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महालक्ष्मी ध्यान (अक्षस्रक्परशुं)

🕉️ hindu·📿 9× जप·🕐 नवरात्रि में, दुर्गा सप्तशती के मध्यम चरित से पूर्व, तथा मंगलवार एवं शुक्रवार को·📜 Durga Saptashati (Devi Mahatmyam) — dhyana of the Madhyama Charita

अन्य नाम / खोज: aksasrak parashum gadeshu · mahalakshmi dhyana saptashati · sairibha mardini mahalakshmi · eighteen armed mahalakshmi dhyana · akshasrak parashum

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अर्थ

यह दुर्गा सप्तशती के मध्यम चरित में प्रकट होने वाली महालक्ष्मी का प्रसिद्ध ध्यान श्लोक है — वह अठारह भुजाओं वाली योद्धा देवी जो महिषासुर का संहार करने वाली हैं। यह श्लोक उनके द्वारा धारण किए अठारह आयुधों एवं चिह्नों का — अक्षमाला और कमल से लेकर शूल, पाश और सुदर्शन चक्र तक — नामोल्लेख करता है, और कमल पर विराजमान उनके प्रसन्न मुख का दर्शन कराता है। इसका पाठ सप्तशती के मध्यम चरित से पूर्व ध्यान रूप में तथा देवी के विजयी स्वरूप के एक प्रभावशाली ध्यान के रूप में किया जाता है।

उत्पत्ति और कथा

Durga Saptashati (Devi Mahatmyam) — dhyana of the Madhyama Charita · Traditional (Markandeya Purana tradition) · Classical

दुर्गा सप्तशती में देवी माहात्म्य तीन चरितों में प्रकट होता है, जिनमें से प्रत्येक देवी के एक महान् स्वरूप — महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती — के अधीन है। यह श्लोक मध्यम चरित की अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी का ध्यान है, जिसमें देवी ने समस्त देवताओं के संयुक्त तेज से आकार लिया और अपनी अठारह भुजाओं में उनके प्रत्येक आयुध को धारण करके भैंसरूपी राक्षस महिषासुर का संहार करने के लिए निकलीं। यह ध्यान उनकी विजय के अध्यायों के पाठ से पूर्व उसी स्वरूप का दर्शन एवं ध्यान करने के लिए पढ़ा जाता है।

शास्त्रों में वर्णित

देवी माहात्म्य में वर्णित है कि जब कोई देवता महिषासुर को परास्त न कर सका, तब उनके संकेन्द्रित तेज से यह अठारह भुजाओं वाली देवी प्रकट हुईं, जिन्होंने प्रत्येक देवता से एक आयुध प्राप्त किया और स्वर्ग को जीत लेने वाले उस राक्षस का संहार किया — और भक्त मानते हैं कि इस ध्यान द्वारा इस स्वरूप का चिन्तन करना स्वयं को एक ही साथ उन समस्त दिव्य आयुधों के संरक्षण में रखना है।

मंत्र

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अक्षस्रक्परशुं गदेषुकुलिशं पद्मं धनुष्कुण्डिकां दण्डं शक्तिमसिं चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनम्। शूलं पाशसुदर्शने दधतीं हस्तैः प्रसन्नाननां सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम्॥

om akṣa-srak-paraśuṃ gadeṣu-kuliśaṃ padmaṃ dhanuṣ-kuṇḍikāṃ daṇḍaṃ śaktim-asiṃ ca carma jala-jaṃ ghaṇṭāṃ surā-bhājanam | śūlaṃ pāśa-sudarśane ca dadhatīṃ hastaiḥ prasannānanāṃ seve sairibha-mardinīm-iha mahālakṣmīṃ saroja-sthitām ||

अर्थ:मैं कमल पर विराजमान, महिषासुर का मर्दन करने वाली, प्रसन्न मुख वाली महालक्ष्मी की आराधना करता हूँ — जो अपने (अठारह) हाथों में अक्षमाला, परशु, गदा, बाण और वज्र; कमल, धनुष और कमण्डलु; दण्ड, शक्ति, असि (तलवार) और ढाल; शंख, घण्टा और मधुपात्र; तथा शूल, पाश और सुदर्शन चक्र धारण करती हैं।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

