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कालिका अष्टकम्

🕉️ hindu·📿 1× जप·🕐 प्रातः या सायं; विशेषकर शुक्रवार·📜 Ascribed to Adi Shankaracharya

अन्य नाम / खोज: mahoghorarava sudamshtra karala · kalika ashtakam lyrics

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अर्थ

कालिका अष्टकम् आदि शंकराचार्य द्वारा देवी कालिका (काली) की आठ श्लोकों की स्तुति है। यह उनके उग्र, श्याम, मुक्तिदायी स्वरूप के ध्यान से आरंभ होती है — मुण्डमालाधारिणी, काल को ग्रसने वाली और अभय देने वाली माता। इसे शुक्रवार तथा नवरात्रि में विशेष रूप से पढ़ा जाता है।

उत्पत्ति और कथा

Ascribed to Adi Shankaracharya · Adi Shankaracharya · Classical

कालिका अष्टकम् परंपरा से आदि शंकराचार्य को आरोपित है। आदि शंकराचार्य द्वारा देवी कालिका (काली) की आठ श्लोकों की यह स्तुति उनके उग्र, श्याम, मुक्तिदायी स्वरूप के ध्यान से आरंभ होती है — मुण्डमालाधारिणी, काल को ग्रसने वाली व अभय देने वाली माता।

शास्त्रों में वर्णित

कहा जाता है कि सच्चे और भक्तिपूर्ण हृदय से कालिका अष्टकम् का पाठ करना भगवती की कृपा के निकट पहुँचना है, जो प्रेमपूर्वक उन्हें पुकारने वालों का कभी त्याग नहीं करतीं।

मंत्र

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ध्यानम् गलद्रक्तमुण्डावलीकण्ठमाला महोघोररावा सुदंष्ट्रा कराला विवस्त्रा श्मशानालया मुक्तकेशी महाकालकामाकुला कालिकेयम् १॥ भुजेवामयुग्मे शिरोऽसिं दधाना वरं दक्षयुग्मेऽभयं वै तथैव सुमध्याऽपि तुङ्गस्तना भारनम्रा लसद्रक्तसृक्कद्वया सुस्मितास्या २॥ शवद्वन्द्वकर्णावतंसा सुकेशी लसत्प्रेतपाणिं प्रयुक्तैककाञ्ची शवाकारमञ्चाधिरूढा शिवाभिश्- चतुर्दिक्षुशब्दायमानाऽभिरेजे ३॥ अथ स्तुतिः विरञ्च्यादिदेवास्त्रयस्ते गुणास्त्रीन् समाराध्य कालीं प्रधाना बभूबुः अनादिं सुरादिं मखादिं भवादिं स्वरूपं त्वदीयं विन्दन्ति देवाः १॥ जगन्मोहिनीयं तु वाग्वादिनीयं सुहृत्पोषिणीशत्रुसंहारणीयम् वचस्तम्भनीयं किमुच्चाटनीयं स्वरूपं त्वदीयं विन्दन्ति देवाः २॥ इयं स्वर्गदात्री पुनः कल्पवल्ली मनोजास्तु कामान् यथार्थं प्रकुर्यात् तथा ते कृतार्था भवन्तीति नित्यं स्वरूपं त्वदीयं विन्दन्ति देवाः ३॥ सुरापानमत्ता सुभक्तानुरक्ता लसत्पूतचित्ते सदाविर्भवत्ते जपध्यानपूजासुधाधौतपङ्का स्वरूपं त्वदीयं विन्दन्ति देवाः ४॥ चिदानन्दकन्दं हसन् मन्दमन्दं शरच्चन्द्रकोटिप्रभापुञ्जबिम्बम् मुनीनां कवीनां हृदि द्योतयन्तं स्वरूपं त्वदीयं विन्दन्ति देवाः ५॥ महामेघकाली सुरक्तापि शुभ्रा कदाचिद् विचित्राकृतिर्योगमाया बाला वृद्धा कामातुरापि स्वरूपं त्वदीयं विन्दन्ति देवाः ६॥ क्षमस्वापराधं महागुप्तभावं मया लोकमध्ये प्रकाशिकृतं यत् तव ध्यानपूतेन चापल्यभावात् स्वरूपं त्वदीयं विन्दन्ति देवाः ७॥ (फलश्रुतिः) यदि ध्यानयुक्तं पठेद् यो मनुष्यस्- तदा सर्वलोके विशालो भवेच्च गृहे चाष्टसिद्धिर्मृते चापि मुक्तिः स्वरूपं त्वदीयं विन्दन्ति देवाः ८॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं श्रीकालिकाष्टकं सम्पूर्णम्

