अघोर मंत्र (पंचब्रह्म — शिव का दक्षिण मुख)
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✦ अर्थ
अघोर मंत्र पाँच पंचब्रह्म मंत्रों में तीसरा है, जो सदाशिव के मुखों का वर्णन करते हैं — यह दक्षिण मुख है, जो संहार एवं पुनः-अवशोषण से जुड़ा है। यह रुद्र को एक साथ उनके सभी रूपों में नमन करता है: सौम्य (अघोर), उग्र (घोर) एवं अत्यंत भयंकर, यह दृढ़ करते हुए कि प्रत्येक रूप वही एक शिव है। यह वैदिक मंत्र शैव एवं भैरव उपासना में केंद्रीय है।
उत्पत्ति और कथा
Yajurveda — Taittiriya Aranyaka; Panchabrahma Upanishad; Shaiva Agamas · Vedic (apaurusheya — revealed) · Vedic
अघोर मंत्र उन पाँच पंचब्रह्म मंत्रों में से एक है जो सदाशिव के पाँच मुखों का आवाहन करते हैं। यह दक्षिण मुख से संबंधित है, जो संहार (विलय एवं पुनः-अवशोषण) का स्थान है और भैरव जैसे शिव के उग्र, रक्षक रूपों का उद्गम है। यजुर्वेद परम्परा में प्राप्त यह मंत्र रुद्राभिषेक एवं आगमिक उपासना में रुद्र को उनके सभी रूपों में एकमात्र परम सत्ता के रूप में सम्मानित करने हेतु पाठ किया जाता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
अघोर उपासक मानते हैं कि इस मंत्र का सच्चा पाठ भय की जड़ को ही विलीन कर देता है: प्रभु के सौम्य और उग्र दोनों रूपों को समान रूप से नमन करके भक्त पाता है कि सृष्टि में कुछ भी भयप्रद नहीं रहता, क्योंकि सब कुछ शिव है — और अनेक लोग चिर भय, दुःस्वप्न और अनिष्टकारी प्रभावों से मुक्ति की बात कहते हैं।
मंत्र
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अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यश्च। सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्यः॥
Aghorebhyo'tha Ghorebhyo Ghoraghoratarebhyashcha Sarvebhyah Sarvasharvebhyo Namaste Astu Rudrarupebhyah
अर्थ:अघोर (सौम्य) रूपों को, और घोर (उग्र) रूपों को नमस्कार; जो घोर से भी अधिक घोर हैं उन्हें भी; उन सब को, सर्वत्र शिव-रुद्र के समस्त रूपों को — रुद्र के इन सभी रूपों को नमस्कार हो।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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अघोर मंत्र (पंचब्रह्म — शिव का दक्षिण मुख) पाठ के लाभ
पूर्ण रक्षा हेतु रुद्र को सौम्य और उग्र — सभी रूपों में आवाहित करता है
भय, नकारात्मकता और अनिष्टकारी प्रभावों को दूर करने में शक्तिशाली
सदाशिव के दक्षिण मुख तथा अघोर/भैरव उपासना का केंद्रीय मंत्र
सभी भयंकर रूपों के पीछे एक ही शिव को पहचानकर निर्भयता का विकास करता है
रुद्राभिषेक एवं शैव आगम उपासना में प्रयुक्त
विपत्ति में साहस और स्थिरता प्रदान करता है
अघोर मंत्र (पंचब्रह्म — शिव का दक्षिण मुख) जप विधि
परम्परागत रूप से दक्षिण दिशा (अघोर मुख की दिशा) की ओर मुख करके या शिव/भैरव की प्रतिमा के सम्मुख जपा जाता है, प्रायः अन्य चार पंचब्रह्म मंत्रों के साथ ताकि सम्पूर्ण पंचमुखी सदाशिव का आवाहन हो। वैदिक स्वरों का सावधानी से उच्चारण करें और श्रद्धा बनाए रखें; यह उग्र-किन्तु-मंगलमय मंत्र भय से नहीं, भक्ति से किया जाता है। विधिवत उपासना किसी योग्य गुरु से सीखना श्रेष्ठ है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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