse 6-7 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
बारहवें अध्याय, भक्ति योग, में अर्जुन पूछते हैं कि साकार ईश्वर के उपासक अधिक योगयुक्त हैं अथवा निराकार ब्रह्म के। श्रीकृष्ण अपने साकार स्वरूप की प्रेममयी भक्ति की प्रशंसा करते हैं, और इन श्लोकों में अपना कोमल वचन देते हैं: जो सब कुछ उन्हें अर्पित करते हैं और अनन्य भक्ति से उनका ध्यान करते हैं, उनके वे स्वयं मर्त्य संसार-सागर से शीघ्र उद्धारकर्ता बनते हैं।
✦ शास्त्रों में वर्णित
युगों-युगों से भक्तों ने अपने सबसे अंधकारमय क्षणों में इस प्रतिज्ञा को थामे रखा है, और परम्परा ऐसे भक्तों के वृत्तान्तों से भरी है जिन्होंने सब कुछ भगवान को समर्पित करके स्वयं को मानो किसी अदृश्य हाथ से निराशा और संकट से उठा लिया गया अनुभव किया — संत साक्षी देते हैं कि जहाँ हृदय पूर्णतः भगवान में स्थिर है, वहाँ वे संसार-सागर के उद्धारकर्ता के रूप में अपना वचन निभाते हैं।
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ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः। अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते॥
ye tu sarvāṇi karmāṇi mayi sannyasya mat-paraḥ ananyenaiva yogena māṁ dhyāyanta upāsate
अर्थ:परन्तु जो भक्तजन मुझे ही परम लक्ष्य समझते हुए सब कर्मों को मुझे अर्पण करके अनन्य योग के द्वारा मेरा ही ध्यान करते और उपासना करते हैं — हे पार्थ! जिनका चित्त मुझमें ही स्थिर है, ऐसे भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्युरूप संसार-सागर से उद्धार करने वाला होता हूँ।।
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्। भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्॥
teṣhām ahaṁ samuddhartā mṛityu-saṁsāra-sāgarāt bhavāmi na chirāt pārtha mayy āveśhita-chetasām
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता १२.६-७ — ये तु सर्वाणि कर्माणि पाठ के लाभ
भक्त को संसार से भगवान के व्यक्तिगत उद्धार का आश्वासन देता है
अनन्य भक्ति को मुक्ति के शीघ्र मार्ग के रूप में प्रकट करता है
समस्त कर्मों को भगवान को उपासना रूप में अर्पित करने की प्रेरणा देता है
भगवान को रक्षक मानकर साहस और सुरक्षा प्रदान करता है
एकाग्र ध्यान और मन को भगवान में स्थिर करने को गहरा करता है
कर्मफलों के पूर्ण समर्पण से शांति लाता है
श्रीमद्भगवद्गीता १२.६-७ — ये तु सर्वाणि कर्माणि जप विधि
इन श्लोकों को प्रेममयी भक्ति से पढ़ें, अपने समस्त कर्म भगवान को अर्पित करते हुए और मन को उन्हें परम लक्ष्य रूप में स्थिर करते हुए। उद्धार की प्रतिज्ञा को अपने भीतर विश्वास और शरणागति से भर जाने दें। एकाग्र हृदय से नियमित जप करने पर ये अनन्य भक्ति और इस शांत विश्वास का पोषण करते हैं कि भगवान स्वयं अपने भक्तों को संसार-सागर से पार उतारते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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