dhyānam | galadraktamuṇḍāvalīkaṇṭhamālā mahoghorarāvā sudaṃṣṭrā karālā | vivastrā śmaśānālayā muktakeśī mahākālakāmākulā kālikeyam || 1|| bhujevāmayugme śiro'siṃ dadhānā varaṃ dakṣayugme'bhayaṃ vai tathaiva | sumadhyā'pi tuṅgastanā bhāranamrā lasadraktasṛkkadvayā susmitāsyā || 2|| śavadvandvakarṇāvataṃsā sukeśī lasatpretapāṇiṃ prayuktaikakāñcī | śavākāramañcādhirūḍhā śivābhiś- caturdikṣuśabdāyamānā'bhireje || 3|| || atha stutiḥ || virañcyādidevāstrayaste guṇāstrīn samārādhya kālīṃ pradhānā babhūbuḥ | anādiṃ surādiṃ makhādiṃ bhavādiṃ svarūpaṃ tvadīyaṃ na vindanti devāḥ || 1|| jaganmohinīyaṃ tu vāgvādinīyaṃ suhṛtpoṣiṇīśatrusaṃhāraṇīyam | vacastambhanīyaṃ kimuccāṭanīyaṃ svarūpaṃ tvadīyaṃ na vindanti devāḥ || 2|| iyaṃ svargadātrī punaḥ kalpavallī manojāstu kāmān yathārthaṃ prakuryāt | tathā te kṛtārthā bhavantīti nityaṃ svarūpaṃ tvadīyaṃ na vindanti devāḥ || 3|| surāpānamattā subhaktānuraktā lasatpūtacitte sadāvirbhavatte | japadhyānapūjāsudhādhautapaṅkā svarūpaṃ tvadīyaṃ na vindanti devāḥ || 4|| cidānandakandaṃ hasan mandamandaṃ śaraccandrakoṭiprabhāpuñjabimbam | munīnāṃ kavīnāṃ hṛdi dyotayantaṃ svarūpaṃ tvadīyaṃ na vindanti devāḥ || 5|| mahāmeghakālī suraktāpi śubhrā kadācid vicitrākṛtiryogamāyā | na bālā na vṛddhā na kāmāturāpi svarūpaṃ tvadīyaṃ na vindanti devāḥ || 6|| kṣamasvāparādhaṃ mahāguptabhāvaṃ mayā lokamadhye prakāśikṛtaṃ yat | tava dhyānapūtena cāpalyabhāvāt svarūpaṃ tvadīyaṃ na vindanti devāḥ || 7|| (phalaśrutiḥ) yadi dhyānayuktaṃ paṭhed yo manuṣyas- tadā sarvaloke viśālo bhavecca | gṛhe cāṣṭasiddhirmṛte cāpi muktiḥ svarūpaṃ tvadīyaṃ na vindanti devāḥ || 8|| || iti śrīmacchaṅkarācāryaviracitaṃ śrīkālikāṣṭakaṃ sampūrṇam ||

अर्थ:आदि शंकराचार्य रचित देवी कालिका (काली) की आठ श्लोकों की स्तुति — जो उनके उग्र, श्याम, मुक्तिदायी स्वरूप के ध्यान से आरंभ होती है: मुण्डमालाधारिणी, काल को ग्रसने वाली व अभय देने वाली माता।

कालिका अष्टकम् पाठ के लाभ

कालिका अष्टकम् का पाठ भगवती की कृपा, आशीर्वाद और रक्षा प्रदान करने वाला माना जाता है।

भक्ति को बढ़ाता है, मन को शांत करता है और भगवती के स्मरण में हृदय को स्थिर करता है।

शुक्रवार को तथा नवरात्रि में सर्वाधिक शुभ माना जाता है।

एक छोटी, मधुर स्तुति जिसे कोई भी सीखकर श्रद्धापूर्वक नित्य पढ़ सकता है।

कालिका अष्टकम् जप विधि

जप संख्या1बार
उत्तम समयप्रातः या सायं; विशेषकर शुक्रवार
दिशाEast or North

स्नान कर पूर्व या उत्तर की ओर मुख कर भगवती के चित्र के सम्मुख बैठें। दीप जलाकर कालिका अष्टकम् को धीरे-धीरे भक्तिपूर्वक पढ़ें। इसे नित्य पढ़ा जा सकता है, अथवा विशेषकर नवरात्रि में और शुक्रवार को। कृपा और रक्षा की प्रार्थना से समापन करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आदि शंकराचार्य द्वारा देवी कालिका (काली) की आठ श्लोकों की स्तुति — जो उनके उग्र, श्याम, मुक्तिदायी स्वरूप के ध्यान से आरंभ होती है: मुण्डमालाधारिणी, काल को ग्रसने वाली व अभय देने वाली माता।
इसका श्रेय आदि शंकराचार्य को दिया जाता है। इसे प्रातः या सायं भक्तिपूर्वक पढ़ा जाता है, और विशेषकर शुक्रवार को तथा नवरात्रि में।

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