श्रीमद्भगवद्गीता ११.५४ — भक्त्या त्वनन्यया
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✦ अर्थ
अपने अपार विश्वरूप को प्रकट करने के पश्चात् भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में परम कुंजी देते हैं — मुझे तत्त्वतः जानना, साक्षात् देखना और घनिष्ठ रूप से प्राप्त करना केवल अनन्य भक्ति — अविभाजित, एकनिष्ठ प्रेम — के द्वारा ही सम्भव है। केवल अध्ययन, तप या कर्मकाण्ड से उन तक नहीं पहुँचा जा सकता; केवल पूर्ण हृदय का प्रेम ही पहुँचता है। यह गीता की उन सर्वाधिक स्पष्ट घोषणाओं में से एक है कि शुद्ध भक्ति ही ईश्वर तक पहुँचने का श्रेष्ठतम और प्रत्यक्षतम मार्ग है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 11, Verse 54 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
ग्यारहवें अध्याय, विश्वरूप दर्शन योग में, अर्जुन के लौकिक रूप को देखकर विस्मित होने के पश्चात, श्रीकृष्ण अपने सौम्य, प्रेममय स्वरूप को पुनः धारण करते हैं। तब वे शिक्षा देते हैं कि ऐसे रूप तक अध्ययन, तप या यज्ञ से नहीं, बल्कि केवल अनन्य भक्ति से पहुँचा जा सकता है — जिससे यह श्लोक उस महान दर्शन का प्रेममय समापन बन जाता है।
✦ शास्त्रों में वर्णित
भक्ति परम्पराओं के सन्त इस श्लोक को श्रीकृष्ण के अपने वचन रूप में संजोते हैं कि केवल प्रेम ही ईश्वर के दर्शन का द्वार खोलता है; कहा जाता है कि असंख्य भक्त, जिनके पास न विद्या थी न कर्मकाण्ड की सामर्थ्य, केवल इस श्लोक में वर्णित अविभाजित प्रेम के द्वारा ही भगवान की उपस्थिति को प्राप्त हुए।
मंत्र
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भक्त्या त्वनन्यया शक्यमहमेवंविधोऽर्जुन। ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप॥
bhaktyā tv ananyayā śhakya aham evaṁ-vidho ’rjuna jñātuṁ draṣhṭuṁ cha tattvena praveṣhṭuṁ cha parantapa
अर्थ:परन्तु हे परन्तप अर्जुन! अनन्य भक्ति के द्वारा मैं तत्त्वत: 'जानने', 'देखने' और 'प्रवेश' करने के लिए (एकी भाव से प्राप्त होने के लिए) भी, शक्य हूँ!।।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता ११.५४ — भक्त्या त्वनन्यया पाठ के लाभ
अनन्य भक्ति को ईश्वर-साक्षात्कार का सबसे निश्चित मार्ग प्रकट करती है
हृदय को केवल प्रयास के बजाय प्रेम के द्वारा भगवान को खोजने हेतु प्रोत्साहित करती है
भक्त को आश्वस्त करती है कि पूर्ण हृदय की भक्ति श्रीकृष्ण को सचमुच जान, देख और प्राप्त कर सकती है
आध्यात्मिक मार्ग को एक मूल साधना — एकनिष्ठ भक्ति — में सरल कर देती है
इस विश्वास को गहरा करती है कि शुद्ध प्रेम भगवान को किसी कर्मकाण्ड या विद्या से अधिक प्रिय है
समस्त लालसा को एक ही प्रियतम की ओर मोड़कर स्थिरता और एकाग्रता को प्रेरित करती है
श्रीमद्भगवद्गीता ११.५४ — भक्त्या त्वनन्यया जप विधि
इस श्लोक का पाठ प्रेम के मार्ग की पुष्टि रूप में करें, 'भक्त्या त्वनन्यया' — 'अनन्य भक्ति के द्वारा ही' — पर मनन करते हुए। इसे अपनी बिखरी हुई लालसाओं को भगवान की ओर एक ही पूर्ण हृदय की आकांक्षा में एकत्र करने दें। प्रार्थना अथवा जप से पूर्व इसका पाठ इस स्मरण रूप में करें कि भगवान को प्रयास नहीं बल्कि प्रेम समीप लाता है, और प्रत्येक पुनरावृत्ति के साथ अपना हृदय पूर्णतः अर्पित करें।
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