अगस्त्यं कुम्भकर्णं च — भोजनोत्तर (पाचन) मन्त्र
अन्य नाम / खोज: agastyam kumbhakarnam cha shanim cha badabanalam · ahara parinamartham smarami cha vrikodaram · after meal digestion mantra · prayer for good digestion · night prayer after dinner
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✦ अर्थ
यह सुन्दर लघु श्लोक भोजन के पश्चात् (तथा परम्परा से रात्रि में सोने से पूर्व) अभी-अभी ग्रहण किए गए अन्न के सम्यक् पाचन की प्रार्थना हेतु पढ़ा जाता है। यह उन पाँच विभूतियों का स्मरण कराता है जो अपार भोजन एवं पाचन-शक्ति के लिए विख्यात हैं — समुद्रपान करने वाले अगस्त्य, कुम्भकर्ण, शनि, समुद्राग्नि बडबानल और भीम (वृकोदर)। इनका स्मरण करके भक्त प्रबल जठराग्नि और उत्तम स्वास्थ्य की कामना करता है।
उत्पत्ति और कथा
Traditional smarana (remembrance) shloka recited after meals · Traditional · Classical
यह प्रिय श्लोक भोजन और स्वास्थ्य से जुड़ी दैनिक भक्ति-संस्कृति का अंग है। भोजन कर लेने के पश्चात् भक्त उन पाँच विभूतियों का स्मरण करता है जो असाधारण भोजन एवं पाचन-शक्ति के लिए प्रसिद्ध हैं — अगस्त्य, जिनके विषय में कहा जाता है कि उन्होंने एक ही घूँट में समुद्र निगल लिया; अपार भूख वाले कुम्भकर्ण और भीम; शनि; तथा समुद्राग्नि बडबानल जो निरन्तर समुद्र के जल को भस्म करती है। 'भोजन के पाचन के लिए' इनका स्मरण करके यह श्लोक सहज तथा भक्तिपूर्ण ढंग से प्रबल अन्तर्-अग्नि, उत्तम स्वास्थ्य और भोजन के बाद सुखद विश्राम का आवाहन करता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
परम्परा से कहा जाता है कि जो व्यक्ति भोजन के पश्चात् समुद्रपान करने वाले अगस्त्य का स्मरण करता है, वह भारी भोजन को भी सहजता से पचा लेता है; क्योंकि ऐसी प्रबल पाचन-शक्तियों की ओर मुड़ा मन शरीर की अपनी अग्नि को प्रज्वलित कर देता है और अजीर्ण से कभी पीड़ित नहीं होता।
मंत्र
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अगस्त्यं कुम्भकर्णं च शनिं च बडबानलम् । आहारपरिणामार्थं स्मरामि च वृकोदरम् ॥
Agastyam Kumbhakarnam cha Shanim cha Badabanalam Ahara-parinamartham smarami cha Vrikodaram
अर्थ:अपने भोजन के सम्यक् पाचन के लिए मैं अगस्त्य, कुम्भकर्ण, शनि, बडबानल (समुद्र की अग्नि) और वृकोदर (भीम) का स्मरण करता हूँ — जो सभी अपार पाचन-शक्ति के लिए प्रसिद्ध हैं।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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अगस्त्यं कुम्भकर्णं च — भोजनोत्तर (पाचन) मन्त्र पाठ के लाभ
भोजन के पश्चात् (और रात्रि में) अभी-अभी खाए गए अन्न के सम्यक् पाचन की प्रार्थना हेतु पढ़ा जाता है।
पाँच पौराणिक 'महान पाचकों' — अगस्त्य, कुम्भकर्ण, शनि, बडबानल और भीम — का आवाहन करके प्रबल जठराग्नि प्रज्वलित करता है।
उत्तम स्वास्थ्य, हल्का पेट और सोने से पूर्व पढ़ने पर सुखद निद्रा प्रदान करता है।
एक मनोरम, सरलता से स्मरणीय श्लोक जो शरीर की देखभाल को भी प्रार्थनामय, भक्तिपूर्ण कर्म बना देता है।
भोजन के प्रति कृतज्ञता और खाने के बाद अपने स्वास्थ्य पर सजग ध्यान विकसित करता है।
इतना सरल कि सम्पूर्ण परिवार इसे भोजन-दिनचर्या के अंग के रूप में प्रतिदिन पढ़ सके।
अगस्त्यं कुम्भकर्णं च — भोजनोत्तर (पाचन) मन्त्र जप विधि
भोजन समाप्त करने के पश्चात् — और विशेषकर रात्रि के भोजन के बाद सोने जाने से पूर्व — एक बार शान्तिपूर्वक यह प्रार्थना करते हुए पढ़ें कि भोजन भली-भाँति पच जाए। जपते समय श्लोक में नामित प्रबल पाचन-शक्ति वाली पाँच विभूतियों का स्मरण करें, और भीतर एक स्वस्थ, दीप्तिमान जठराग्नि की कोमल कल्पना करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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