असम्भवं हेममृगस्य जन्म
अन्य नाम / खोज: asambhavam hema mrigasya janma · asambhavam hemamrigasya janma tathapi ramo lulubhe mrigaya · golden deer ramayana shloka · dhiyo api pumsam malini bhavanti
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✦ अर्थ
'असम्भवं हेममृगस्य जन्म' रामायण के स्वर्णमृग प्रसंग पर चिन्तन करने वाला एक प्रसिद्ध श्लोक है। यह कहता है कि यद्यपि स्वर्णमृग का होना कभी सम्भव नहीं, फिर भी ज्ञानी श्रीराम भी उसके पीछे आकर्षित हो गए — क्योंकि जब विपत्ति आना नियत होती है, तब महान आत्माओं की बुद्धि भी मलिन हो जाती है। यह श्लोक इस सत्य का शाश्वत सूत्र बन गया है कि आगामी विपत्ति विवेक को धूमिल कर श्रेष्ठतम मनों को भी लुभा सकती है।
उत्पत्ति और कथा
Subhashita drawn from the Ramayana tradition (golden deer episode, Aranya Kanda) · Traditional (Subhashita reflecting on Valmiki Ramayana) · Classical Sanskrit literature
रामायण के अरण्यकाण्ड में राक्षस मारीच ने रावण की आज्ञा से सीता और राम को लुभाने के लिए एक चमकीले स्वर्णमृग का रूप धारण किया। यद्यपि स्वर्णमृग स्वभावतः असम्भव है, फिर भी सीता उस पर मोहित हो गईं और राम उसे पकड़ने निकल पड़े, लक्ष्मण को उनकी रक्षा में छोड़कर — और इसी से वह घटना-शृंखला आरम्भ हुई जो सीताहरण की ओर ले गई। यह श्लोक उस प्रसंग को इस सूत्र में सार रूप में बाँधता है कि आगामी विपत्ति श्रेष्ठतम बुद्धि को भी मलिन कर देती है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
कथावाचक कहते हैं कि यह एकमात्र श्लोक सम्पूर्ण रामायण के मोड़-बिन्दु को समेट लेता है — कि रावण पर राम की विजय का यह विराट दिव्य नाटक उस क्षण से आरम्भ हुआ जब नियति ने स्वयं मानव-रूप में अवतरित प्रभु के विवेक को धूमिल कर दिया, ताकि दिव्य प्रयोजन प्रकट हो सके।
मंत्र
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असम्भवं हेममृगस्य जन्म तथापि रामो लुलुभे मृगाय। प्रायः समापन्नविपत्तिकाले धियोऽपि पुंसां मलिनी भवन्ति॥
asambhavaṁ hemamṛgasya janma tathāpi rāmo lulubhe mṛgāya। prāyaḥ samāpanna-vipatti-kāle dhiyo'pi puṁsāṁ malinī bhavanti॥
अर्थ:सोने के मृग का जन्म असम्भव है, फिर भी राम उस मृग के लोभ में आ गए; सचमुच, जब विपत्ति निकट आती है, तब मनुष्यों की बुद्धि भी मलिन (भ्रमित) हो जाती है। यह प्रसिद्ध श्लोक बताता है कि किस प्रकार श्रीराम मारीच के स्वर्णमृग के लोभ में पड़कर उन घटनाओं की शृंखला में खिंच गए जो सीताहरण की ओर ले गईं।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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असम्भवं हेममृगस्य जन्म पाठ के लाभ
विनम्रता सिखाता है — कि भाग्य के प्रतिकूल होने पर श्रेष्ठतम बुद्धि भी विचलित हो सकती है
जो बहुत लुभावना और असम्भव-सा लगे, उन क्षणों में सतर्कता और विवेक के लिए प्रेरित करता है
यह सान्त्वना देता है कि विवेक की चूक मानव-स्वभाव का अंग है
नियति की लीला और बुद्धि की सीमाओं पर गहन चिन्तन है
जो असम्भव रूप से आकर्षक लगे, उसके पीछे जाने से पहले रुककर विचार करने का स्मरण कराता है
मानव-स्वभाव में रामायण की अन्तर्दृष्टि के प्रति श्रद्धा को गहरा करता है
असम्भवं हेममृगस्य जन्म जप विधि
इस श्लोक का मनन करते हुए पाठ करें, रामायण के स्वर्णमृग प्रसंग का स्मरण करते हुए। यह आपको स्मरण कराए कि जब कोई वस्तु अत्यन्त लुभावनी प्रतीत हो, तब रुककर अपने विवेक की परीक्षा करें, और इस ज्ञान में विनम्र बने रहें कि विपत्ति के निकट आने पर महान बुद्धि भी मलिन हो सकती है। विवेक और समता के विकास के लिए यह उत्तम श्लोक है।