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शनि वज्र पञ्जर कवचम्

🕉️ hindu·📿 1× जप·🕐 प्रातः या सन्ध्या; विशेषकर शनिवार·📜 Traditional

अन्य नाम / खोज: om asya shrishanaishcaravajrapanjara kavacasya kashyapa rishih · shani vajra panjara kavacham lyrics

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अर्थ

शनि वज्र पञ्जर कवचम् शनि का "वज्र पिंजर कवच" है — एक रक्षात्मक कवच जो सूर्य-पुत्र भगवान शनि का आवाहन करता है। यह भक्त को शनि की दशा (साढ़े साती व ढैया) के कष्टों से चारों ओर से रक्षा करता है और उनकी कृपा प्रदान करता है।

उत्पत्ति और कथा

Traditional · Traditional · Classical

शनि वज्र पञ्जर कवचम् एक प्रिय पारम्परिक स्तोत्र है। शनि का "वज्र पिंजर कवच" — एक रक्षात्मक कवच जो सूर्य-पुत्र भगवान शनि का आवाहन कर भक्त को उनकी दशा (साढ़े साती व ढैया) के कष्टों से चारों ओर से रक्षा और कृपा हेतु प्रार्थना करता है।

शास्त्रों में वर्णित

कहा जाता है कि शनि वज्र पञ्जर कवचम् का सच्चे और श्रद्धालु हृदय से पाठ करना उस दिव्य कृपा के निकट जाना है, जो प्रेमपूर्वक पुकारने वालों को कभी नहीं त्यागती।

मंत्र

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श्री गणेशाय नमः विनियोगः अस्य श्रीशनैश्चरवज्रपञ्जर कवचस्य कश्यप ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्री शनैश्चर देवता, श्रीशनैश्चर प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः ऋष्यादि न्यासः श्रीकश्यप ऋषयेनमः शिरसि अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे श्रीशनैश्चर देवतायै नमः हृदि श्रीशनैश्चरप्रीत्यर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ध्यानम् नीलाम्बरो नीलवपुः किरीटी गृध्रस्थितस्त्रासकरो धनुष्मान् चतुर्भुजः सूर्यसुतः प्रसन्नः सदा मम स्याद् वरदः प्रशान्तः १॥ ब्रह्मा उवाच शृणुध्वमृषयः सर्वे शनिपीडाहरं महत् कवचं शनिराजस्य सौरेरिदमनुत्तमम् २॥ कवचं देवतावासं वज्रपंजरसंज्ञकम् शनैश्चरप्रीतिकरं सर्वसौभाग्यदायकम् ३॥ श्रीशनैश्चरः पातु भालं मे सूर्यनन्दनः नेत्रे छायात्मजः पातु पातु कर्णौ यमानुजः ४॥ नासां वैवस्वतः पातु मुखं मे भास्करः सदा स्निग्धकण्ठश्च मे कण्ठं भुजौ पातु महाभुजः ५॥ स्कन्धौ पातु शनिश्चैव करौ पातु-शुभप्रदः वक्षः पातु यमभ्राता कुक्षिं पात्वसितस्तथा ६॥ नाभिं ग्रहपतिः पातु मन्दः पातु कटिं तथा ऊरू ममान्तकः पातु यमो जानुयुगं तथा ७॥ पादौ मन्दगतिः पातु सर्वांगं पातु पिप्पलः अंगोपांगानि सर्वाणि रक्षेन् मे सूर्यनन्दनः ८॥ इत्येतत् कवचं दिव्यं पठेत् सूर्यसुतस्य यः तस्य जायते पीडा प्रीतो भवति सूर्यजः ९॥ व्यय-जन्म-द्वितीयस्थो मृत्युस्थानगतोऽपि वा कलत्रस्थो गतो वापि सुप्रीतस्तु सदा शनिः १०॥ अष्टमस्थे सूर्यसुते व्यये जन्मद्वितीयगे कवचं पठते नित्यं पीडा जायते क्वचित् ११॥ इत्येतत्कवचं दिव्यं सौरेर्यन्निर्मितं पुरा द्वादशाष्टमजन्मस्थदोषान्नाशयते सदा जन्मलग्नस्थितान् दोषान् सर्वान्नाशयते प्रभुः १२॥ इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे ब्रह्म-नारदसंवादे शनिवज्रपंजरकवचं सम्पूर्णम्

