एकैवाहं जगत्यत्र (देवी की अद्वैत घोषणा)
अन्य नाम / खोज: ekaivaham jagaty atra · i alone am durga · ekaivaham jagatyatra dvitiya ka mamapara · devi non dual declaration · durga saptashati chapter 10
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✦ अर्थ
यह दुर्गा सप्तशती के दशम अध्याय की सर्वाधिक गूढ़ घोषणाओं में से एक है। जब शुम्भ देवी को दूसरों की सहायता से युद्ध करने का ताना देता है, तब वे अद्वैत के परम सत्य की घोषणा करती हैं: 'मैं अकेली ही हूँ; मेरे सिवा दूसरा कौन है?' — और उसके देखते-देखते अनेक मातृका देवियाँ (ब्राह्मणी आदि) उनके एक ही रूप में लीन हो जाती हैं। देवी प्रकट करती हैं कि समस्त शक्तियाँ और देवता उनकी ही विभूतियाँ मात्र हैं, और वे अकेली, एकमेव सत्ता के रूप में खड़ी हैं।
उत्पत्ति और कथा
Durga Saptashati Chapter 10 · Sage Markandeya (Markandeya Purana) · c. 400–600 CE (Markandeya Purana)
निशुम्भ के वध के पश्चात्, उसका भाई शुम्भ शोक एवं क्रोध में देवी पर आरोप लगाता है कि वे केवल मातृका-शक्तियों की सहायता से युद्ध कर रही हैं। देवी घोषणा करती हैं कि वे ही अकेली विद्यमान हैं और मातृकाएँ उन्हीं की विभूतियाँ हैं; तत्पश्चात् वे ब्राह्मणी आदि समस्त देवियों को पुनः अपने में समेट लेती हैं और अन्तिम, निर्णायक द्वन्द्व-युद्ध हेतु शुम्भ के सम्मुख अकेली खड़ी हो जाती हैं।
✦ शास्त्रों में वर्णित
यह श्लोक ज्ञान के साधकों को अत्यन्त प्रिय है, क्योंकि यह प्रकट करता है कि समस्त आभासों के पीछे दिव्य माता ही एकमात्र सत्ता हैं; चिन्तनशील साधक कहते हैं कि देवियों के उस एक में विलीन होने का ध्यान भय एवं पृथक्ता के भ्रम को विलीन कर देता है, और देवी के आदेश 'स्थिरो भव' — स्थिर हो जा — के अनुरूप आन्तरिक दृढ़ता प्रदान करता है।
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देव्युवाच एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा । पश्यैता दुष्ट मय्येव विशन्त्यो मद्विभूतयः ॥
devyuvāca ekaivāhaṃ jagatyatra dvitīyā kā mamāparā paśyaitā duṣṭa mayyeva viśantyo madvibhūtayaḥ
अर्थ:देवी बोलीं — 'इस जगत् में मैं अकेली ही हूँ; मेरे अतिरिक्त दूसरी कौन है? अरे दुष्ट! देख, ये मेरी विभूतियाँ मुझ में ही प्रवेश कर रही हैं!' तब ब्राह्मणी आदि वे समस्त देवियाँ उस देवी के शरीर में लीन हो गईं; तब अकेली अम्बिका ही शेष रहीं। देवी बोलीं — 'अपनी विभूति से जिन अनेक रूपों में मैं यहाँ स्थित थी, उन्हें मैंने समेट लिया है, और अब अकेली ही खड़ी हूँ। तू (युद्ध में) स्थिर हो जा!'
ततः समस्तास्ता देव्यो ब्रह्माणीप्रमुखा लयम् । तस्या देव्यास्तनौ जग्मुरेकैवासीत्तदाम्बिका ॥
tataḥ samastāstā devyo brahmāṇīpramukhā layam tasyā devyāstanau jagmurekaivāsīttadāmbikā
देव्युवाच अहं विभूत्या बहुभिरिह रूपैर्यदास्थिता । तत्संहृतं मयैकैव तिष्ठाम्याजौ स्थिरो भव ॥
devyuvāca ahaṃ vibhūtyā bahubhiriha rūpairyadāsthitā tatsaṃhṛtaṃ mayaikaiva tiṣṭhāmyājau sthiro bhava
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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एकैवाहं जगत्यत्र (देवी की अद्वैत घोषणा) पाठ के लाभ
यह परम अद्वैत सत्य प्रकट करता है कि देवी ही एकमात्र अधिष्ठान-सत्ता हैं
यह उच्चतम ज्ञान (ज्ञान) का अभ्यास कराता है कि समस्त रूप एवं शक्तियाँ उन्हीं की विभूतियाँ हैं
इसका जप देवी को समस्त बल का एकमात्र स्रोत मानकर समर्पण को गहन करता है
पृथक्ता की भावना और उससे उत्पन्न भय को विलीन करता है
'स्थिरो भव' — जीवन के संघर्षों में स्थिर खड़े रहने की आन्तरिक दृढ़ता को प्रेरित करता है
नवरात्रि में तथा शक्ति के स्वरूप पर चिन्तनात्मक देवी-साधना के लिए अत्यन्त प्रभावशाली
एकैवाहं जगत्यत्र (देवी की अद्वैत घोषणा) जप विधि
सप्तशती के बीज मन्त्र 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे' से आरम्भ करें। इन श्लोकों का धीरे एवं ध्यानपूर्वक जप करें, अनेक देवियों के उस एक में लीन होने का चिन्तन करते हुए। यह श्लोक जितना उपासना के लिए है उतना ही ज्ञान (विवेक) के लिए भी — इस सत्य पर मनन करें कि समस्त शक्तियाँ देवी की ही विभूतियाँ हैं। शुम्भ-वध का वर्णन करने वाले दुर्गा सप्तशती के दशम अध्याय के पाठ के अंग रूप में इसका पाठ किया जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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ॐ
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