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जन्माद्यस्य यतः — Word-by-Word Meaning

जन्माद्यस्य यतः

Every Sanskrit word explained in English

Word-by-Word Breakdown

जन्म-आदि
janma-ādi
जन्म-आदि — उत्पत्ति, स्थिति एवं प्रलय
अस्य
asya
अस्य — इसका (इस व्यक्त विश्व का)
यतः
yataḥ
यतः — जिससे
अन्वयात्
anvayāt
अन्वयात् — प्रत्यक्षतः (सब में विद्यमान)
इतरतः
itarataḥ
इतरतः — परोक्षतः (व्यक्त सृष्टि से अतीत)
ca
च — और
अर्थेषु
artheṣu
अर्थेषु — समस्त व्यवहारों / प्रयोजनों में
अभिज्ञः
abhijñaḥ
अभिज्ञः — पूर्ण रूप से सचेत, सर्वज्ञ
स्वराट्
svarāṭ
स्वराट् — पूर्णतः स्वतन्त्र, स्वयंप्रकाश
तेने
tene
तेने — प्रदान किया, हृदय में स्फुरित किया
ब्रह्म
brahma
ब्रह्म — वेदज्ञान
हृदा
hṛdā
हृदा — हृदय के द्वारा
आदि-कवये
ādi-kavaye
आदि-कवये — आदि सृष्ट प्राणी (ब्रह्मा) को
मुह्यन्ति
muhyanti
मुह्यन्ति — मोहित हो जाते हैं
यत्
yat
यत् — जिसके विषय में
सूरयः
sūrayaḥ
सूरयः — महान् ऋषि एवं देवगण
तेजो-वारि-मृदाम्
tejo-vāri-mṛdām
तेजो-वारि-मृदाम् — अग्नि, जल एवं पृथ्वी का
विनिमयः
vinimayaḥ
विनिमयः — परस्पर विनिमय / आदान-प्रदान
त्रि-सर्गः
tri-sargaḥ
त्रि-सर्गः — तीन गुणों की त्रिविध सृष्टि
अमृषा
amṛṣā
अमृषा — सत्य-सी (अपनी आश्रितता में वास्तविक)
धाम्ना स्वेन
dhāmnā svena
धाम्ना स्वेन — अपने ही धाम / स्वाभाविक तेज से
निरस्त-कुहकम्
nirasta-kuhakam
निरस्त-कुहकम् — समस्त माया / छल से रहित
सत्यं परं
satyaṃ param
सत्यं परं — परम परब्रह्म सत्य
धीमहि
dhīmahi
धीमहि — हम ध्यान करें

Complete Translation

मैं भगवान वासुदेव को नमस्कार करता हूँ। हम उस परम सत्य का ध्यान करें, जिससे इस विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होता है, जो प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से समस्त पदार्थों का ज्ञाता तथा पूर्णतः स्वतन्त्र (स्वराट्) है। उसी ने आदिकवि ब्रह्मा को हृदय के द्वारा वेदज्ञान प्रदान किया, और जिसके विषय में बड़े-बड़े देवता एवं ऋषि भी मोहित हो जाते हैं। जैसे अग्नि, जल और पृथ्वी का परस्पर विनिमय प्रतीत होता है, वैसे ही जिसमें तीनों गुणों की त्रिविध सृष्टि सत्य-सी प्रतीत होती है किन्तु मिथ्या है। जो अपने ही स्वरूप-धाम से सदा समस्त माया से रहित है — उस परम सत्य का हम ध्यान करते हैं।

Origin & History

Source: Srimad Bhagavata Purana, Canto 1, Chapter 1, Verse 1 (Mangalacharana)

Author: Veda Vyasa (Krishna Dvaipayana)

Period: Puranic

श्रीमद्भागवत किसी कथा से नहीं, अपितु इसी एक गहन दार्शनिक आवाहन से आरम्भ होता है। वेदों, महाभारत एवं अन्य पुराणों का संकलन कर लेने पर भी वेदव्यास सन्तुष्ट नहीं थे। नारद मुनि के मार्गदर्शन में उन्होंने भागवत को 'वेदरूपी वृक्ष के पके फल' के रूप में रचा। उन्होंने इसे इस श्लोक से प्रारम्भ किया जिससे शास्त्र का सम्पूर्ण प्रयोजन — परम सत्य, वासुदेव-कृष्ण पर ध्यान — आरम्भ में ही घोषित हो जाए। विभिन्न परम्पराओं के टीकाकारों ने केवल इस एक श्लोक पर ही विस्तृत ग्रन्थ लिखे हैं।

Frequently Asked Questions

जन्माद्यस्य यतः क्या है?
यह श्रीमद्भागवत पुराण का सर्वप्रथम श्लोक (मंगलाचरण, अर्थात् मंगल-आवाहन) है — स्कन्ध 1, अध्याय 1, श्लोक 1 — जिससे पूर्व 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का स्मरण है। यह परम परब्रह्म सत्य को परिभाषित करता है और सम्पूर्ण शास्त्र का विषय निर्धारित करता है।
इसे गायत्री मंत्र पर आधारित क्यों कहा जाता है?
यह श्लोक 'सत्यं परं धीमहि' — 'हम परम सत्य का ध्यान करते हैं' — से समाप्त होता है, जो सीधे गायत्री मंत्र के 'धीमहि' की प्रतिध्वनि करता है। परम्परागत टीकाकार कहते हैं कि व्यास ने भागवत का आरम्भ गायत्री पर आधारित ध्यान से किया, जिससे भागवत उसकी स्वाभाविक व्याख्या बन जाता है।
यहाँ 'स्वराट्' का क्या अर्थ है?
स्वराट् का अर्थ है पूर्णतः स्वतन्त्र एवं स्वयंप्रकाश। यह घोषित करता है कि परम सत्य किसी अन्य कारण पर निर्भर नहीं, जबकि सृष्ट विश्व पूर्णतः उसी पर निर्भर है।
इस श्लोक का पाठ कब करना चाहिए?
इसका पाठ श्रीमद्भागवत के किसी भी पठन, पारायण या प्रवचन के आरम्भ में किया जाता है, और इसे ज्ञान एवं भक्ति हेतु एक आवाहन के रूप में नित्य भी जपा जा सकता है।

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