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जन्माद्यस्य यतः

🕉️ hindu·📿 3× जप·🕐 श्रीमद्भागवत के पठन या श्रवण से पूर्व, प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त), अथवा किसी भी आध्यात्मिक अध्ययन के आरम्भ में·📜 Srimad Bhagavata Purana, Canto 1, Chapter 1, Verse 1 (Mangalacharana)

अन्य नाम / खोज: janmady asya yatah · satyam param dhimahi · bhagavata mangalacharana · bhagavatam first verse · om namo bhagavate vasudevaya janmady · sb 1.1.1

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अर्थ

जन्माद्यस्य यतः श्रीमद्भागवत पुराण का प्रसिद्ध मंगलाचरण है, जिसकी रचना वेदव्यास ने की। एक ही गूढ़ श्लोक में यह परम सत्य को सृष्टि का स्रोत, ब्रह्मा को वेदज्ञान देने वाला तथा समस्त माया से परे स्वयंप्रकाश तत्त्व बताता है। 'धीमहि' शब्द से यह गायत्री मंत्र की प्रतिध्वनि करता है और भागवत-पाठ के आरम्भ में पढ़ा जाता है।

उत्पत्ति और कथा

Srimad Bhagavata Purana, Canto 1, Chapter 1, Verse 1 (Mangalacharana) · Veda Vyasa (Krishna Dvaipayana) · Puranic

श्रीमद्भागवत किसी कथा से नहीं, अपितु इसी एक गहन दार्शनिक आवाहन से आरम्भ होता है। वेदों, महाभारत एवं अन्य पुराणों का संकलन कर लेने पर भी वेदव्यास सन्तुष्ट नहीं थे। नारद मुनि के मार्गदर्शन में उन्होंने भागवत को 'वेदरूपी वृक्ष के पके फल' के रूप में रचा। उन्होंने इसे इस श्लोक से प्रारम्भ किया जिससे शास्त्र का सम्पूर्ण प्रयोजन — परम सत्य, वासुदेव-कृष्ण पर ध्यान — आरम्भ में ही घोषित हो जाए। विभिन्न परम्पराओं के टीकाकारों ने केवल इस एक श्लोक पर ही विस्तृत ग्रन्थ लिखे हैं।

शास्त्रों में वर्णित

परम्परा मानती है कि भागवत का प्रथम श्लोक सम्पूर्ण शास्त्र को बीज रूप में समेटे हुए है, और व्यास की व्याकुलता उसी क्षण शान्त हो गई जब उन्होंने इस आवाहन की रचना की। कहा जाता है कि जहाँ भी भागवत का पाठ 'जन्माद्यस्य यतः' से आरम्भ होता है, वह स्थान स्वयं तीर्थ के समान पवित्र हो जाता है।

मंत्र

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नमो भगवते वासुदेवाय। जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट् तेने ब्रह्म हृदा आदिकवये मुह्यन्ति यत्सूरयः। तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि॥

Oṃ namo bhagavate vāsudevāya. Janmādy asya yato 'nvayād itarataś cārtheṣv abhijñaḥ svarāṭ tene brahma hṛdā ya ādi-kavaye muhyanti yat sūrayaḥ. tejo-vāri-mṛdāṃ yathā vinimayo yatra tri-sargo 'mṛṣā dhāmnā svena sadā nirasta-kuhakaṃ satyaṃ paraṃ dhīmahi.

अर्थ:मैं भगवान वासुदेव को नमस्कार करता हूँ। हम उस परम सत्य का ध्यान करें, जिससे इस विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होता है, जो प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से समस्त पदार्थों का ज्ञाता तथा पूर्णतः स्वतन्त्र (स्वराट्) है। उसी ने आदिकवि ब्रह्मा को हृदय के द्वारा वेदज्ञान प्रदान किया, और जिसके विषय में बड़े-बड़े देवता एवं ऋषि भी मोहित हो जाते हैं। जैसे अग्नि, जल और पृथ्वी का परस्पर विनिमय प्रतीत होता है, वैसे ही जिसमें तीनों गुणों की त्रिविध सृष्टि सत्य-सी प्रतीत होती है किन्तु मिथ्या है। जो अपने ही स्वरूप-धाम से सदा समस्त माया से रहित है — उस परम सत्य का हम ध्यान करते हैं।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