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अक्षस्रक्🔊akṣa-srakरुद्राक्ष / अक्ष मणियों की माला
परशुं🔊paraśuṃपरशु (फरसा)
गदा🔊gadāगदा
इषु🔊iṣuबाण
कुलिशं🔊kuliśaṃवज्र
पद्मं🔊padmaṃकमल
धनुः🔊dhanuḥधनुष
कुण्डिकां🔊kuṇḍikāṃकमण्डलु (जलपात्र)
दण्डं🔊daṇḍaṃदण्ड (छड़ी)
शक्तिम्🔊śaktimशक्ति (भाला)
असिं🔊asiṃअसि (तलवार)
चर्म🔊carmaचर्म (ढाल)
जलजं🔊jala-jaṃशंख (जल से उत्पन्न)
घण्टां🔊ghaṇṭāṃघण्टा
सुराभाजनम्🔊surā-bhājanamमधुपात्र / अमृत-पात्र
शूलं🔊śūlaṃशूल (त्रिशूल)
पाश🔊pāśaपाश (फंदा)
सुदर्शने🔊sudarśaneसुदर्शन चक्र
दधतीं हस्तैः🔊dadhatīṃ hastaiḥ(इन सबको) अपने (अठारह) हाथों में धारण करती हुई
प्रसन्नाननां🔊prasanna-ānanāṃप्रसन्न, सौम्य मुख वाली
सेवे🔊seveमैं पूजता हूँ / सेवा करता हूँ
सैरिभमर्दिनीम्🔊sairibha-mardinīmमहिषासुर (भैंसरूपी राक्षस) का संहार करने वाली
महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम्🔊mahālakṣmīṃ saroja-sthitāmकमल पर विराजमान महालक्ष्मी

महालक्ष्मी ध्यान (अक्षस्रक्परशुं) पाठ के लाभ

दुर्गा सप्तशती की अठारह भुजाओं वाली, महिषासुरमर्दिनी महालक्ष्मी का प्रामाणिक ध्यान

देवी के सम्पूर्ण विजयी स्वरूप को — समस्त आयुधों सहित — ध्यान हेतु मन में स्थिर करता है

दुर्गा सप्तशती / चण्डी पाठ के मध्यम चरित से पूर्व ध्यान श्लोक के रूप में पढ़ा जाता है

लक्ष्मी की समृद्धि तथा दुर्गा की रक्षक, असुर-संहारक शक्ति — दोनों का आवाहन करता है

साहस, शत्रुओं एवं विघ्नों पर विजय तथा कल्याण प्रदान करता है

विशेषतः नवरात्रि में तथा मंगलवार एवं शुक्रवार को जपा जाता है

महालक्ष्मी ध्यान (अक्षस्रक्परशुं) जप विधि

जप संख्या9बार
उत्तम समयनवरात्रि में, दुर्गा सप्तशती के मध्यम चरित से पूर्व, तथा मंगलवार एवं शुक्रवार को

देवी की प्रतिमा के समक्ष पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें। इस ध्यान का एकाग्रता से पाठ करें, कमल पर विराजमान, प्रसन्न मुख वाली महालक्ष्मी का, श्लोक में नामांकित अठारह आयुधों एवं चिह्नों को धारण किए हुए, ध्यान करते हुए। परम्परागत रूप से इसे चण्डी पाठ के मध्यम भाग के आरम्भ में ध्यान श्लोक के रूप में जपा जाता है, और इसे स्वतन्त्र रूप से भी 9 या 108 बार दोहराया जा सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यह दुर्गा सप्तशती के मध्यम चरित (मध्यम भाग) में प्रकट होने वाली महालक्ष्मी का वर्णन करता है — दिव्य माता का अठारह भुजाओं वाला योद्धा स्वरूप जो महिषासुर का संहार करती हैं। इस सन्दर्भ में महालक्ष्मी केवल धन की देवी नहीं, अपितु परम शक्ति हैं।
अक्षमाला, परशु, गदा, बाण, वज्र, कमल, धनुष, कमण्डलु, दण्ड, शक्ति, असि, ढाल, शंख, घण्टा, मधुपात्र, शूल, पाश और चक्र धारण करने वाली अठारह भुजाएँ यह दर्शाती हैं कि एक ही देवी समस्त देवताओं की समस्त शक्तियों एवं आयुधों को एक साथ धारण करती हैं, जिससे वे बुराई के विरुद्ध अजेय बन जाती हैं।
'सैरिभ' भैंस (महिष) का ही दूसरा नाम है, अतः 'सैरिभमर्दिनी' का अर्थ है 'भैंसरूपी राक्षस का मर्दन करने वाली' — अर्थात् महिषासुर का संहार करने वाली। यह देवी के विजयी योद्धा स्वरूप की महान् उपाधियों में से एक है।
इसका पाठ दुर्गा सप्तशती / चण्डी पाठ के मध्यम चरित से पूर्व ध्यान श्लोक के रूप में किया जाता है, विशेषतः नवरात्रि में। इसे देवी के पूर्ण रक्षक वैभव के ध्यान के रूप में स्वतन्त्र रूप से भी जपा जा सकता है।

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