Mantra.Tips

एकैवाहं जगत्यत्र (देवी की अद्वैत घोषणा) — Word-by-Word Meaning

एकैवाहं जगत्यत्र (देवी की अद्वैत घोषणा)

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

देव्युवाच
devyuvāca
देवी (भगवती) बोलीं
एका एव अहम् जगति अत्र
ekā eva aham jagati atra
इस जगत् में मैं अकेली ही हूँ
द्वितीया का मम अपरा
dvitīyā kā mama aparā
मेरे अतिरिक्त दूसरी कौन है?
पश्य एताः दुष्ट
paśya etāḥ duṣṭa
अरे दुष्ट! इन्हें देख
मयि एव विशन्त्यः मद्विभूतयः
mayi eva viśantyaḥ mad-vibhūtayaḥ
मुझ में ही प्रवेश करती हुई मेरी विभूतियाँ
ततः समस्ताः ताः देव्यः
tataḥ samastāḥ tāḥ devyaḥ
तब वे समस्त देवियाँ
ब्रह्माणीप्रमुखाः
brahmāṇī-pramukhāḥ
ब्राह्मणी आदि (मातृकाएँ)
लयम् तस्याः देव्याः तनौ जग्मुः
layam tasyāḥ devyāḥ tanau jagmuḥ
उस देवी के शरीर में लीन हो गईं
एका एव आसीत् तदा अम्बिका
ekā eva āsīt tadā ambikā
तब अकेली अम्बिका ही शेष रहीं
अहम् विभूत्या बहुभिः रूपैः
aham vibhūtyā bahubhiḥ rūpaiḥ
मैं अपनी विभूति (शक्ति) से अनेक रूपों में
इह यत् आस्थिता
iha yat āsthitā
यहाँ जिन रूपों में स्थित थी
तत् संहृतं मया
tat saṃhṛtaṃ mayā
उन्हें मैंने समेट लिया है
एका एव तिष्ठामि आजौ
ekā eva tiṣṭhāmi ājau
मैं युद्ध में अकेली ही खड़ी हूँ
स्थिरः भव
sthiraḥ bhava
तू स्थिर हो जा (युद्ध के लिए दृढ़ हो जा)!

Complete Translation

देवी बोलीं — 'इस जगत् में मैं अकेली ही हूँ; मेरे अतिरिक्त दूसरी कौन है? अरे दुष्ट! देख, ये मेरी विभूतियाँ मुझ में ही प्रवेश कर रही हैं!' तब ब्राह्मणी आदि वे समस्त देवियाँ उस देवी के शरीर में लीन हो गईं; तब अकेली अम्बिका ही शेष रहीं। देवी बोलीं — 'अपनी विभूति से जिन अनेक रूपों में मैं यहाँ स्थित थी, उन्हें मैंने समेट लिया है, और अब अकेली ही खड़ी हूँ। तू (युद्ध में) स्थिर हो जा!'

Origin & History

Source: Durga Saptashati Chapter 10

Author: Sage Markandeya (Markandeya Purana)

Period: c. 400–600 CE (Markandeya Purana)

निशुम्भ के वध के पश्चात्, उसका भाई शुम्भ शोक एवं क्रोध में देवी पर आरोप लगाता है कि वे केवल मातृका-शक्तियों की सहायता से युद्ध कर रही हैं। देवी घोषणा करती हैं कि वे ही अकेली विद्यमान हैं और मातृकाएँ उन्हीं की विभूतियाँ हैं; तत्पश्चात् वे ब्राह्मणी आदि समस्त देवियों को पुनः अपने में समेट लेती हैं और अन्तिम, निर्णायक द्वन्द्व-युद्ध हेतु शुम्भ के सम्मुख अकेली खड़ी हो जाती हैं।

Frequently Asked Questions

'मैं अकेली ही यहाँ हूँ' का गूढ़ अर्थ क्या है?
यह परम अद्वैत (अभेद) की घोषणा है। देवी प्रतिपादित करती हैं कि वे ही एकमात्र सत्ता हैं; समस्त देवता, मातृकाएँ और शक्तियाँ उन्हीं की विभूतियाँ — उन्हीं के आत्म-प्रकाश — मात्र हैं। इसे सिद्ध करने हेतु वे अनेक देवियों को अपने एक ही रूप में समेट लेती हैं।
शुम्भ यह घोषणा क्यों उकसाता है?
शुम्भ देवी को ताना देता है कि वे केवल दूसरों (मातृकाओं) के बल का सहारा लेकर युद्ध करती हैं। उत्तर में वे उन समस्त रूपों को अपने में समेटकर अकेली खड़ी हो जाती हैं, यह दिखाते हुए कि वे 'अन्य' कभी उनसे पृथक् थे ही नहीं।
यह दुर्गा सप्तशती के किस अध्याय से है?
ये दुर्गा सप्तशती के दशम अध्याय (शुम्भ-वध) के तीसरे से पाँचवें श्लोक हैं, जो देवी महासरस्वती द्वारा अधिष्ठित उत्तम चरित का अंश है।

Ready to start chanting?

See Benefits & How to Chant →