जन्म-आदि🔊janma-ādiजन्म-आदि — उत्पत्ति, स्थिति एवं प्रलय
अस्य🔊asyaअस्य — इसका (इस व्यक्त विश्व का)
यतः🔊yataḥयतः — जिससे
अन्वयात्🔊anvayātअन्वयात् — प्रत्यक्षतः (सब में विद्यमान)
इतरतः🔊itarataḥइतरतः — परोक्षतः (व्यक्त सृष्टि से अतीत)
🔊caच — और
अर्थेषु🔊artheṣuअर्थेषु — समस्त व्यवहारों / प्रयोजनों में
अभिज्ञः🔊abhijñaḥअभिज्ञः — पूर्ण रूप से सचेत, सर्वज्ञ
स्वराट्🔊svarāṭस्वराट् — पूर्णतः स्वतन्त्र, स्वयंप्रकाश
तेने🔊teneतेने — प्रदान किया, हृदय में स्फुरित किया
ब्रह्म🔊brahmaब्रह्म — वेदज्ञान
हृदा🔊hṛdāहृदा — हृदय के द्वारा
आदि-कवये🔊ādi-kavayeआदि-कवये — आदि सृष्ट प्राणी (ब्रह्मा) को
मुह्यन्ति🔊muhyantiमुह्यन्ति — मोहित हो जाते हैं
यत्🔊yatयत् — जिसके विषय में
सूरयः🔊sūrayaḥसूरयः — महान् ऋषि एवं देवगण
तेजो-वारि-मृदाम्🔊tejo-vāri-mṛdāmतेजो-वारि-मृदाम् — अग्नि, जल एवं पृथ्वी का
विनिमयः🔊vinimayaḥविनिमयः — परस्पर विनिमय / आदान-प्रदान
त्रि-सर्गः🔊tri-sargaḥत्रि-सर्गः — तीन गुणों की त्रिविध सृष्टि
अमृषा🔊amṛṣāअमृषा — सत्य-सी (अपनी आश्रितता में वास्तविक)
धाम्ना स्वेन🔊dhāmnā svenaधाम्ना स्वेन — अपने ही धाम / स्वाभाविक तेज से
निरस्त-कुहकम्🔊nirasta-kuhakamनिरस्त-कुहकम् — समस्त माया / छल से रहित
सत्यं परं🔊satyaṃ paramसत्यं परं — परम परब्रह्म सत्य
धीमहि🔊dhīmahiधीमहि — हम ध्यान करें

जन्माद्यस्य यतः पाठ के लाभ

श्रीमद्भागवत के पठन या श्रवण से पूर्व मंगल का आवाहन करता है

सम्पूर्ण भागवत के दार्शनिक आधार को एक श्लोक में स्थापित करता है

इस पर ध्यान करने से परम सत्य के स्वरूप विषयक स्पष्टता प्राप्त होती है

गायत्री मंत्र (धीमहि) की प्रतिध्वनि करता है और भागवत का 'गायत्री-आधारित' सार माना जाता है

बुद्धि को शुद्ध करता है तथा माया (कुहक) एवं संशय को दूर करता है

वासुदेव-कृष्ण के प्रति परम सत्य के रूप में भक्ति का विकास करता है

परम्परागत रूप से किसी भी आध्यात्मिक अध्ययन, प्रवचन या यज्ञ को मंगलमय बनाने हेतु पढ़ा जाता है

जन्माद्यस्य यतः जप विधि

जप संख्या3बार
उत्तम समयश्रीमद्भागवत के पठन या श्रवण से पूर्व, प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त), अथवा किसी भी आध्यात्मिक अध्ययन के आरम्भ में

'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' से आरम्भ करें, फिर पूर्ण श्लोक का धीमे-धीमे पाठ करें, प्रत्येक खण्ड का चिन्तन करते हुए — सृष्टि का स्रोत, वेदों का दाता, तीनों गुणों की लीला से परे की वास्तविकता। जैसे ही यह 'सत्यं परं धीमहि' में पराकाष्ठा पर पहुँचे, परम सत्य के ध्यान में वैसे ही स्थिर हों जैसे गायत्री का ध्यान किया जाता है। भागवत सप्ताह या नित्य पठन से पूर्व इसे तीन बार पढ़ना परम्परागत है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह श्रीमद्भागवत पुराण का सर्वप्रथम श्लोक (मंगलाचरण, अर्थात् मंगल-आवाहन) है — स्कन्ध 1, अध्याय 1, श्लोक 1 — जिससे पूर्व 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का स्मरण है। यह परम परब्रह्म सत्य को परिभाषित करता है और सम्पूर्ण शास्त्र का विषय निर्धारित करता है।
यह श्लोक 'सत्यं परं धीमहि' — 'हम परम सत्य का ध्यान करते हैं' — से समाप्त होता है, जो सीधे गायत्री मंत्र के 'धीमहि' की प्रतिध्वनि करता है। परम्परागत टीकाकार कहते हैं कि व्यास ने भागवत का आरम्भ गायत्री पर आधारित ध्यान से किया, जिससे भागवत उसकी स्वाभाविक व्याख्या बन जाता है।
स्वराट् का अर्थ है पूर्णतः स्वतन्त्र एवं स्वयंप्रकाश। यह घोषित करता है कि परम सत्य किसी अन्य कारण पर निर्भर नहीं, जबकि सृष्ट विश्व पूर्णतः उसी पर निर्भर है।
इसका पाठ श्रीमद्भागवत के किसी भी पठन, पारायण या प्रवचन के आरम्भ में किया जाता है, और इसे ज्ञान एवं भक्ति हेतु एक आवाहन के रूप में नित्य भी जपा जा सकता है।

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