Mantra.Tips
bhagavad-gitagitakrishnavishvarupa-darshana-yoga

श्रीमद्भगवद्गीता ११.२४ — नभःस्पृशं दीप्तम्

🕉️ hindu·📿 11× जप·🕐 विश्वरूप के चिंतन के समय, चिंतनशील ध्यान में।·📜 Bhagavad Gita Chapter 11, Verse 24

अन्य नाम / खोज: nabhah sprisham diptam aneka varnam · dhritim na vindami shamam cha vishno · bhagavad gita 11.24 · gita 11 24 · arjuna trembles before the cosmic form · vyattananam dipta vishala netram

Share:

अर्थ

जब विश्वरूप अपने अभिभूत करने वाले, विस्मयकारी रूप को प्रकट करता है, तब अर्जुन भय से ग्रस्त हो जाते हैं। वे आकाश को छूते हुए, अनेक रंगों से जाज्वल्यमान, खुले मुखों और विशाल प्रज्वलित नेत्रों वाले भगवान का वर्णन करते हैं। भीतर से काँपते हुए, श्रीकृष्ण को विष्णु कहकर वे स्वीकार करते हैं कि उन्हें न धैर्य मिल रहा है और न शान्ति। यह श्लोक भगवान की असीम महिमा से उत्पन्न भय और कम्पन को व्यक्त करता है, इससे पूर्व कि वह आश्वासन में बदल जाए।

उत्पत्ति और कथा

Bhagavad Gita Chapter 11, Verse 24 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)

ग्यारहवें अध्याय विश्वरूपदर्शनयोग में, जब अर्जुन अभिभूत करने वाले विश्वरूप का दर्शन करते हैं, तब उसका उदात्त और भयावह पक्ष उन्हें ग्रस लेता है। यहाँ वे आकाश को छूते हुए, जाज्वल्यमान, अनेक रंगों वाले, खुले मुखों और प्रज्वलित नेत्रों वाले रूप का वर्णन करते हैं, और श्रीकृष्ण को, विष्णु कहकर, स्वीकार करते हैं कि उन्हें न कोई धैर्य मिल रहा है और न शान्ति।

शास्त्रों में वर्णित

भक्त मानते हैं कि महाबली अर्जुन भी भगवान की पूर्ण महिमा के सम्मुख काँप उठे, और वही भगवान जिनकी विशालता हृदय को विस्मित करती है, उस भक्त की शान्ति को कोमलता से लौटा देते हैं जो उनकी ओर मुड़ता है — क्योंकि भगवान विनम्र भी करते हैं और सान्त्वना भी देते हैं।

मंत्र

किसी भी पंक्ति या ▶ बटन पर टैप कर सुनें

नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्। दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं विन्दामि शमं विष्णो॥

nabhaḥ-spṛiśhaṁ dīptam aneka-varṇaṁ vyāttānanaṁ dīpta-viśhāla-netram dṛiṣhṭvā hi tvāṁ pravyathitāntar-ātmā dhṛitiṁ na vindāmi śhamaṁ cha viṣhṇo

अर्थ:आकाश को स्पर्श करते हुए, अनेक रंगों से देदीप्यमान, खुले हुए मुखों और विशाल प्रज्वलित नेत्रों वाले आपको देखकर मेरा अन्तरात्मा भयभीत होकर व्यथित हो रहा है; हे विष्णो! मुझे न धैर्य मिल रहा है और न शान्ति।

शब्द-दर-शब्द अर्थ

उच्चारण सुनने के लिए किसी भी शब्द पर क्लिक करें

नभःस्पृशम्🔊nabhaḥ-spṛiśhamआकाश को स्पर्श करते हुए
दीप्तम्🔊dīptamदेदीप्यमान; प्रज्वलित
अनेकवर्णम्🔊aneka-varṇamअनेक रंगों वाले
व्यात्ताननम्🔊vyāttānanamखुले हुए मुखों वाले
दीप्तविशालनेत्रम्🔊dīpta-viśhāla-netramविशाल, प्रज्वलित नेत्रों वाले
दृष्ट्वा हि त्वाम्🔊dṛiṣhṭvā hi tvāmआपको देखकर ही
प्रव्यथितान्तरात्मा🔊pravyathitāntar-ātmāमेरा अन्तरात्मा भय से व्यथित है
धृतिम्🔊dhṛitimधैर्य; स्थिरता
न विन्दामि🔊na vindāmiमैं नहीं पाता
शमम् च🔊śhamaṁ chaऔर शान्ति
विष्णो🔊viṣhṇoहे विष्णो

