श्रीमद्भगवद्गीता ११.३८ — त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः
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✦ अर्थ
अति विशाल लौकिक रूप को देखकर अर्जुन श्रीकृष्ण की भावविभोर स्तुति करने लगते हैं। इस श्लोक में वे भगवान को आदिदेव, सनातन पुरुष, तथा समस्त सृष्टि के परम आश्रय एवं निधान के रूप में वन्दित करते हैं। श्रीकृष्ण ज्ञाता भी हैं और ज्ञेय भी, परम धाम हैं, और सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त हैं -- यह परमात्मा के सर्वव्यापक स्वरूप का सुन्दर सार है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 11, Verse 38 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
ग्यारहवें अध्याय, विश्वरूप दर्शन योग में, श्रीकृष्ण द्वारा दिव्यचक्षु प्रदान किए जाने और अपना लौकिक रूप प्रकट करने के पश्चात अर्जुन विस्मय और भक्ति से भर जाते हैं। श्लोकों की एक शृंखला में वे भगवान का गुणगान करते हैं; यहाँ वे श्रीकृष्ण को आदिदेव, परम आश्रय, ज्ञाता और ज्ञेय, तथा अनन्त रूपों वाले सर्वव्यापी पुरुष के रूप में घोषित करते हैं।
✦ शास्त्रों में वर्णित
भक्त मानते हैं कि इन शब्दों से भगवान का गुणगान करना — उन्हें समस्त के मूल, आश्रय और अन्तिम धाम के रूप में पहचानना — आत्मा को उनके और भी निकट ले जाता है, क्योंकि गीता वचन देती है कि जो भक्तिपूर्वक उनकी स्तुति और स्मरण करते हैं, वे कभी नष्ट नहीं होते।
मंत्र
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त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्। वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥
tvam ādi-devaḥ puruṣhaḥ purāṇas tvam asya viśhvasya paraṁ nidhānam vettāsi vedyaṁ cha paraṁ cha dhāma tvayā tataṁ viśhvam ananta-rūpa
अर्थ:आप आदिदेव और सनातन पुरुष हैं; आप इस सम्पूर्ण विश्व के परम आश्रय हैं। आप ही ज्ञाता और ज्ञेय (जानने योग्य) हैं तथा परम धाम हैं। हे अनन्तरूप! आपसे ही यह सारा विश्व व्याप्त है।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता ११.३८ — त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः पाठ के लाभ
परम भगवान का चिन्तन करने हेतु स्तुति का एक श्रेष्ठ श्लोक
यह दृढ़ करता है कि भगवान समस्त के मूल स्रोत, आश्रय और अन्तिम धाम हैं
भगवान को ज्ञाता और ज्ञेय दोनों के रूप में पहचानकर भक्ति को गहरा करता है
साधक को स्मरण कराता है कि सम्पूर्ण विश्व दिव्य से व्याप्त है
भगवान को आत्मा के अन्तिम विश्राम-स्थल के रूप में शरणागति विकसित करता है
एक ही परम पुरुष के अनन्त रूपों (अनन्त-रूप) के प्रति श्रद्धा जगाता है
श्रीमद्भगवद्गीता ११.३८ — त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः जप विधि
इस श्लोक का पाठ परम के प्रति अराधना के स्तोत्र के रूप में करें। प्रत्येक पद का उच्चारण करते समय — आदिदेव, सनातन पुरुष, परम आश्रय, ज्ञाता और ज्ञेय, परम धाम — रुककर अर्थ को भक्ति जगाने दें। इसे श्रीकृष्ण की प्रतिमा को निहारते हुए अथवा सर्वव्यापी दिव्य पर मौन ध्यान में अर्पित किया जा सकता है, हृदय को भगवान में अपने अन्तिम धाम के रूप में विश्राम करने देते हुए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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