श्रीमद्भगवद्गीता ११.१२ — दिवि सूर्यसहस्रस्य
अन्य नाम / खोज: divi surya sahasrasya · thousand suns gita verse · bhagavad gita 11.12 · gita 11 12 · bhasas tasya mahatmanah · splendour of a thousand suns vishvarupa
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✦ अर्थ
ग्यारहवें अध्याय का यह प्रसिद्ध श्लोक भगवान श्रीकृष्ण के विश्वरूप — अर्जुन को दिखाये गये विराट् रूप — के अपार तेज का वर्णन करता है। संजय कहते हैं कि उसका प्रज्वलित प्रकाश आकाश में एक साथ उदित हुए सहस्र सूर्यों के समान होगा। यह दृश्य परमात्मा की असीम महिमा और तेज को प्रकट करता है, विस्मय और समर्पण जगाता है, और भक्त को स्मरण कराता है कि भगवान का यथार्थ रूप समस्त माप से परे अनन्त तेज है।
उत्पत्ति और कथा
Bhagavad Gita Chapter 11, Verse 12 · Sage Veda Vyasa (Mahabharata, Bhishma Parva) · Ancient (text compiled c. 5th–2nd century BCE)
ग्यारहवें अध्याय, विश्वरूप दर्शन योग में, अर्जुन श्रीकृष्ण का विराट् रूप देखने की प्रार्थना करते हैं। दिव्य दृष्टि पाकर वे भगवान में समस्त ब्रह्माण्ड को देखते हैं। यह श्लोक उस दर्शन के अकल्पनीय तेज का वर्णन करता है — आकाश में एक साथ प्रज्वलित हुए सहस्र सूर्यों के समान कान्ति।
✦ शास्त्रों में वर्णित
संजय बताते हैं कि विश्वरूप का तेज इतना अपार था कि योद्धाओं में श्रेष्ठ अर्जुन भी काँप उठे और उन्होंने सिर झुका लिया; यह श्लोक तब से दिव्य तेज का शास्त्रीय मापदण्ड बना रहा है — सहस्र सूर्यों का एक साथ उदित होना।
मंत्र
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दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता। यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः॥
divi sūrya-sahasrasya bhaved yugapad utthitā yadi bhāḥ sadṛiśhī sā syād bhāsas tasya mahātmanaḥ
अर्थ:आकाश में सहस्र सूर्यों के एक साथ उदय होने से उत्पन्न जो प्रकाश होगा, वह उस (विश्वरूप) परमात्मा के प्रकाश के सदृश होगा।।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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श्रीमद्भगवद्गीता ११.१२ — दिवि सूर्यसहस्रस्य पाठ के लाभ
विश्वरूप की असीम महिमा के प्रति विस्मय और श्रद्धा जगाता है
ईश्वर के अनन्त तेज के समक्ष विनम्रता और समर्पण को प्रेरित करता है
मन को भगवान के असीम प्रकाश के दर्शन की ओर उठाता है
गीता की सबसे भव्य छवियों में से एक के द्वारा भक्ति को गहरा करता है
चंचल मन को एक उज्ज्वल केन्द्र पर लाकर स्थिर करता है
श्रीकृष्ण को समस्त माप से परे परम पुरुष के रूप में विश्वास दृढ़ करता है
श्रीमद्भगवद्गीता ११.१२ — दिवि सूर्यसहस्रस्य जप विधि
इस श्लोक को धीरे-धीरे जपें और छवि को अपने अन्तर्दृष्टि में भरने दें — सहस्र सूर्य एक साथ प्रज्वलित होते हुए, भगवान के यथार्थ तेज की एक झलक के रूप में। उसकी सम्पूर्ण विशालता को मन की क्षुद्र चिन्ताओं को विस्मय और समर्पण में घुलने दें। यह श्रद्धा विकसित करने के लिए एक शक्तिशाली चिन्तन है, जिसे आँखें बन्द करके, विश्वरूप के असीम प्रकाश का चित्रण करते हुए जपना सर्वोत्तम है।
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