श्रीमद्भगवद्गीता ११.२४ — नभःस्पृशं दीप्तम् पाठ के लाभ

भगवान की अनन्त महिमा से उत्पन्न विस्मय और कम्पन को व्यक्त करता है

साधक को स्मरण कराता है कि दिव्य का यथार्थ साक्षात्कार अहंकार को विनम्र कर सकता है

भगवान के समक्ष भय की निष्कपट अभिव्यक्ति जो शरणागति की ओर ले जाती है

भगवान की अभिभूत करने वाली महानता के प्रति श्रद्धा को गहन करता है

हृदय को भगवान की आश्वस्त करने वाली, कोमल कृपा के लिए तैयार करता है

विश्वरूप के उदात्त पक्ष के चिंतन के लिए एक सजीव श्लोक

श्रीमद्भगवद्गीता ११.२४ — नभःस्पृशं दीप्तम् जप विधि

जप संख्या11बार
उत्तम समयविश्वरूप के चिंतन के समय, चिंतनशील ध्यान में।

इस श्लोक का पाठ विश्वरूप के विस्मयकारी पक्ष का चिंतन करते हुए करें। पाठ करते समय, अर्जुन की भाँति, उस विनम्र कर देने वाले भय को निष्कपट रूप से स्वीकार करें जिसे भगवान की असीम महिमा जगा सकती है। उस श्रद्धामय विस्मय को निराशा की नहीं, अपितु शरणागति की ओर ले जाने दें, हृदय को भगवान के उस आश्वासन के लिए खोलते हुए जो अध्याय में आगे आता है। भीतर ही भीतर भगवान को सर्वव्यापी विष्णु कहकर सम्बोधित करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अर्जुन आकाश को छूते हुए, अनेक रंगों से जाज्वल्यमान, खुले मुखों और विशाल प्रज्वलित नेत्रों वाले विस्मयकारी विश्वरूप का वर्णन करते हैं। अभिभूत और भीतर से काँपते हुए, वे श्रीकृष्ण को, विष्णु कहकर, बताते हैं कि उन्हें न धैर्य मिल रहा है और न शान्ति।
विश्वरूप अपने उदात्त, अभिभूत करने वाले और भयावह तक पक्ष को प्रकट करता है — विशाल, जाज्वल्यमान और असीम। ऐसी अनन्त महिमा के सम्मुख अर्जुन का हृदय काँप उठता है, जो दर्शाता है कि भगवान का पूर्ण दर्शन मनुष्य के मन को कैसे विनम्र और विस्मित कर सकता है।
'विष्णु' का अर्थ है सर्वव्यापी भगवान। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को भरने और व्याप्त करने वाले रूप को देखकर अर्जुन स्वाभाविक रूप से श्रीकृष्ण को विष्णु कहकर सम्बोधित करते हैं, उन्हें सर्वसमावेशी परम सत्ता के रूप में पहचानते हुए।
यह विश्वरूप के सम्मुख अर्जुन के विस्मय और भय की पराकाष्ठा को व्यक्त करता है। यह कम्पन उन्हें आश्वासन की प्रार्थना की ओर ले जाता है, जिसे श्रीकृष्ण आगे अध्याय में प्रेमपूर्वक देते हैं, अर्जुन की शान्ति लौटाते हुए और भगवान की कोमल करुणा को प्रकट करते हुए।

ये भी पढ़ें

उपयोगी लगा? अपनों के साथ साझा करें 🙏

Share:

Explore more sacred mantras with complete meaning and chanting guides