śrī gaṇeśāya namaḥ || viniyogaḥ | oṃ asya śrīśanaiścaravajrapañjara kavacasya kaśyapa ṛṣiḥ, anuṣṭup chandaḥ, śrī śanaiścara devatā, śrīśanaiścara prītyarthe jape viniyogaḥ || ṛṣyādi nyāsaḥ | śrīkaśyapa ṛṣayenamaḥ śirasi | anuṣṭup chandase namaḥ mukhe | śrīśanaiścara devatāyai namaḥ hṛdi | śrīśanaiścaraprītyarthe jape viniyogāya namaḥ sarvāṅge || dhyānam | nīlāmbaro nīlavapuḥ kirīṭī gṛdhrasthitastrāsakaro dhanuṣmān | caturbhujaḥ sūryasutaḥ prasannaḥ sadā mama syād varadaḥ praśāntaḥ || 1|| brahmā uvāca || śṛṇudhvamṛṣayaḥ sarve śanipīḍāharaṃ mahat | kavacaṃ śanirājasya saureridamanuttamam || 2|| kavacaṃ devatāvāsaṃ vajrapaṃjarasaṃjñakam | śanaiścaraprītikaraṃ sarvasaubhāgyadāyakam || 3|| oṃ śrīśanaiścaraḥ pātu bhālaṃ me sūryanandanaḥ | netre chāyātmajaḥ pātu pātu karṇau yamānujaḥ || 4|| nāsāṃ vaivasvataḥ pātu mukhaṃ me bhāskaraḥ sadā | snigdhakaṇṭhaśca me kaṇṭhaṃ bhujau pātu mahābhujaḥ || 5|| skandhau pātu śaniścaiva karau pātu-śubhapradaḥ | vakṣaḥ pātu yamabhrātā kukṣiṃ pātvasitastathā || 6|| nābhiṃ grahapatiḥ pātu mandaḥ pātu kaṭiṃ tathā | ūrū mamāntakaḥ pātu yamo jānuyugaṃ tathā || 7|| pādau mandagatiḥ pātu sarvāṃgaṃ pātu pippalaḥ | aṃgopāṃgāni sarvāṇi rakṣen me sūryanandanaḥ || 8|| ityetat kavacaṃ divyaṃ paṭhet sūryasutasya yaḥ | na tasya jāyate pīḍā prīto bhavati sūryajaḥ || 9|| vyaya-janma-dvitīyastho mṛtyusthānagato'pi vā | kalatrastho gato vāpi suprītastu sadā śaniḥ || 10|| aṣṭamasthe sūryasute vyaye janmadvitīyage | kavacaṃ paṭhate nityaṃ na pīḍā jāyate kvacit || 11|| ityetatkavacaṃ divyaṃ saureryannirmitaṃ purā | dvādaśāṣṭamajanmasthadoṣānnāśayate sadā | janmalagnasthitān doṣān sarvānnāśayate prabhuḥ || 12|| || iti śrībrahmāṇḍapurāṇe brahma-nāradasaṃvāde śanivajrapaṃjarakavacaṃ sampūrṇam ||

अर्थ:शनि का "वज्र पञ्जर कवच" — एक रक्षात्मक कवच जो सूर्य-पुत्र भगवान शनि का आवाहन कर भक्त को उनकी दशा (साढ़े साती व ढैया) के कष्टों से चारों ओर से रक्षा व कृपा हेतु प्रार्थना करता है।

शनि वज्र पञ्जर कवचम् पाठ के लाभ

शनि वज्र पञ्जर कवचम् का पाठ देवता की कृपा, आशीर्वाद और रक्षा लाने वाला माना जाता है।

भक्ति बढ़ाता है, मन को शान्त करता है और भगवान के स्मरण में हृदय को स्थिर करता है।

शनिवार को तथा शनि अमावस्या और शनिवारों में सर्वाधिक शुभ।

एक अनमोल संस्कृत स्तोत्र, श्रद्धा से दैनिक पाठ के लिए उपयुक्त।

शनि वज्र पञ्जर कवचम् जप विधि

जप संख्या1बार
उत्तम समयप्रातः या सन्ध्या; विशेषकर शनिवार
दिशाWest

स्नान कर देवता के चित्र के सम्मुख पश्चिम की ओर मुख करके बैठें। दीपक जलाएँ और शनि वज्र पञ्जर कवचम् का धीरे-धीरे श्रद्धापूर्वक पाठ करें। इसे प्रतिदिन, या विशेषकर शनिवार को तथा शनि अमावस्या में पढ़ा जा सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शनि का "वज्र पिंजर कवच" — एक रक्षात्मक कवच जो सूर्य-पुत्र भगवान शनि का आवाहन कर भक्त को उनकी दशा (साढ़े साती व ढैया) के कष्टों से चारों ओर से रक्षा और कृपा हेतु प्रार्थना करता है।
यह एक पारम्परिक स्तोत्र है। इसका पाठ प्रातः या सन्ध्या में श्रद्धा से किया जाता है, विशेषकर शनिवार को तथा शनि अमावस्या में।

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